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Thursday, May 28, 2009

डेरा संस्कृति और सिख संप्रदाय

24 मई 2009 रविवार को ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में डेरा सचखंड बल्लां वाला के संत निरंजन दास और संत रामानंद पर हुए हमले की प्रतिक्रिया 25 मई को भारत के पंजांब, हरियाणा और जम्मू में दिखी। जिसका हर्जाना लगभग पूरे उत्तर भारत को उठाना पड़ा। पंजाब के रास्ते जानें वाले सभी मार्ग रेल और सड़क बंद, काम-धंधे बंद, कई जगह आगजनी, विरोध प्रदर्शन, तोड़-फोड़, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, कई बसे, ट्रेनें यहां तक की एटीएम तक को आग भीड़ ने आग के हवाले कर दिया। टेलीविजन पर खबरें आ रही थी की विएना में एक गुरुद्वारे में हुए हमले के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं, लोग समझ रहें थे कि गुरुद्वारे पर हमला विएना (ऑस्ट्रिया) में हुआ है फिर ये लोग यहां क्यों प्रदर्शन कर रहे है? और एक बात प्रदर्शन करनें वालों में सिखों की संख्या का अनुपात भी कम नजर आ रहा था, कारण क्या है कुछ समझ में नहीं आ रहा था। शायद बात को मीडिया बंधु सही तरह से समझ नहीं पाए थे कि बात आखिर हुई क्या है। दरअसल ऑस्ट्रिया के विएना में जो गुरुद्वारा सचखंड साहिब है वो किस प्रकार अन्य गुरुद्वारों के भिन्न हैं, पंजाब के डेरों में डेरा सचखंड साहिब बल्लां रामदासियों और रविदासियों(आम भाषा में यदि हम कहें तो चमारों) का का डेरा कहा जाता है।डेरा सच खंड की स्थापना 70 साल पहले संत पीपल दास ने की थी। पंजाब में डेरा सच खंड बल्लां के करीब 14 लाख अनुयायी हैं।
वैसे तो पंजाब में 100 से ज्यादा अलग-अलग डेरें हैं, पर डेरा सच के अनुयायियों में ज्यादा संख्या में दलित सिख और हिंदू है। पंजाब में दलितों की आबादी लगभग 34 प्रतिशत है। रविदासिए मतलब भक्तिकाल के महान सूफी संत रविदास के अनुयायी। जिन्होनें की जाति-व्यवस्था के विरुद्ध समाज की कल्पना की थी। सिख धर्म के कई समूह डेरा संस्कृति के खिलाफ रहे हैं। क्योकिं इन डेरों के प्रमुख खुद को गुरु दर्शाते हैं। फिर इनके डेरों में गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश क्यों होता है। यहां सवाल ये भी खड़ा होता हैं कि निरंकारी, राधा-स्वामी ब्यास, डेरा सच्चा सौदा और न जानें कितनें ही ऐसे डेरे हैं जहां के गुरु सिख ही हैं, और वे भी गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी को ही अपनें सत्संग में बाटंतें है। या शायद ऐसा हैं कि समाज में उच्च वर्गों के द्वारा चलाए जानें वाले डेरों से सिख के किसी समूह को परेशानी नहीं है लेकिन निम्न वर्गों जिन्हें कि सिख धर्म में तिरस्कार झेलना पड़ा हो, उनके डेरों से ही सिख धर्मावलंबियों को ऐतराज है। अब समझ में ये नहीं आता की ऐतराज सभी डेरों के प्रमुखों से है जो कि खुद को गुरु कहलाते हैं, या कि डेरा सच खंड से है? एक धड़े का ये भी मानना है कि वे संत रविदास को गुरु के रूप में मानते हैं इससे उन्हें ऐतराज है। सिख धर्म की स्थापना करते समय गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म में जाति व्यवस्था कि कल्पना नहीं की थी, हिन्दू धर्म की कुरितियों से परे ही सिख एक अलग पंथ बना। पर
धर्मावलंबियों के आशीर्वाद से जातिवाद का दंश ऐसा बोया गया कि संत रविदास जैसों को जन्म लेना पड़ा। सिख धर्म में जातिवाद की टीस झेल रहे नीची जाति के सिखों रामदासिये, सिक्लीकर, बाटरें, रविदासिए सिख,मोगरे वाले सरदार,मजहबी सिख,बेहरे वाले,मोची,अधर्मी(आदि-धर्मी), रामगढ़िए, और न जाने कितनी दलित जातियों के लोगों को सिख धर्म ने भी वही कुछ दिया जो कि हिंदू धर्म में सवर्णों ने दलितों को दिया, सिर्फ यातना। क्यों जरूरत पड़ी की इतने डेरे खुले उसी पंजाब में जिसमें की अलग पंथ की नीव रखी गई थी इस उद्देश्य से, कि कोई ऐसा धर्म हो जो कि सभी लोगों को बराबरी का अधिकार दे, जिसमें वर्ण व्यवस्था का मनुवादी दंश न हो। जिसमें मूर्ति पूजा न हो, जिसमें गुरु वो परमात्मा है जो कि निराकार है, जिसका कोई आकार नहीं है। दस गुरुओं तक गद्दी चली दसेवें गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहां "सब सिख्खन को हुक्म है गुरु मानयों ग्रथ" मतलब अब कोई गुरु नहीं होगा गुरु ग्रथ साहिब ही गुरु होगी। लेकिन गुरुद्वारों में सिख जट्टों का वर्चस्व रहता देख, समाज के सबसे निचले वर्ग के लोगों को ने डेरों का सहारा लिया। कहनें को इन डेरों में सभी को समान माना जाता है। पर कई डेरों में पैसे वाले लोगों का वर्चस्व है और बहुतेरे ऐसे भी हैं जिनके अनुयायिओं में दलित और समाज में निम्न वर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। डेरा सच खंड भी उन्हीं में से एक है। सवाल अब भी वही है कि क्या डेरा सच खंड के प्रमुख संत निरंजन दास और उनके चेले संत रामानंद ने कोई ऐसा काम किया था जिससे की सिख धर्मावलंबियों को ऐतराज था ? क्या डेरा सच्चा सौदा सिरसा के प्रमुख गुरमीत राम-रहीम की भांति इन संतों के परिधानों में उन्हें गुरु गोबिंद सिंह की झलक दिखाई दे रही थी ? क्यों गोली मारी गई? क्या शिकायत थी? शायद विएना के
गुरुद्वारे डेरा सचखंड बल्लां वाल में सिख गुरुद्वारों की तुलना में चढ़ावा अधिक आ रहा था। डेरा सच खंड बल्लां वाला के प्रमुख निरंजन दास आज तक घायल अवस्था में हैं औऱ उनके चेले और डेरे के उप-प्रमुख संत रामानंद की मृत्यु हो चुकी है। सिख के किसी समूह को शायद दलितों औऱ पिछड़ों के डेरों पर हमला करना आसान लगा होगा। या फिर जातिवाद के भयावह चेहरे में पंजाब की 34 प्रतिशत दलितों के आबादी का एक साथ होने की प्रतिक्रिया थी? जिन्हें की सिख समाज ने हमेशा तिरस्कृत किया चाहे वह भी सिख ही क्यों न हो। सवाल के पहलू क्या हैं ये सिख धर्म के पैरोकार जानते हैं और कोई नहीं।

