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Wednesday, December 3, 2008

मुंबई हमलों के विरोध में प्रदर्शन

मुंबई में हुए आतंकी हमलों को लेकर सभी में आक्रोश देखनें को मिला क्या आम जनता, क्या सिनेमा सितारें, क्या सामाजिक कार्यकर्ता, और क्या उद्योगपति। सभी ने मानों एक जुट होकर आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा के मासले पर सरकार को आढ़े हाथों लिया। चाहे वो आम नागरिक हो या छात्र, गृहणी हो या सरकारी मुलाजिम, सभी के जह़न में बस एक, एक ही आवाज आ रही थी...बस बहुत हुआ...अब और नहीं। और एक खास बात...भाई सभी का जो आक्रोश, जो गुस्सा था वो केवल राजनीतिज्ञों के प्रति था...हममम् सही भी है भाई, जवाबदेही भी तो उन्हीं की बनती है...।
और हमला भी तो आखिर मुंबई पर हुआ है, कोई छोटी-मोटी बात है क्या? आखिर देश के सबसे ज्यादा जिम्मेदार लोगों का जो शहर है, जो अपने अधिकारों को लेकर जागरुक है, भारतीय संविधान के पैरोकार है....संविधान के खिलाफ़ कोई काम अगर सरकार या सरकार का कोई प्रतिनिधि, या कोई राजनेता करें तो उसे आढें हाथों लेने में पीछे नहीं हटतें। मुंबई में जो कुछ भी हुआ वो दुखद था, इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वो कम है, न जाने कितने मासूमों ने अपनी जान गवाई। परंतु दोस्तों हमें सोचना पड़ेगा की आज, जो आवाज हमारे जहन से आ रही है, जो क्रांति हम आज सड़कों पर मोमबत्तियां जलाकार कर रहें हैं...ये आवाज हमारे जहन से जब क्यों नहीं आती, जब उसी मुंबई में दंगे होते है? जब उसी महाराष्ट्र में दलितों की हत्या की जाती है? जब इतनी बड़ी तादात में किसान आत्महत्या करते हैं? और जब क्षेत्रियता के नाम पर इंसान को अपनी रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ता है, क्योंकि एक नेता अपनें लाभ के लिए आपकों दूसरों से भिन्न कर देता है...? तब क्यों नहीं कोई फिल्म कलाकार खुद को एक जिम्मेदार हिंदुस्तानी मानता? तब क्यों नहीं उस शहर के युवा एकजुट होकर किसी भैया को सुरक्षा देने की मुहीम छेड़ते? तब क्यों नहीं कोई सामाजिक कार्यकर्ता, पढ़े लिखे नौजवान और बुद्धिजीवी मोमबत्ती लेकर गेटवे पर मार्च करतें? क्यों नहीं हम सब मिलकर उस वक्त उस पीड़ित पक्ष को हौसला देतें? दोस्तों बात निकली हैं तो दूर तक जाएगी...क्यों न ये सवाल हम अपने आप से पूछें, की क्या हम केवल उन्हीं बातों के लिए नहीं आवाज उठाते जिसका सरोकार केवल हम से हो? क्या हमारे लिए केवल वही संविधान नहीं है जिसमें हम केवल अपने साथ कुछ गलत नहीं होनें देना चाहतें? बाकी कहीं जो कुछ हो रहा हो हमें क्या... दोस्तों मुद्दा गंभीर है, हमारी इस चेतना पर कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा जो टिप्पणी की जाती है(नक़वी) वो शायद सही सबित हो जाती है? क्योंकि वो जानते हैं की ये प्रदर्शन हम सभी केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करानें के लिए करते हैं, जनसरोकार के लिए नहीं, दोस्तों क्रांति के लिए तत्पर रहनें के लिए सबसे ज्यादा जरुरी हैं गलत बात का किसा भी परिस्थिति में साथ न देना, गलत किसी भी व्यक्ति के साथ क्यों ना हो रहा हो... आवाज उतनी ही बुलंद हो की, किसी भी नेता की ये हिम्मत न हो की हमें थोड़ा सा लालच देकर, बोली-भाषा, जाति-धर्म, और क्षेत्र के नाम पर अलग कर दें...किसी नेता की ये हिम्मत न हों की वो हमारे आक्रोश को किसी फिल्म से प्रेरित कृत समझें...।
दोस्तों ये जो कुछ भी घटा मुंबई में उस सब में कहीं न कहीं हमारा भी उतना ही दोष है, जितना की हम नेताओं पर दोष मढ़ रहे है, हम भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जिसे दोष देनें के लिए हम सड़क पर मोमबत्तियां लेकर विरोध जताते है। दोस्तों उन शहादों को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलेगी जब हम अपने जीवन में नैतिक और संवैधानिक दोनों आधारों पर सही गलत का निर्णय लें। जब हम अपनें स्वार्थ को त्याग कर, किसी के भी खिलाफ़ आवाज उठाने का दम रखतें हों....।
जरा सोचें...

