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Thursday, September 17, 2009

आई-आई आरूषि आई...


कहावत सुनी होगी की राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट, वास्तविक परिदृश्य में आरूषि नाम की सेल फिर खुली है...


आई-आई आरुषि आई... डिस्काऊंट है भाई, डिस्काऊंट है भाई...


नोएडा से खुर्जा, बना कल-पुर्ज़ा, खूब सजाओं रनडाऊन में,


क्या रखा है ख़बर फाऊंड में...


आई-आई आरूषि आई...


शिफ्ट इंचार्ज की बला टली, कहां से लाएं वापस खली,


शुक्र है कि मोबाईल मिल गया, प्रड्यूसरों का चेहरा खिल गया,


आई-आई आरूषि आई...


खूब चैप्टर प्लेट लगाओं, कोइ नया जासूस बुलाओ,


कोई जाकर स्टिंग कटवाओं, एक बढ़िया प्रोमों बनाओं,


आई-आई आरूषि आई...


एक ओबी वहां लगाओ, एक ओबी यहां लगाओ,


सारी ओबी जल्दी बुलाओ,


आई-आई आरूषि आई... कोई ब्रेकिंग की पट्टी चलाओ, कोई जाकर हाथ छपाओं,


कोई जाकर नौकरानी को लाओ, कोई जाकर बाईट ले आओ...


आई-आई आरूषि आई...


बहुत काम है क्या करते हो?, जल्दी लाओ कोई बड़ा सैटर,


टीआरपी का है ये मैटर,


आई-आई आरुषि आई...

Friday, September 11, 2009

मेडिकल की पढ़ाई, जाति की दुहाई...!


