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Tuesday, June 16, 2009

ठगी... लक्ष्य एक पर नुस्खें अनेक !

अशोक जाडेजा, सुभाष अग्रवाल और नवीन शर्मा ये नाम आपनें पिछले कुछ दिनों में बहुत सुनें होंगे। हर टीवी चैनल हर अखबार में आपको ठगों की इस त्रिमूर्ति की करतूतों का पता चल रहा होगा। इस लेख के जरिए हम ठगों के अनेक रूपों से भी आपको अवगत करवाएंगे।कोई खुद को माता का अवतार बता कर लोगों से रु ठगता, कोई फर्जी व्यापार के नाम पर। लक्ष्य एक पर नुस्खें अनेक क्योंकि इन सभी का उद्देश्य तो ठगी ही है, और किस प्रकार ये बड़ी दिलचस्प बात है.... जिसकी जितनी पहुंच थी उसनें उस हिसाब से जनता को बेवकूफ बनाया। अशोक जाडेजा ने देशभर में फैले अपने समाज(सांसी समाज) के लोगों को बेवकूफ बनाया और 2000करोड़ रुपये की ठगी को अंजाम दिया।
सांसी समाज जो कि अनुसूचित जाति वर्ग में सबसे निचले पायदान पर आनें वाली जातियों में से एक है, या यूं कहें कि ये वो जाति है जो कि आज तक अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ पाई है। शिक्षा के कम स्तर के चलते औऱ गैरकानूनी कृत्य में ज्यादा लिप्त होनें के कारण सान्सीन्यों को सभ्य समाज में हमेशा घृणा की नजरों से देखा। आज के समय में भी सांसी समाज के लोगो का मुख्य काम गैरकानूनी शराब बेचना, स्मैक, गांजा बेचना इत्यादि रहा है। जो सांसी शिक्षित हो गए वो इस पेशे दूर हो गए और छोटे-मोटे कल-कारखानों या कहीं चपरासी का काम करके ईमानदारी से अपनी गुजर-बसर करते हैं। खैर इसमें कोई दो राय नहीं की सांसी समाज के लोग शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होते हुए भी, लेकिन आर्थिक रूप से अन्य दलित जातियों की अपेक्षा इनकी स्थिति थोड़ी बेहतर होती है। लेकिन अशिक्षा और अंधविश्वास की इस कमजोरी को ही इन्हीं के सामाज के पेशे से बीएएमएस डॉक्टर अशोक जाड़ेजा नें स्वार्थ सिद्धि का साधन बनाया। अशोक जाडे़जा ने खुद को सांसियों की आराध्य देवी सिकोत्तरी देवी का अवतार बताया और कहा कि समाज की गरीबी दूर करनें आया हूं। जाड़ेजा ने लोगों से 200रु लिए और दुगुनें करके दिखाए फिर खुद की सीडी़ बनवाई, माता का अवतार बताया। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कई राज्यों के अपनें समाज के लोगों को बेवकूफ बनाया और 2000करोड़ के फर्जीवाड़े को अंजाम दिया। पकड़े जानें पर नाम दिया "एमएलएम" का।
आगे बात बात करते है दिल्ली के ठग सुभाष अग्रवाल की, खैर इन्होनें किसी समाज विशेष को नहीं ठगा बल्कि सभ्य समाज के व्हाइट कॉलर लोगों को लगाया है करोड़ो का चूना। इन साहब ने तीन फर्जी चिट फंड की कंपनी खोली और लोगों को लाखों के बदल करोड़ों का ख्वाब दिखाया। पढ़े-लिखे समझदार लोगों को कैसे बेवकूफ बनाएं ये इन महाशय से सीखें। फर्जी स्कीमों में लोगों का रुपया लगवा कर उन्हें लगा गया चपत।औऱ फिर वो पैसा सट्टा बाजार और ऑनलाइन ट्रेडिंग में लगा दिया ऐसा कहना है अग्रवाल साहब का। पर अपनें पर लगे इस काम को वो भी एमएलएम का नाम देते हैं।
आगे बात करते हैं नवीन शर्मा की ये शख्स भी इनका ठग्गू भाई है , अशोक जा़डेजा ने अशिक्षितों को धर्म के नाम पर लोगों को ठगा, सुभाष अग्रवाल नें शहरी लोगों को चिट-फंड के नाम धोखाधड़ी की,
नवीन शर्मा नें भी चिट फंड के नाम पर ही लोगों को ठगा और इनके शिकारों में प्रमुख नाम मुंबई हमलों में शहीद हुए मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घरवालें भी हैं। नवीन शर्मा नें मनीमंत्र नाम की चिट-फंड और एमएलएम की दो कंपनियां खोली और लगा दिया लोगों को करोड़ो का चूना। मेजर उन्नीकृष्णन के घरवालों ने भी नवीन शर्मा की फर्जी कंपनी में लगाए थे 25हजार रु। ये साहब भी पैसा डबल कर चूना लगानें का धंधा करते थे, इनके शिकार भी सुभाष अग्रवाल की तरह व्हाइट कॉलर औऱ समाज में उच्च वर्ग (सामाजिक रूप से) लोग अधिक हुए। पकड़े जानें पर धंधा एमएमएम का बताया इन साहब नें भी। दिल्ली के मशहूर बीके ज्वैलर्स ने भी लोगों को ठगनें का काम आपनी साख के चलते आसानी से किया। इन्होनें लोगों को साढ़े 13हजार रु, दो साल में 26लाख, 30लगानें पर 1करोड़ मिलनें की स्कीम का झांसा देकर लोगों के 500 करोड़ रु की चपत लगा गए। 1975 से दिल्ली के पंजाबी बाहुल पॉश इलाके तिलक नगर में इनका बड़ा शो-रूम है। शो-रूम के मालिक बीके मलिक और चेतन मलिक साहब फरार है। इन्होनें अपनें शिकार बनाया दिल्ली के ही पंजाबी और सिख समुदाय के लोगों को, अब वो लोग पढ़े-लिेखे न हो यह कहना तो मुश्किल सा लगता है।