नवीन कुमार ‘रणवीर’
भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली (07-08 बैच)

Saturday, May 23, 2009

मेरे मित्र ऋषि कुमार सिंह के ब्लॉग पनिहारन पर जरनैल सिंह के जूते के प्रकरण पर छिड़ी बहस पर हमनें भी कुछ कहा...जूते की प्रासंगिकता पर एक और तर्क शायद लोकसभा चुनावों के मद्देनजर ही नहीं मानव जाति के संदर्भ में भी शायद सही साबित होता हो....
जैदी और जरनैल सिंह दोनों की पीड़ा और प्रतिक्रिया में अंतर नहीं किया जा सकता, बात सही है...इस जूता प्रकरण से एक वाकिया याद आता है, किशोरावस्था में मैं एक बाग में खेलते वक्त बंदरों के झुंड में फंस गया था, मैं भागनें में तेज था तो किसी तरह अपनी जान बचा कर भाग और बच गया। मैंनें ये बात अपनी अम्मा को बताई तो अम्मा ने अपने अनुभवों के अनुसार एक टोटका बताया, कि कभी बंदरों के झुंड में फंस जाओ तो अपनी चप्पल या जूता निकाल कर हाथ में ले लेना बंदर तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे...मैंनें पूछा अम्मा क्यों बंदर क्या जूते से डरते हैं? अम्मा बोली कि बंदर इस बात से डरते हैं कि जिस बंदर को जूता पड़ा वो झुंड से अलग कर दिया जाएगा...इसलिए बंदरों के लिए ये टोटका अम्मा के समय प्रासंगिक था तो उन्होनें मुझे बता दिया, पर आज के राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए भी ये प्रासंगिक लगता है, अम्मा तो अब इस दुनिया में नहीं हैं...मैंने उस समय तो उनके टोटके को अंधविश्वास भर माना, पर आज लगता है कि जूता कितना प्रभावशाली है,शायद सही कहा हो अम्मा ने...आखिर इंसान के पुर्वज भी तो बंदर ही थे...।

दोस्तों ये मेरे अपनें विचार हैं जो कि इस सारे घटनाक्रम के होनें पर सही या गलत दोनों हो सकते हैं...