मेडिकल के छात्र भी अछूते नहीं है जातिवाद से और किसी की क्या कहें... वाह रे मेरा देश! बिहार के मेडिकल कॉलेज में 8 अलग-अलग जातियों के लिए अलग से मैस/ कैंटीन है। भूमिहार के लिए अलग मैस, ठाकुरों के अलग मैस, कु्र्मी छात्रों की अलग मैस, ब्राह्मणों को तो छूट कहीं भी खा सकते हैं मर्जी हो तो, वैसे वो केवल सवर्णों में ही खाना पसंद करते है। देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन नें 10 सितंबर 2009 की सुबह 9 बजकर 36 मिनट पर खबर दिखाई की मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में मेडिकल की पढ़ाई करनें वाले जूनियर और सीनियर डॉक्टर आज भी नीची जाति के अपनें सहपाठियों के साथ खाना नहीं खाते। यहां तक की छात्रों नें जाति आधारित अपनें लिए अलग से मैस/ कैन्टीन भी बनाए हैं। जिसमें केवल उस जाति विशेष के लिए खाना बनता है। मेडिकल कॉलेज का जो मैस है, उसमें केवल जूनियर औऱ सीनियर डॉक्टर ही खाना खाते हैं वो भी सवर्ण वर्ग के । इस बात की पुष्टि करते हुए मेडिकल कॉलेज के एक छात्र नें गौरवांवित होते हुए कहा कि "हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि हमारे मेडिकल कॉलेज में जाति आधारित मैस है औऱ वो छात्रों द्वारा ही संचालित किए जाते हैं इसमें कॉलेज प्रशासन का कोई हाथ नहीं है"। एक अन्य छात्र का कहना था कि "यही हाल पूरे बिहार के मेडिकल कॉलेजों का है"। अब सवाल ये उठता है कि क्या जातिवाद के खत्म होनें की बात करनें वाले हमारे तथाकथित पत्रकारों, साहित्यकार औऱ लेखक मित्रों को जो ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लवादी हमलों और महाराष्ट्र में बिहार के लोगों के साथ होनें वाले कृत्यों की सिरे से भर्त्सना करते हैं उन्होनें इस विषय पर क्यों चुप्पी साध रखी हैं? गौतम बुद्ध की बिहार भूमि से ताल्लुक रखनें वाले हमारे मित्र क्या इसे छूआछूत नहीं मानतें? क्यों हमारे पूरे देश के लोगों को ये आदत हो गई है कि दूसरे के घर में गंदगी ज्यादा नज़र आती है? अपनें को हमेशा हम सही मानतें है। जब ये हाल समाज के सबसे प्रतिष्ठित काम करनें की शिक्षा ग्रहण करनें वालों का है, तो औरों को क्या सबक देंगें हम। थोड़े दिन पहले मेरे एक पत्रकर मित्र नें अपनें ब्लॉग से दिलीप मंडल के ब्लॉग रिजेक्टमाल का लेख भेजा। जिसमें की दिलीप मंडल दो पत्रकारों को ये ज्ञान दे रहे थे कि 21वीं सदीं में कोई किसी की जाति नहीं पूछता और हर बार आधुनिकता की दुहाई दे रहे थे। क्या हमारे समाज का ये आईना हमारे बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं देता। ये (मेडिकल के छात्र) हमारे समाज का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा तबका है जो कि कल डॉक्टर बन के लोगों की सेवा करनें की शपथ लेगें बिना किसी भेदभाव के। विदेशों से आई इस शिक्षा (मेडिकल) में शायद जब ये शपथ बनाई गई होगी तो विदेशों में उस समय काले-गोरों और अलग धर्मों का संघर्ष रहा था, ऐसे में जान बचानें वाले इस पेशें में केवल एक बात सिखाई जाती की इंसानियत से बड़ा कोई धर्म कोई जाति नहीं। लोग मिसाल देते की डॉक्टर भगवान का रूप है। क्यों क्योंकि उसके लिए सब एक समान है, कोई भेद नहीं किसी से भी, सभी को स्वस्थ रखनें की जिम्मेदारी उनकी( डॉक्टरों) की है, वो प्राणदाता है। लेकिन मुज़फ़्फरपुर के इस मेडिकल कॉलेज नें और साथ-साथ बिहार के सभी मेडिकल कॉलेजों नें शायद इस सेवा को जाति के तराज़ू में तोल ही दिया। ये सच्चाई है कि बिहार में आज भी लोग किस प्रकार जाति के आधार पर बटें है कि नाम से पहचाननें की कोशिश करते हैं कि फलां व्यक्ति किस जाति का है। यदि उसके नाम के पीछे कुमार लिखा हो तो सवाल ज्यादा परेशान करता है। मैनें ऐसा अनुभव अपनें स्टार न्यूज़ में काम करनें के दौरान लिया था। तब सोचा कि फर्जी हलवाई की दुकानों पर ज्ञान बघारनें वालों की ये सोच होगी शायद जो कि अब चैनलों में बैठ ज्ञान बघार रहे हैं और आज भी खुद को ठाकुर पंडित कहलवानें में गौरवांवित होते हैं। लेकिन ये हाल तो मेडिकल जैसे सेवा क्षेत्र का है भी है। कैसे डॉक्टर होंगे वो जो कि केवल अपनीं ही जाति के लोगों का इलाज करेंगे? कैसे आईएएस होंगे वो जो केवल बिहार कॉडर के लिए सीविल सर्विसि्स का पेपर पास करे? ऐसा तो नहीं होना चाहिए लेकिन क्या होना चाहिए औऱ क्या नहीं इन शब्दों का मतलब केवल मुंबई दिल्ली जैसे शहरों के लिए ही मान्य रह जाता है। बिहार के लिए शायद नहीं ! क्या पुलिस नें किया, क्या लोगों नें किया, क्या होना चाहिए था, क्यों होना चाहिए था, सारे सवाल जवाब सारे कागद कारे, सारे संपादकीय, सारी स्पेशल रिपोर्ट औऱ सारे न्यूज़ पोईंट केवल दिल्ली-मुंबई और आस्ट्रेलिया तक सिमट कर रह जाते हैं और अपनें घर की घर की गंदगी किसी को भी नज़र नहीं आती। वाह रे मेरे देस के गुणवानों...लगे रहो!

Thursday, September 3, 2009

डॉक्टरी आला छोड़ कूद पड़ा मैदान में...