Monday, November 24, 2008

दिल्ली का चुनावी समर

दिल्ली विधान सभा चुनावों जैसे-जैसे नजदीक आ रहे है, कांग्रेस की चिंता बढ़ती जा रही है। पहले ही महंगाई, बुल्डोजर,और कानून व्यवस्था पर फजीहत झेल चुकी कांग्रेस शायद अब कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती...पहले दिल्ली देहात के गांवों को लाल डोरे में शामिल करके आपने देहाती वोट बैंक को सुरक्षित करने का पैंतरा चला गया फिर 1500अनाधिकृत कॉलोनियों को अधिकृत करने का फरमान जारी किया...पर जब लगा की असली पैंतरा भाजपा ने खेला है...विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके तो कांग्रेस की समझो रीढ़ की हड्डी टूट गई हो...

बताते हैं कैसे...प्रो विजय कुमार मल्होत्रा दिल्ली के पंजाबी समुदाय में एक ऐसा नाम है...जो शायद मदन लाल खुराना के बाद सबसे परिचित व्यक्ति है और दिल्ली की राजनीति में पंजाबी समुदाय का कितना महत्व है ये शायद आपको हाल ही में दिल्ली हुई दुकानों की सीलिंग के दौरान ही देख लिया होगा...

दिल्ली के चुनावों में सत्ता तक पहुंचाने में सबसे ज्यादा अगर किसी समुदाय की भूमिका रहती है तो वो है पंजाबी, जाट, और दलित। इसमें कोई दो राय नही जब दिल्ली के दो सबसे प्रमुख समुदायों (पंजाबी और जाट) के नेता मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा एक साथ थे(1993) तो भाजपा ने दिल्ली की सत्ता हासिल करनें में कामयाब रही थी...और कांग्रेस के पास केवल अपना पुराना दलित वोट बैंक शेष बचा था... इसीलिए वो सत्ता के सिंहासन से दूर रही थी...

वहीं, जैसे ही खुराना-साहिब सिंह के बीच अनबन शुरु हुई उसका भुगतान भाजपा को 98के चुनावों में हार के रूप में करना पड़ा और यही हाल भाजपा का 2003 में भी हुआ खुराना अकेले पड़ गए साहिब सिंह से मतभेत बरकरार था ... इसके बाद से आज तक कांग्रेस ने अपने इस वोट बैंक को सजो कर रखा था... आज भाजपा में ना तो खुराना है और ना ही सहिब सिंह इस दुनिया में रहें है...दिल्ली प्रदेश भाजपा में भी कोई बड़ा पंजाबी नेता नही था...तो फिर मल्होत्राजी को संसद से बुलाना पड़ा...जिनके बराबर का दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में तो कोई नेता नहीं, न सुभाष चोपड़ा, न कपिल सिब्बल, न आर के आनंद...

इस बार के चुनावों में भाजपा के पास पंजाबी वोट बैंक के लिए तो नेता है ही, वहीं जाट लॉबी के लिए बाहरी दिल्ली से सांसद सज्जन कुमार ने दिल्ली देहात को सही से लामबंद किया हुआ है...हां कुछ एक दिल्ली देहात के गांवों में गुजर्र वोट अहम भूमिका निभाएंगे, लेकिन अभी तक उनका रुझान बसपा की ओर ही दिख रहा है...रही बात दिल्ली के दलित वोटरों की तो इनकी भूमिका इतनी होती है की किसी भी पार्टी को सत्ता तक पहुंचने के लिए इनके दरवाजे जाना बेहद जरूरी हो जाता है...

दिल्ली में 44जे जे कॉलोनियां है जिनमें अच्छी ख़ासी तादात दलित रहते हैं। पहले से ये वोट बैंक कांग्रेस के हाथ में था पर इस बार बसपा के आने से कांग्रेस को अपने दलित वोट बैंक पर सेंध लगने की भनक पड़ गई है, पहले भी यहां से बसपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहा था। तभी तो मंगोल पुरी जे जे कॉलोनी में खुद कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को रैली को संबोधित करने के लिए आना पड़ा... वहीं यूपी क्वीन मायावती ने रैली के लिए पूर्वी दिल्ली का त्रिलोक पुरी चुना, क्योंकि यहां भी अच्छा खासी दलितों की संख्या है ही साथ ही गुर्जरों के भी कई गांव है... बहनजी को दलित-गुर्जरो से बहनजी का पुराना नाता है... इस सब घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो जाती है की दिल्ली की सत्ता पर तीन जातियों का वोट तीन दलों में विभाजित हो रहा है...पंजाबी भाजपा, जाट कांग्रेस, दलित बसपा...अब देखना है की ऊंट किस करवट बैठता है...सोचने वाली बात है कि भाजपा आज भी इस स्थिति में नही है इसका कारण है कि दिल्ली प्रदेश में भाजपा के पास कोई भी नेता इस समय तो नहीं है...जो कि भाजपा को जीत की दहलीज तक ले जाए...।