Monday, May 18, 2009

बीजेपी की हार पर परेशान पत्रकार

बीजेपी की हार या आडवाणी की हार? मोदी के कारण हार या आडवाणी के कारण हार? बीजेपी के खुद के कारण हार या सहयोगी दलों के कारण हार?सवाल संघी कैम्प को परेशान कर रहा है,पता नहीं क्यों हमारे पत्रकार मित्र इस पर परेशान हो रहे हैं. बीजेपी के साथ दिक्कत है की विचारधारा में ही विरोधाभास रहा है, हमारा देश धर्मनिरपेक्ष हैं ये भाई लोगों से कहते नहीं बनता और राष्ट्रवाद का अपना अलग दर्शन लिए देश में पीएम इन वेटिंग और सीएम इन वेटिंग बनाते चलते हैं, अब तो शायद इन्हें आदत हो गई है वेटिंग रहनें की, अटलजी को भी कई साल वेटिंग लिस्ट में रहना पड़ा था कई बार तो ट्रेन ही कैंसल हो गई, लेकिन संघर्ष करते रहे, एक बार आरएसी में टिकट मिला 13 दिन सरकार चली,संसद ने चलान बना दिया भई आरएसी में भी दो लोग एक सीट पर बैठ कर जा सकते हैं अटलजी 13 लोग संग लिए थे. और लोकसभा की ट्रेन से उतार दिए गए,फिर टिकट लिया वेटिंग, फिर भी हार न मानी और 13 महीनों तक यात्रा पूरी हुई ही थी की गाड़ी के संग लगे एक एक्स्ट्रा इंजन ने ही साथ नहीं दिया और लोकसभा ऑउटर पर ही खड़ी हो गई. फिर किसी तरह जा कर टिकट कनफर्म हुआ और जोड-गुणा-भाग के चलते 5 साल चली बीजेपी-एनडीए पैसेंजर...अटलजी के बाद पहली बार बीजेपी ने नेता नम्बर दो आडवाणी का पीएम का टिकट भी वेटिंग में था पर गाड़ी कौन सी थी एक्सप्रेस या मेल, मालगाड़ी या पैसेंजर लोकल या राजधानी पता नहीं कौन सी गाड़ी है कहां जाना हैं कुछ पता नहीं. बस नागपुर रिजर्वेशन काउंटर से टिकट लिया और चल दिए स्टेशन की ओर, होना क्या था अटलजी का टिकट वेटिंग था तो मौका मिल ही गया किसी तरह, आडवाणी का टिकट तत्काल में वेटिंग था जहां कैंसिंलेशन के चांस कम होते हैं...कारण हमें तो इतना समझ में आता हैं

Thursday, May 14, 2009

कस्बा पर बहस धर्मनिरपेक्षता को चुनौती

रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा पर नीतीश कुमार के नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करनें पर रवीश कुमार की पोस्ट ' नीतीश नरेंद्र की नौटंकी' में टिप्पणियों का अंबार लग गया और बहस छिड़ी की क्या गलत किया जो अगर नीतीश और नरेंद्र मोदी एक हुए तो रवीश जी को क्या ऐतराज है, अफसोस की बेतुके तर्क देकर तथाकथित पत्रकारों ने इस दोस्ती के नए आयाम खोजे और धर्मनिर्पक्षता को ही चुनौती दे डाली। मैं भी बहस में कूदा और अपने तर्क आपसे साझा कर रहा हूं।

