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Friday, September 11, 2009

मेडिकल की पढ़ाई, जाति की दुहाई...!


मेडिकल के छात्र भी अछूते नहीं है जातिवाद से और किसी की क्या कहें... वाह रे मेरा देश! बिहार के मेडिकल कॉलेज में 8 अलग-अलग जातियों के लिए अलग से मैस/ कैंटीन है। भूमिहार के लिए अलग मैस, ठाकुरों के अलग मैस, कु्र्मी छात्रों की अलग मैस, ब्राह्मणों को तो छूट कहीं भी खा सकते हैं मर्जी हो तो, वैसे वो केवल सवर्णों में ही खाना पसंद करते है। देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन नें 10 सितंबर 2009 की सुबह 9 बजकर 36 मिनट पर खबर दिखाई की मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में मेडिकल की पढ़ाई करनें वाले जूनियर और सीनियर डॉक्टर आज भी नीची जाति के अपनें सहपाठियों के साथ खाना नहीं खाते। यहां तक की छात्रों नें जाति आधारित अपनें लिए अलग से मैस/ कैन्टीन भी बनाए हैं। जिसमें केवल उस जाति विशेष के लिए खाना बनता है। मेडिकल कॉलेज का जो मैस है, उसमें केवल जूनियर औऱ सीनियर डॉक्टर ही खाना खाते हैं वो भी सवर्ण वर्ग के । इस बात की पुष्टि करते हुए मेडिकल कॉलेज के एक छात्र नें गौरवांवित होते हुए कहा कि "हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि हमारे मेडिकल कॉलेज में जाति आधारित मैस है औऱ वो छात्रों द्वारा ही संचालित किए जाते हैं इसमें कॉलेज प्रशासन का कोई हाथ नहीं है"। एक अन्य छात्र का कहना था कि "यही हाल पूरे बिहार के मेडिकल कॉलेजों का है"। अब सवाल ये उठता है कि क्या जातिवाद के खत्म होनें की बात करनें वाले हमारे तथाकथित पत्रकारों, साहित्यकार औऱ लेखक मित्रों को जो ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लवादी हमलों और महाराष्ट्र में बिहार के लोगों के साथ होनें वाले कृत्यों की सिरे से भर्त्सना करते हैं उन्होनें इस विषय पर क्यों चुप्पी साध रखी हैं? गौतम बुद्ध की बिहार भूमि से ताल्लुक रखनें वाले हमारे मित्र क्या इसे छूआछूत नहीं मानतें? क्यों हमारे पूरे देश के लोगों को ये आदत हो गई है कि दूसरे के घर में गंदगी ज्यादा नज़र आती है? अपनें को हमेशा हम सही मानतें है। जब ये हाल समाज के सबसे प्रतिष्ठित काम करनें की शिक्षा ग्रहण करनें वालों का है, तो औरों को क्या सबक देंगें हम। थोड़े दिन पहले मेरे एक पत्रकर मित्र नें अपनें ब्लॉग से दिलीप मंडल के ब्लॉग रिजेक्टमाल का लेख भेजा। जिसमें की दिलीप मंडल दो पत्रकारों को ये ज्ञान दे रहे थे कि 21वीं सदीं में कोई किसी की जाति नहीं पूछता और हर बार आधुनिकता की दुहाई दे रहे थे। क्या हमारे समाज का ये आईना हमारे बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं देता। ये (मेडिकल के छात्र) हमारे समाज का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा तबका है जो कि कल डॉक्टर बन के लोगों की सेवा करनें की शपथ लेगें बिना किसी भेदभाव के। विदेशों से आई इस शिक्षा (मेडिकल) में शायद जब ये शपथ बनाई गई होगी तो विदेशों में उस समय काले-गोरों और अलग धर्मों का संघर्ष रहा था, ऐसे में जान बचानें वाले इस पेशें में केवल एक बात सिखाई जाती की इंसानियत से बड़ा कोई धर्म कोई जाति नहीं। लोग मिसाल देते की डॉक्टर भगवान का रूप है। क्यों क्योंकि उसके लिए सब एक समान है, कोई भेद नहीं किसी से भी, सभी को स्वस्थ रखनें की जिम्मेदारी उनकी( डॉक्टरों) की है, वो प्राणदाता है। लेकिन मुज़फ़्फरपुर के इस मेडिकल कॉलेज नें और साथ-साथ बिहार के सभी मेडिकल कॉलेजों नें शायद इस सेवा को जाति के तराज़ू में तोल ही दिया। ये सच्चाई है कि बिहार में आज भी लोग किस प्रकार जाति के आधार पर बटें है कि नाम से पहचाननें की कोशिश करते हैं कि फलां व्यक्ति किस जाति का है। यदि उसके नाम के पीछे कुमार लिखा हो तो सवाल ज्यादा परेशान करता है। मैनें ऐसा अनुभव अपनें स्टार न्यूज़ में काम करनें के दौरान लिया था। तब सोचा कि फर्जी हलवाई की दुकानों पर ज्ञान बघारनें वालों की ये सोच होगी शायद जो कि अब चैनलों में बैठ ज्ञान बघार रहे हैं और आज भी खुद को ठाकुर पंडित कहलवानें में गौरवांवित होते हैं। लेकिन ये हाल तो मेडिकल जैसे सेवा क्षेत्र का है भी है। कैसे डॉक्टर होंगे वो जो कि केवल अपनीं ही जाति के लोगों का इलाज करेंगे? कैसे आईएएस होंगे वो जो केवल बिहार कॉडर के लिए सीविल सर्विसि्स का पेपर पास करे? ऐसा तो नहीं होना चाहिए लेकिन क्या होना चाहिए औऱ क्या नहीं इन शब्दों का मतलब केवल मुंबई दिल्ली जैसे शहरों के लिए ही मान्य रह जाता है। बिहार के लिए शायद नहीं ! क्या पुलिस नें किया, क्या लोगों नें किया, क्या होना चाहिए था, क्यों होना चाहिए था, सारे सवाल जवाब सारे कागद कारे, सारे संपादकीय, सारी स्पेशल रिपोर्ट औऱ सारे न्यूज़ पोईंट केवल दिल्ली-मुंबई और आस्ट्रेलिया तक सिमट कर रह जाते हैं और अपनें घर की घर की गंदगी किसी को भी नज़र नहीं आती। वाह रे मेरे देस के गुणवानों...लगे रहो!

1 comment:

नई पीढ़ी said...

''अब सवाल ये
उठता है कि क्या जातिवाद के खत्म होनें की बात करनें वाले हमारे तथाकथित
पत्रकारों, साहित्यकार औऱ लेखक मित्रों को जो ऑस्ट्रेलिया में भारतीय
छात्रों पर हो रहे नस्लवादी हमलों और महाराष्ट्र में बिहार के लोगों के
साथ होनें वाले कृत्यों की सिरे से भर्त्सना करते हैं उन्होनें इस विषय
पर क्यों चुप्पी साध रखी हैं? ''

सही कहा ऐसे डॉक्टरों के जातिवादी कैंसर का इलाज अपने ही गांव-शहर से होना चाहिए. और यह इलाज भी समाज के सबसे निचले तबके के लोग ही कर सकते हैं.