Friday, November 14, 2008

बदलते नेता और हम...

दिल्ली में जैसे-जैसे सर्दी बढ़ रही है, चुनावी सरगर्मी भी उसी रुबाब में आ रही है, नेताओं के सफेद कुर्ते तो बाहर निकल ही आए, साथ में नेताजी के समर्थको ने भी लगे हाथ सफेद रंग की पैन्ट-शर्ट निकाल ली है। भाई...क्या पता कब कोई टी.वी चैनल का कैमरामैन सामने आ जाए और हमें नारे लगाने पड़ जाए....भई चुनावी मौसम जो है.... जिस इंसान को आप ने अपने मुहल्ले में भी कम देखा होगा वो अचानक आप से आ कर कहता है की "ये मेरे बड़े भाई है मैं आपके ही मुहल्ले में रहता हूं, कृप्या इन्हें ही वोट दीजिएगा" साथ में आने वाले भाई के जाने पर आप सोच में पड़ जाएंगे की आखिर ये बंदा आपको कैसे जानता है... खैर जाने दीजिए।

चुनावी मौसम में फ़िजा का यूं बदलना लाज़मी है...

आप बदले न बदले, पर सोच बदलना लाज़मी है...

जी हां दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा? ये तो तय कर पाना अभी मुश्किल है। पर ये बात भी दीगर नहीं की दिल्ली के ये चुनाव पहले हुए दो विधानसभा चुनावों से भिन्न होंगे...आज के नेता भी जान चुके है.......... कि अब न तो वो कार्यकर्ता है और न ही नेता।

आज जो नेता आपके साथ खड़ा आपके नाम के नारे लगा रहा है वो अगले चुनावों में आपकी ही सीट पर टिकट की ताल ठोक देगा...आपकी पार्टी से नही मिले तो क्या? इस चुनाव में आपके साथ लगकर कमा लेंगे...ओह.......... मेरा मतलब था की इस बार आपके साथ लगकर काम कर लेंगे और अगली बार बसपा से टिकट की दावेदारी ठोक देंगे।

भैया सीधा-साधा फार्मूला है, इस बार किसी भी नेता के साथ मिलकर, आप चमचे बनकर कमा ले...ताकि आप अगले साल की टिकट का प्रबंध हो जाए...फिर अपनी पार्टी नही तो क्या बसपा ने दिल्ली में दस्तक दे दी है...अब केवल एक विकल्प नहीं बचा रहा... आज दिल्ली प्रमुख सीटों पर बसपा के उम्मीदवारों ने कांग्रेस-भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर दी है...बसपा के उम्मीदवार भी कुछ ऐसे है पहले जो कि कभी भाजपा में थे या कांग्रेस से इस बार टिकट की दावेदारी ठोकीं थी पर ताल जोर से न लगी और आवाज बसपा के कार्यालय में सुनाई देने लगी... देखना है कि इस बार के चुनावो पर कौन किसका भाई बनकर आपके पास आता है और कौन विरोधी....

संभलकर दिल्ली.