बहुत बहस हुई, लेकिन अफसोस इतना है कि फिर भी ऐसे लोग बहस में शामिल है जो कि कुछ समझना नहीं चाहते,कोई बात नहीं देश भरा पड़ा हैं ऐसे लोगों से जो सोचते हैं कि कांग्रेस ने इस देश को आजाद करवाया और भाजपा ने हिंदुओं के हित की बात की,जिनकी सोच में आज भी भारत के वामपंथी मजदूर-किसान के हक की बात करते हैं, और समाजवादियों का कांग्रेस विरोध शायद कांग्रेसियों से गलबहियों पर भी प्रतीत होता है.ये भारतीय संविधान में अगर लिखा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है तो क्या? सारी बात एक बार स्पष्ट हो जाती है कि किसी उम्मीदवार का जीतना उसकी नैतिकता का पैमाना है, जिस प्रकार आप जैसे लोग ही टेलीविजन पर परोसे जा रहे मसालेदार खबरों के व्यंजनों को चटकारें मारकर देख रिमोट से चैनल बदलते समय कह देते हैं कि क्या साला आज-कल इन न्यूज़ वालों को खबरें नहीं मिलती। आप उसमें मीडिया की नैतिकता पर सवाल खड़ा करते हैं कि खबरों के माएनें क्या होनें चाहिए, क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं, क्या खबर हैं और क्या नहीं, और जब आपको टीआऱपी दिखा कर आपके ही मित्र मुंह बंद करते हैं तो आप लोग फिर ब्लॉग पर मीडिया की नैतिकता पर उल्टी करनें लगते हैं, हमें ही खबरों के सिद्धांत बताते हैं.परंतु जब हम नरेंद्र मोदी,कल्याण सिंह या जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार के दंगों में लिप्त होनें की बात करते हैं जो आप केवल मोदी की जीत का हवाला देते हैं कि मोदी को जनता ने चुना है...भाई विरोधामास लोगों के विचारों में हैं, तर्क ये भी दिया जा सकता है कि जगदीश टाईटलर या सज्जन कुमार भी दोषी है,लेकिन जीततें तो वो दोनों भी हैं आपके संघी मदन लाल खुराना और स्व.साहिब सिंह भी उनसे हारे हैं, वो भी भारी अंतर से। तो क्या उन्हें चुनाव में टिकट नहीं दिया जाना चाहिए था, काम तो उन्होंनें भी करावाया था परंतु देश में गलत कृत्य करनेवालें की जीत या धर्मनिरपेक्ष होने का पैमाना उसकी जीत या उसके द्वारा किए गए विकास कार्य नहीं होना चाहिए। अगर देश के सभी सिख कांग्रेस के खिलाफ होते तो कांग्रेस की सरकार पंजाब में बनना इसके पैमानें को तय कर देता हैं कि कांग्रेस द्वारा जो 84 में हुआ वो भुलानें लायक है? या भाजपा की सरकार नें जो 92 में अयोध्या में किया वो भुलानें लायक है? जो सिंगूर-नंदीग्राम में हुआ वो भूलानें लायक है? या जो उड़ीसा के कंधमाल में ईसाईयों के साथ जो हुआ वो भुलानें लायक हैं? मेरे मित्रों आप नीतीश के चुनाव से पहले मोदी के बारे में दिए गए बयान को उड़ीसा में नवीन पटनायक के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी से अलग होनें के जैसा कृ्त्य नहीं मानतें? नवीन पटनायक को इस बार कंधमाल की घटना से सबक मिला और चुनाव से ठीक पहले अलग हो गए, और ऐसा ही कुछ हमारे नीतीश बाबू भी कर गए चुनाव के दौरान तो आपकी गाड़ी के पीछे मोदीजी के लिए लिखा था कि 'उचित दूरी बनाएं रखें'पर गाड़ी की पार्किंग एक ही थी, तो उनके साथ ही पार्क कर दी। अब पता नहीं कि ऐन मौके पर नवीन पटनायक भी आपकी पार्किंग में जगह न बना लें। फिर सवाल उठेगी की सही गलत का क्योंकि पटनायक भी कंधमाल के लिए उतनें ही दोषी हैं जितना की संघ परिवार. मेरे संघी पत्रकारों को शायद मेरी बात बुरी लगे पर रवीश भाई के इस लेख से इतना तिलमिलानें की जरूरत नहीं थी, सवाल सहीं-गलत का था चाहे वो कांग्रेस के टाईटलर-सज्जन हों भाजपा के कल्याण,आदित्यनाथ,मोदी या वरूण या सिंगूर और नंदीग्राम में सीपीएम कॉमरेडो द्वारा किया गया अमानवीय कृ्त्य.इन सभी को यदि आप जीत के पैमानें पर रखकर आगे की सोच को स्वीकराते हैं तो क्या गलत हुआ जो वरूण गांधी ने मुस्लमानों के खिलाफ गलत बात कही, क्या गलत अगर योगी आदित्यनाथ मुस्लिम हत्या को पुण्य के तराजू में तोलतें है,जीतते तो वो भी हैं हर बार, और जीत तो वरुण गांधी भी जाएंगे, सीपीएम भी बंगाल में जीतेगी और संघी फिर दिल्ली शहर में कितना चिल्लाते कि 84 के हत्यारे-84 के हत्यारे,पर जीत सज्जन-टाइटलर भी जाते, अगर आपको ये स्वीकार्य है तो बहस जारी रखिए...