इनके द्वारा की इस ठगी का एक नाम दिया गया एमएलएम (मल्टी लेवल मार्किटिंग) इस काम में जो लोग लिप्त होतें हैं वो या तो बीमा ऐजेंट होते हैं, या किसी सत्संग या डेरे के अनुयायी मुख्यत:, टीचर(टयूशन पढ़ानें वाला) छोटे मोटे डॉक्टर, मुह्ल्ले या कोई मशहूर आदमी। या साफ शब्दों में हम ये कहे कि वो व्यक्ति जिसका सरोकार रोज-मर्रा में लोगों के एक समूह से हो, जिसका काम पब्लिक डीलिंग का हो। सत्संग में भी लोगों को पब्लिक डीलिंग का खूब मौका मिलता है, और टीचरों, डॉक्टरों पर लोग जल्दी विश्वास कर लेते हैं। अब ये एमएलएम कैसे जनता को चूना लगाती है ये बताते हैं। जो लोग पहले
से इस व्यापार में होते हैं वो बेचारे अपनें फसें हुए पैसे निकालनें के लिए लोगों को इस काम में फसांते। दरअसल आपको सबसे पहले सिर्फ दो सौ रुपये या जो भी उस कंपनी द्वारा निर्धारित न्यूनतम राशि बताई जाती है उसे लगाया जाता हैं। उसके बाद आपको अपनें जैसे ही 5 या 10सदस्य बनानें होते हैं और उसके बाद उसे अपनें द्वारा लगाई गई राशि के बदले चैक मिलता है शुरूआत में तो सही में आपको आपकी रकम बड़ी हई मिलती है लेकिन इसके बाद आप की रकम का क्या हाल होता हैं ये इन सभी केसों में आपनें देख लिया होगा। औऱ एक बात आज कल कुछ एमएलएम की कंपनियां अपनें उत्पाद भी बेचती है और आपको 5हजार रू में सौंदर्य प्रसाधन के सामान भी दे देंगें, या जो भी शुरुआती रकम हो उसका आपको सामान दे देंगी और ये कहेगी की आप इसे बेचें या इस्तेमाल करें आपकी मर्जी, लेकिन अगर आप बेचकर आ मेंबर बनाते हैं तो आपका पैसा दुगना और ये सामान भी आपका जितनें मैम्बर बनेंगे उतना ज्यादा कमीशन। और लोग पागलों की तरह अपनें रिश्तेदारों, ऑफिसों मेल-जोल के दोस्तों में घंटों लोगों को अपनी नई-नई स्कीमों से पकाते हैं। और झांसा देते हैं करोड़ों कमानें का, अगर आप अपनें किसी दोस्त को कहेंगे कि भाई ये काम (चेन सिस्टम वाला) बड़ा बेकार है। इसमें बहुत साले ठगी होते हैं। तो भाई आपका सगा मित्र अपसे किसी भी हद तक बहस में पड़ जाएगा और देनें लगेगा ऐसा ज्ञान देनें की आपकी तो सारी पढ़ाई लिखाई धरी रह जाएगी। ऐसे बिजनेस में फंसे लोग आपसे यदि पहली बार मिलेंगे तो आपसे सीधे ये सावाल करेंगे की आप क्या करते हैं? कितना कमाते हैं? और दस साल बाद आप खुद को कहां देखते हैं? कितना कमा लेंगे आप दस साल में? आप समझ नहीं पाएगें की आपके सामनें एक साल में इतना औऱ पांच साल में इतना और साल में इतना की आपको लगेगा की भाई आपसे बड़ा ज्ञानी तो कोई दुनिया में था ही नहीं। और यदि आपनें उनके प्लान के साथ अपनी असहमति जता दी तो आपको वो भाई साहब दिल्ली के शाह ऑडिटोरियम, फिक्की ऑडिटोरियम, और न जानें कौन-कौन सी जगहों पर सेमिनार के लिए ले जाते हैं। जहां पर आपको ऐसे-ऐसे उदाहरण पेश करके बताएंगे की आप कुछ नहीं कर पाएंगे। सन 1996की बात है मुझे मेरे किसी दोस्त नें एक हेल्थ स्पलिमेंट दिया और कहां कि तुम या तो इसे खुद पी लेना या किसी को बेच दो, लेकिन मैंबर बना कर। मैं उसके इस झांसे में नहीं पडा़, फिर 1998में मेरे मुह्ल्ले में लोगों को एमवे के सदस्य बनानें की मुहीम चली, लोग सदस्य बनें सोफा सेट बनानें वाला 5सौ रुपये के फेस वॉश(एमवे का अपना उत्पाद) से मुंह धो रहा था, क्या करे फंस गया था शुरुआत में मांगे थे 750रुपये और बदले में सामान दे दिया और बेचारा अपनें रिश्तेदारों को लेकर जाता हर रविवार को सेमिनार में, जहां आपको ख्वाब दिखाए जाते। हुआ क्या कुछ भी नहीं कंपनी आज टीवी में विज्ञापन देती है ताकि लोगों को फर्जी न लगे, सामान कोई नहीं खरीदता बनाओ सदस्य और बनाओ पैसा। ऐसी ही एक औऱ कंपनी जापान लाईफ जो गद्दा बेचती थी 1लाख 50हजार रुपये का ," आपकी कमर में दर्द नहीं होगा" आप ऐसे पांच गद्दे बेंचे या सदस्य बनवाएं अपनें पैसे दुगनें कर लें। आजकल युवाओं को लुभानें के लिए भी कई एमएलएम कंपनियां बाजार में है जिनमें से एक है ईबीज़ ये कंपनी युवाओं को कम्पयूटर शिक्षा देनें का झांसा देती हैं और अपना एमएलएम का बिजनेस बड़े धड़ल्ले से बाजार में कर रही है।छात्रों से पहले 7500रुपये लिए जाते हैं और फिर उन्हें काली पैंट और सफेद कमीज पहनकर एक डायरी हात में पकड़ाकर भेज दिया जाता है सपनों की उस काल्पनिक दुनिया में जहां वो खुद को आनेंवाला धीरूभाई अंबानी समझ बैठते हैं।
ऐसी कुछ कंपनियों के फर्जीवाडें का खुलासा होनें से सभी में एक बात सामनें आती है आदमी का शिक्षित होना ही काफी नहीं हैं, किसी आदमी का ऊंची जाति का या तथाकथित सभ्य समाज से होना ही उसके चारित्रिक गुणों का पैमाना नहीं हैं। आपको जितनें लोगों का उदाहरण देकर यह बतानें की कोशिश की गई है कि ऊंची जाति, पढ़ा-लिखा, अच्छा रहन-सहन, पॉश कॉलोनी का निवासी और अच्छी अंग्रेजी भाषी, साऊथ दिल्ली के कल्चर का होते हुए भी कोई कोई ठग सकता है ।
सावधान रहे!