Tuesday, October 21, 2008

कामाने-खाने की जद्दोजहद

कमाना खाना है तो सहना भी है...
जी हां... यही कुछ आवाज आ रही है मुंबई में कमाने-खाने गए उत्तर भारतीयों के दबे दिल से...
राज ठाकरे...उसी ओछीं राजनीति की उपज जिसकी नींव कभी चाचा बाल ठाकरे ने रखी थी। आज वही बात फिर से सामने आई है, लेकिन मराठी मानुस की दुहाई देने वाले चाचा भतीजे को शायद ये नही पता की उस मराठी जनता में से कितने लोग मुंबई महानगर में मजदूरी करने के लिए आते है? शहर में जो भी मेहनत कश तबका है उसमें कितने प्रतिशत मराठी मानुसों की भूमिका है? ये बात सत्य है कि हम लोग अपने घर में कोई भी छोटा काम नही करते, क्योंकि हमारी मनोस्थिति ऐसी बन चुकी है, कोई भी इंसान अपने घर में, या शहर में, गांव में, कोई ऐसा काम नही करता है जो कि उसे किसी अपने या परिचित की नजरों में छोटा साबित करे। तो ये हमारी फितरत में है कि हम अपने अपनों से दूर हो कर कैसा भी काम करने को तैयार हो जाते है, इसमें मराठी या उत्तर भारतीय होनें की बात नहीं, किसी भी इंसान के संदर्भ में ये बात स्वाभाविक है। मराठी मानुस भी जो है, वो गोवा, वडोदरा, राजकोट में काम करने के लिए जाते है, विदेशों में भी जाते है, वहां शायद उन्हें वो काम करना पड़ता है जो कि यू.पी, बिहार का आदमी आकर मुंबई में करता है।
देश के सबसे विकसित राज्य पंजाब को ही लें...हर वर्ष यहां से सैंकड़ों युवक कनाडा, लंदन, अमेरिका
काम करने के लिए जाते है, वहां भी उनमे से अधिकतर लोग छोटा-मोटा काम करके अपना गुजारा चलाते है, कोई ड्राइवरी करता है तो कोई किसी रेस्तरां में काम करता है। पर शायद अपने देश या राज्य
में हमें ऐसा करते शर्म महसूस होती है।
और आप जैसे नेताओं को मौका मिल जाता है कुछ करने का और अपने पैर फैलाने का, लेकिन शायद आपको ये अंदाज नहीं होता कि आपकी इस ओछीं राजनीति का असर उस मराठी मानुस पर भी पड़ता
है जो अपने घर से दूर कहीं ओर काम करने के लिए गया हुआ है...

Friday, October 10, 2008

लिव इन रिलेशनशिप पर महाराष्ट्र सरकार की मंजूरी ने देश के युवा वर्ग को तोहफा दिया है, या उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से विमुख न होने के संदर्भ में पहला कदम उठाया है। बात तो थोड़ा देर से ही समझ में आएगी, लेकिन पहला सवाल यह है कि ये रिलेशनशिप कैसा है जिसे हम केवल इसलिए पूरी तरह से नही अपनाते क्योंकि शायद हमें अपनी पसंद पर भरोसा नहीं होता? क्योकिं हम केवल इसलिए इसलिए अपने उस साथी को अपना सब कुछ नही मानते क्योंकि हमें ये भरोसा नही होता की भविष्य में हमें या हमारे साथी को कोई औऱ पसंद आ जाए तो हम क्या करेंगे? भाई... जमाना जो इतना बदल रहा है। आज कि इस दौड़ती-भागती दुनिया में इंट्रैक्शन इतना ज्यादा है कि कोई भी भरोसे में नही की कल क्या होगा। किसी को अपने साथी पर विश्वास नही तो किसी को अपने आप पर फिर कैसे कोई किसी एक इंसान को अपना सब कुछ मान सकता है, हां साथ रहना अलग बात है...कोई झंझट तो नही है कम से कम जब तक चाहो तब तक मस्ती मारो फिर कुछ भी बोल कर ब्रेकअप कर लो।

बात गई-आई हो जाएगी, न तो उस लड़की को याद रहेगा न उस लड़के को...

भाई ये अच्छा सिस्टम है, और अपने युवाओं ने इसे हाथों-हाथ लिया भी, पर ये कम्बख्त सरकार है न इसे किसी की खुशी कहा देखी जाती है, आ गई हमारे युवाओं के तथाकथित प्यार के बीच और कानून ले आई की लिवइन रिलेशनशिप में रहने वालों को अब कानूनी मान्यता दी जाएगी। यानी अब जो अधिकार शादी के संदर्भ में कानूनी रूप से मिलते है अब वो सभी अधिकार लिवइन रिलेशनशिप में भी लागू होंगे... लो भला इन्ही अधिकारों और जिम्मेदारी से बचने के लिए हमारे युवाओं ने ये रिलेशन अपनाया था और अब फिर वही रोना...

बेचारे युवा अपने इस टाइम पास प्यार को अब भला कैसे निभाएंगे? लेकिन दोस्तों बात बुरा मानने की नही है, सोचने की है, की हम अपने जीवन साथी में ऐसी क्या खूबी देखते है जिसे हम अपने प्यार में नही पाते।
क्यों फिर हम अपने इस रिश्ते को प्यार का नाम देकर प्यार को क्यो बदनाम करते है।कई जगह तर्क आता है कि शादी कोई प्यार की मंजिल नही, लेकिन शादी भी तो बिना प्यार के एक समझौता सी होगी न फिर...जब हम शादी नही कर सकते तो उस इंसान के साथ जिसे हम दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करने का दावा ठोकतें है, जिसके लिए कस्में खाते है वादे करते है, उसे ये आश्वासन नही दे सकते की मै जिंदगी भर तेरा साथ निभाना चाहता हूं।

सिर्फ इस डर से आप अपने रिश्ते, अपने प्यार को ही नही अपने आप को भी खो देते है...