भारतीय राजनीति के वास्तविक परिदृश्य पर यदि सरसरी नज़र डाले तो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी जैसे नेता बहुत कम नज़र आते है। बात चाहे किसी भी पार्टी की हो या केवल कांग्रेस की, उनके मुकाबले का ज़मीनी नेता तो शायद कांग्रेस में भी नहीं है । 28 साल की उम्र में डॉक्टरी जैसे पेशे को छोड़कर क्यों करके राजनीति में आना वो भी मुख्यधारा की राजनीति में। किसी राज्य विशेष से राज्य सभा के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष के दम पर अपनें राजनीतिक जीवन के यौवन से, परिपक्व राजनीति की धूरी बननें तक के सफ़र को अंजाम देनें की ओर अग्रसर रहे राजशेखर रेड्डी। आंध्र प्रदेश में एनटीआर के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालनें के लिए उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बनीं बनाई सत्ता का स्वाद चखा। एनटीआर का कोई राजनीतिक वारिस (पुत्र) ना होनें का लाभ उन्हें मिला और एनटीआर की दो पत्नियों के होनें की वजह के बावजूद उन्हें एनटीआर का राजनीतिक वारिस माना गया और जनता की स्वीकृति मिली। आंध्र की राजनीति पर यदि एक निगाह डालें तो हम देखते हैं कि जो विश्वास लोगों को सिनेमा घर तक खींचता है, वही विश्वास राजनीति में, उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा को भी पूरा करनें में सफल होता है। आंध्र प्रदेश की जनता चाहे शहरों की हो या गांवों कस्बों की वो नेता और अभिनेता में खासा अंतर कर पानें में शायद उतनी सफल नहीं हो पाई थी जितनी की उत्तर-भारत की जनता रहती है। इस माहौल में आंध्र प्रदेश जैसे राज्य के लोगों की ज़मीनी हक़ीक़त को जाननें के लिए वाई एस राजशेखर रेड्डी नें उनसे सीधे संपर्क करनें के लिए 1400 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके एनटीआर जैसे नेता कि राजनीतिक विरासत संभाल रहे चंद्रबाबू की गद्दी को उखाड़ दिया। राजशेखर रेड्डी को लोगों ने सन् 2004 में राज्य की सत्ता के शिखर बैठ ये साबित कर दिया था कि राजनीति केवल भाषण देनें भर से या किसी नेता की कुर्सी पर उसके उत्राधिकारी के बैठ जानें भर से नहीं की जाती। जनता का भला करनें के लिए जनता से सीधे संपर्क करना पड़ता है। राजशेखर रेड्डी वास्तिक राजनीति में एक उदाहरण के रूप में साबित हुए। बिना किसी धर्म के पैरोकार बन, बिना कोई रथ लिए, बिना किसी जाति या संप्रदाय की लाठी थामें। बस जनता के लिए जनता की आवाज बनकर निकले थे औऱ पा गए उनका विश्वास। ऐसा नहीं है कि सत्ता पानें के बाद राजशेखर रेड्डी ने जनता से किए अपनें वादों से फिर गए हो या केवल घोषणाओं के अंबार भर से काम चलाया। राजशेखर रेड्डी ने मुख्यमंत्री रहते हुए भी जनता के बीच जाना नहीं छोड़ा और अपनी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लागू करवानें के लिए या उनके लागू होनें से संबंधित लोगों (विधायकों, नौकरशाहों) से संपर्क साधनें में भी वे पीछे नहीं रहते थे। जनता तक उनकी योजनाओं के पहुंचनें तक की सारी कार्यप्रणाली का जायज़ा राजशेखर रेड्डी स्वंय लिया करते थे। और इसी कारण आंध्र प्रदेश की जनता नें राजशेखर रेडडी को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया और उनके कार्यों से प्रभावित होकर ही कांग्रेस को लोकसभा के चुनावों में भारी जीत भी दिलवाई। क्या किसान, क्या मज़दूर क्या मध्यम वर्गीय लोग सभी के नेता के रूप में पहचान बनाई राजशेखर रेड्डी नें। हमें ये कहनें भी ज़रा भी हिचक महसूस नहीं होनी चाहिए की राजशेखर रेड्डी का नाम कांग्रेस से बढ़कर था आंध्र प्रदेश की जनता के लिए। आज देश को ऐसे ज़मीनी नेताओं की बहुत अधिक आश्यकता है। अपनी इसी कार्यप्रणाली के चलते वे कभी ठहरते नहीं थे। ख़राब मौसम हो या कोई आपदा राजशेखर रेड्डी की दिनचर्या के हिस्से मं था कि किसी भी योजना के क्रियांवन से संबंधित जानकारी लेनें के लिेए वे स्वंय जाते। एक नेता का क्या काम है औऱ कैसे राजनीति में आप लंबे समय तक कायम रह सकते हैं ये राजशेखर नें साबित किया था। केवल अपनें कार्यों और जनता से सीधे संपर्क के माध्यम से। औऱ अपनें इन्हीं कार्यों के चलते वे 2 सितंबर 2009 को अपनें नियमित दौर पर जा रहे थे कि हैलीकॉप्टर दु्र्घटना में उनका निधन हो गया। हालांकि उन्हें ख़राब मौसम के चलते अपना दौरा रद्द करनें की भी सलाह दी गई थी लेकिन वे अपनें दौरों को किसी भी हालत में रद्द नहीं करना चाहते थे। भारतीय राजनीति के लिए और देश में ज़मीनी सोच रखनें वाले लोगों के लिए वाई.एस.राजशेखर रेड्डी का जाना बहुत बड़ी क्षति है। हमारे देश में आज ऐसे कितनें नेता होंगें जो की बिना किसी राजनीतिक विरासत संभाले अपनें को केवल अपनें औऱ जनता के दम पर ही नेता साबित करते है और अपनी कथनी औऱ करनी में अंतर नहीं करते?
एक बार आंध्र प्रदेश विधान सभा में वाईएसआर नें चंद्रबाबू नायडू से कहा था कि मैं 60 वर्ष की आयु के बाद मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगा, और उम्र के 60वें साल में वे जिंदगी से संयास ले गए। वाई.एस.राजशेखर रेड्डी का जाना भारतीय राजनीति के लिए बहुत बड़ी क्षति है...