Thursday, October 9, 2008

क्रिकेट का बदलता दौर

सौरभ गांगुली के सन्यास की घोषण करते ही मानों क्रिकेट के जानकारों के यहां पत्रकार भाईयो का तांता लग गया। हर कोई चाहता था, की गांगुली के इस कदम का भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियो पर क्या प्रभाव पड़ेगा। क्या उनके प्रदर्शन मैं कोई सुधार आऐगा? क्या वो भी अब जल्दी सन्यास की घोषणा करेंगे? खैर कुछ भी हो, लेकिन दादा के इस कदम के परिणाम बहुत दूरगामी होंगे। आने वाले दिनों में हमें शायद कुछ और सीनियर खिलाड़ियों के सन्यास लेने की खबर मिल सकती है, और ये भी हो सकता है की आने वाले चंद सालों में हमें सौ टेस्ट मैच खेलने वाले खिलाड़ियो के बारे में केवल सुनने को मिलें। क्योंकि जिस तरह की क्रिकेट आज खेली जा रही है, उसमें निरंतर अच्छा प्रदर्शन करना अनिवार्य सा हो गया है, बात सीधी सी है, 'खेलों कमाओं और निकल जाओं ' कोई सरोकार मत रखो देश से, देश के लिए, टीम के लिए या जीत के लिए....

आज के परिदृश्य में हम देखते है की क्रिकेट में न तो वो जूनून है न वो जज्बा... अब सिर्फ हर कोई अपने लिए खेलता है। अब टीम में न तो वो रॉबिन जाडेजा की जोड़ी है, और न वो श्रीनाथ वेंकटेश की धार, न कुंबलें चौहान की फिरकी। और अब कुछ दिनों में रनों का अंबार लगाने वाले सचिन द्रविड भी नही दिखेंगे, गांगुली की तो बिदाई निर्धारित हो ही चुकी है। क्रिकेट में अब न वो रोमांच बचा है न वो जूनून। क्योंकि आप जब भी मैच देखने लगते है आपको पता चलता है कि कोई नया खिलाड़ी खेल रहा होता है, और जब तक लोग उस खिलाड़ी का नाम भी ठीक से जान पाते है वो बेचारा किसी विज्ञापन में दिखाई पड़ता है या किसी डांस शो में कुल्हे मटकाता, वाह रे मेरा भारतीय क्रिकेट....।

महाराजा रणजीत सिंह या लाला अमर नाथ ने ऐसी कल्पना तो नही की थी? खैर बेचारे क्रिकेटरों का भी क्या कसूर है, कम्बख्त ये ग्लैमर का कीड़ा ही कुछ ऐसा है। आज जो भी नौजवान भारतीय टीम में आना चाहता है, उसका उद्देश्य केवल एक दो मैच भर होता है क्योंकि उसे तो पता ही है कि उसके साथ क्या होना आगे... और बाद में उसे किसी न किसी विज्ञापन में काम तो मिल ही जाऐगा। बोर्ड के भरोसे तो बेचारे को रहना है नही है, जो बोर्ड टीम को दस हजार रन देने वाले खिलाड़ियों की कभी भी दशा बिगाड़ सकता है, वो नए रणबांकुरों का क्या हाल करेगा।

आज अगर वो टीम को जीत दिलाता है तो कोई शिकायत नही, लेकिन अगर किसी भी आपके प्रदर्शन में थोड़ी सी भी चूक हुई, तो आप देखे बाहर का रास्ता, या फिर आपको इतनी बार अंदर बाहर किया जाऐगा कि आपका सन्यास अपने आप हो जाऐगा... आज वो टीम नही है जिसके हारने पर दुख होता था और जीतने पर खुशी इतनी की हर गली मुहल्ला दीवाली और ईद सा जगमगा उठता था।

आज अगर भारत जीतता है तो उस जीत का अहसास कराने के लिए तथाकथित पत्रकार बंधुओं का बहुत बड़ा योगदान होता है, आखिर पचास प्रतिशत खबरें तो इन्हीं सबसे मिलती है कि कौन खिलाड़ी कहा रहता है, उसकी गली कौन सी है, और जबर्दस्ती लोगों को पकड़ कर पूछना की आज भारत जीता है कुछ कहना चाहते है आप? लोगों को तब पता चलता है कि आज कोई मैच भी था, चलो कोई बाइट ही दे देते है, इसी बहाने हम टीवी पर आ जाएंगे...

बात साफ है क्रिकेट की आज की दशा भावनाओं से परे है, देश की जनता की नजरों में और खिलाड़ियों की नजरों में भी...अगर किसी के लिए क्रिकेट मायने रखता है तो बस मीडिया के लिए...

Monday, October 6, 2008

महिला मुख्यमंत्री !

मुख्यमंत्री की सलाह...
दोस्तों, बात अभी निकली ही थी, कि एक युवा पत्रकार की गोली मार कर हत्या कर दी गई।
शहर था राजधानी दिल्ली, जी हां वही दिल्ली जिसके युवा खुद को और शहरों की तुलना में अधिक खुले और स्वतंत्र मानतें है, और भई हो भी क्यों न दिल्ली शहर ही पढ़े-लिखे समझदार लोगों का जो है। अब यहां के युवा स्वतंत्र नही होंगे तो क्या...खैर।
लेकिन बेचारे दिल्ली के युवाओं की गगनचुंभी सोच और हर इंसान के अपनी मर्जी से जीनें के तरीके पर शायद दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित रोन लगाना चाहती है।
हमेशा से अपने दिए बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाली शीला दीक्षित ने फिर एक बयान दिया, जी हां... युवा पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या हुई। जिसकी चर्चा कितनी हुई आप सभी जानतें है, लेकिन मैडम से जब कुछ बंधुओं ने सवाल पूछा की 'राजधानी की सुरक्षा को लेकर आपकी क्या समझ बैठती है?' तो मैडम का जवाब आया की" इतनी रात को वो लड़की (सौम्या) घर से बाहर क्या करने आई थी, ऑड ऑवर्स में बाहर जाना तो खतरनाक होता ही है, खास तौर से लड़कियों के लिए"।
सुना मैडम की राय,
शीलाजी, आप शायद दिल्ली के मिरांडा हॉउस कॉलेज में पढ़ी है, आपने भी अपने छात्र जीवन में या युवावस्था में जिंदगी अपने अंदाज में जी होगी, और जाहिर सी बात है कि हर कोई जीताभी अपने ही अंदाज से है। सरकार किसी की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का अंकुश नही लगा सकती ।
चाहे वो कही आने-जाने की हो या घूमने की, वैसे मैं आपको बता दूं की सौम्या काम पर से लौट रही थी, अगर वो कहीं से आ भी रही थी तो क्या आपकी सरकार की, या आपकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
क्या आपकी सरकार कोई ऐसा कानून बनाया है, जिससे की निश्चित समय-अवधि के बाद सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? क्या सरकार या पुलिस जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल किसी समय अवधि के लिए ही करती है? और लड़कियों के लिए तो केवल अंधेरा होने तक की जिम्मेदारी पुलिस या प्रशासन की होगी... क्या शीला जी, कभी तो आप दिल्ली में देश के बाकी हिस्सों से आनें वाले बेचारे गरीब मजदूरों के कमाने खाने पर बवाल मचातीं है, और कभी लड़कियों को ऑड ऑवर्स में घर से बाहर निकलने पर दोषी ठहराती है। मैडम को शायद अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़नें की आदत है, लेकिन राजनीतिज्ञों द्वारा ऐसी राय देना वो भी खुद एक औरत होते हुए, बहुत औंछी सी बात लगती है।
क्या मैडम आप अपनी चुनावी रैलीओं में से देर से घर नहीं आती? क्या चुनावों के समय में आप रात-रात भर जनता के बीच बैठकें नही लेती?
वाह रि मेरे देश की महिला तेरी हालत तो आज भी वहीं है!
चुनाव जीतनें के लिए महिलाओं को को कुछ यूं रिझाओं की 'महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति को सुधारनें का सारा जिम्मा मैं अपने सिर लेती हूं, अपने सी बहन को वहां बैठाओं वो मर्दों की दुनिया हमारी हालत के बारे में क्या जानें, आज की नारी किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नही है हम क्या घर में बैठकर चूल्हा फूंकने के लिए है'
और दो बार मुख्यमंत्री बन जाने पर किसी कामगार महिला की हत्या को गलती करार दो उसी महिला की, क्योंकि वो देर रात को काम पर से लौट रही थी, और मुख्यमंत्री के अनुसार "देर रात को लोग एडवेंचर के लिए घूमतें है"
धन्य हो मेरे देश की महिला...
तूने जिसे अपने ह़क की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया वही तेरी न रही..


Saturday, October 4, 2008

मसाला खबरों की मंडी में मरता पत्रकार

खबर- 25वर्षीय युवा पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या। अब सवाल ये उठता है कि यहां हत्या एक लड़की होना बड़ी बात है, या कि एक पत्रकार की?जान किसकी गई? किसने अपना कुछ खोया? क्या उस मां और उसके परिवार ने? या उस चैनल ने? या इस देश के युवा वर्ग ने अपना एक साथी खोया है। बात गंभीर है। और सोचने वाली बात यह भी है, की टीआरपी में अव्वल रहने वाले चैनल के अंग्रेजी चैनल की पत्रकार की होती है और खबरचियों को खबर तक नही लगती। बात थोड़ा चकित करती है...
आखिर आपका चैनल तो सर्वश्रेष्ठ था भई, क्या हुआ? खबर को सूंघने की क्षमता खत्म हो गई थी क्या?
या जुकाम लग गया था।
तथाकथित पत्रकारों ने ये भी ग़निमत भी न समझी की पुलिस से ही थोड़ी तफ्तीश की जाती।
या कुछ रोष प्रकट किया जाता, लेकिन क्यों करें, हर स्टोरी में कुछ मसाला खोजने की आदत जो हो गई है दोस्तों को। भई अगर कहानी में कोई डीपीएस का एंगल न हो, और बीएमडब्लू कार न हो तो भाई कैसे कोई स्टोरी पर रिस्क लेता।
बेकार में चैनल की और फज़ीहत हो जाती...
पर अब तो सुधरों मेरे दोस्तों, दुनिया की नजरों में तो गिर चुके हो, अपने-अपनों और अपने आप की नजरों में तो मत गिरो...
एक बार तो कोई पत्रकार बंधु पुलिस की खबर लेता, कोई ये जानने की कोशिश करता कि पुलिस की कार्यवाही कैसी चल रही है, सौम्या के मां-बाप का क्या हाल है...
मेरे तथाकथित पत्रकार मित्रों थोड़ी भी ग़ैरत है तो एक बार उन पत्रकारिता के सिद्धांतों को याद करो जो कभी हमें पढ़ाए गए थे। बल्कि कुछ वरिष्ठ पत्रकार तो अभी भी किसी न किसी संस्थान में ये सिद्धांत पढ़ातें होंगे...
अब क्या पढ़ाओगे सर जी।

'लखटकिया के जाने का दुख'

एक खबर - टाटा की लखटकिया कार का सपना देखने वालों के लिए बुरी खबर थी की ' टाटा मोटर्स ने सिंगूर से अपने हाथ खींच लिए'। सोचने वाली बात यह भी थी की ये सपना देखा किसने? क्या ये सपना उस आदमी ने देखा जो उसी बंगाल, बिहार का है जहा आधा साल तो प्राकृतिक आपदाएं कहर ढ़ाती है, और आधे साल


नेता उत्पात मचाते है। पीड़ा देने वाली बात यह है कि यह सब वही अखबार लिख रहा था जो कभी मजदूरों, किसानों का पैरोकार माना जा रहा था। पता नही कहा गई वो नैतिकता अब...
और तर्क भी देखिए, 'अब सिंगूर का औद्योगिकीकरण रुक जाएगा, इससे वहां के लोगों के सपने हुए चूर-चूर'। अरे भाई किसके सपने हुए चूर... गरीब किसान के जिसे अपनी भूमि देनी पड़ रही थी, या की उसके जिसके सिंगूर में अपना मोटर साइकिल का शोरूम खोलना था, या की उन बैंको के जिन्होनें सिंगूर में अपनी शाखाएं बढ़ाकर 2 से 7 कर दी थी। कभी कॉमरेडो को अगर सबसे ज्यादा किसी से सरोकार होता था, तो वो था मजदूरों से किसानों से, गरीब और दलित वर्ग से। लेकिन अब शायद सरोकार की परिभाषा बदल गई है। और ये बात उस अखबार पर भी लागू होती है जिसमें कि ये बॉटम स्टोरी छपी थी, और उन तथाकथित कॉमरेडो पर भी, जो किसी परियोजना के बंद होने का दुख ऐसे मनाते है मानो भारत में भाजपा की सरकार बन गई हो और आडवाणी प्रधानमंत्री।
आगे सुने लेखक ने क्या लिखा है 'जमीन के बदले किसानों को जो पैसे मिले थे उसकी तो उन्होनें सपने मे भी कल्पना नही की थी, जमीन के एवज में मिले इन लाखो रू ने दो जून भर पेट भात को तरसते इन किसानों की जिंदगी में पहिए लगा दिए' । अगर ये परियोजना इतनी ही लाभकारी होती, वहां के किसानों के लिए तो, इतना विरोध नही होता, इतना खून नहीं बहता... जो सिंगूर की उस भूमि को लाल कर गया शायद सीपीएम कैडरो से भी ज्यादा लाल सिंगूर की वो जमीन है जहा के बच्चे-बच्चे ने अपने अपनों को उस जमीन के लिए लड़ते देखा है जो जमीन आपके अनुलार उन्हें दो जून का भात तक नही दे सकी।

क्रांति किसी लालच की मोहताज नही, रुपयों से इंसान खरीदे जाते है, ईमान नही...इंसान-इंसान की बात है, कोई बीमार मां को घर से निकाल देता है, तो कोई बंजर भूमि के लिए गोली खा कर शहीद हो जाता है। जिस बेटे ने अपने बाप को उसी जमीन के लिए मरते देखा हो, वो भला कैसे कुछ रुपयों में अपने बाप के खून का सौदा कर देगा। शायद तो नही...






Friday, October 3, 2008

अपना-अपना स्वार्थ

साल खत्म होने को है, और दिल्ली विधान सभा चुनावों के सामने, बात समझनें की कोशिश करें तो दोनों में कोई फर्क नही है। पूरे साल जो भी घटा दिल्ली में, जो भी इस शहर ने देखा चाहे वो बम घमाके हो या एनकाउंटर, महंगाई की मार हो या कॉलोनियों को नियमित करने के सरकार के वादे, इस साल पर भी वही बीती जो दिल्ली की बेचारी जनता पर बीती, ये साल भी बेचारा कभी सृष्टी के खत्म होने की चिंता में लगा रहा, तो कभी टेलीविजन चैनलों में बैठे पंडितों की भविष्यवाणियों से, फर्क बस इतना था की कही नेता जनता को बेवकूफ बना रहे थे, तो कही तथाकथित पत्रकार।

बेचारे साल की भी वही हालत थी जो दिल्ली की जनता की। मैं साल की दिल्ली की जनता से इसलिए

तुलना कर रहा हूं क्योंकि दोनों ही जगह उनको ठगा गया जो कि पूरक है उनके, जो उनको ठग रहे थे।

होना क्या था जैसे की नेता वापस आए जनता के पास वैसे ही, हमारे चैनल वाले मीडिया बंधु भी वापस आ गए लोगो को कल का पंचाग बताने के लिए, और बात गई-आई हो गई। वही नेता साल खत्म होने से पहले लोगों के घर-घर जा कर अपनी ही कही बात को गई आई करके फिर चल देंगे, उसी जनता को ठगनें। सृष्टी खत्म होनें पर पंचाग का कैसे पता चलेगा मीडिया बंधुओं को? और जनता के वादे पूरे कर देंगे अगर नेता तो, चुनावों में उन्हें क्या कहेंगे? इसलिए दोनों बेचारो का हाल एक जैसा है...

आखिर नेताओं को नए वादे देनें है, और न्यूज चैनलों को साल का पंचाग। कहा जाता था कभी की, 'पत्रकार जनता को ठगने वाले लोगों के खिलाफ एक आवाज है कलम के माध्यम से' । बात साफ हो जाती है की सच और झूठ में अब अंतर कुछ रहा नही है, जिसे जो चाहिए वो लेने के लिए इंसान तो क्या भगवान,ब्रह्माण्ड, और नक्षत्रों को भी नही बख्शा जाएगा...

Friday, March 7, 2008

आज जिंदगी ऐसे मुकाम पर ला कर खड़ी है की क्या करे कुछ ने पता, हम दुनिया को बदलने का बीडा उठाए थे पर हमसे ही कोई बदल गया! लोग कैसे वादे करते है कसम खाते है , पर सब समाज के झूठे रिवाजों के चलते खोखले हो हो जायेंगे ये पता न था ! कैसे कोई इतना बदल सकता है, कैसे कोई किसी को आधुरे में छोरकर जा सकता है !कभी तो कोई जरुरी जिंदगी भर के लिए, कभी वही कुछ भी नही पल भर के लिए! प्यार के बदलते इस परिवेश को आप क्या नाम देंगे, पता नही। हां लेकिन मेरे जैसे तो ये सवाल जिंदगी भर आपने जेहन मी ले कर समझने की कोशिश करेंगे! आज का युवा आपने को बहुत उदारवादी साबित करता है , खासकर लड़किया , पर जब भी कोई निर्णय लेने की बात हो उन्ही को सबसे पहेले समाज, माँ बाप की इज्जत, सब याद आ जाती है ! पहेले जिंदगी भर साथ देने की कसम लो, फिर कह दो की कुछ नही हो सकता, ओर अगर यही लडके कह दे तो वे धोखेबाज कहलाते है! ओर वे कहें तो समाज, मां-बाप का दबाव..