Sunday, June 14, 2009

"जाति भंवर में फंसा लोकतंत्र" मोहल्ला पर बहस

अविनाश भाई के मोहल्ले में आए दिन बहस चलती रहती है, अभी कल ही धर्म संबंधित पर्दा प्रथा पर बहस हुई थी, और आज "जाति के भंवर में फंसा लोकतंत्र" पर। खैर ये मेरे मित्र प्रमोद का मानना है तो मैनें भी कुछ कहा...आप भी जानें जरा क्या कह रहे थे भाईजी और क्या कहना चा रहे हैं हम ....

प्रमोद भाई, आपकी पोस्ट पढ़ी मुझे लगा कि आपके विचारों में विरोंधाभास है, आप एक तरफ कह रहे हैं कि जाति के आधार पर वोट पढ़ता है,नेता अपनी जाति तक सीमित रहते हैं और दूसरी तरफ ये कि देश में दबंग जातियों नें नीची जातियों को वोट डालनें नहीं दिया जाता था। आपको ये नहीं लगता कि ये जो नीची जाति को वोट न डालनें की बात नें ही नीची जातियों में प्रतिनिधत्व की भावना को जागृत किया,क्या ये प्रतिक्रिया नहीं है समाज के वंचित समुदाय की कि वो अपनें प्रतिनिधत्व को पूरा समर्थन देते हैं। मैं जानता हूं की वास्तविक परिदृश्य में कई जगह ये बात पूर्ण रूप से साबित नहीं होती की सभी प्रतिनिधि अपनी जाति के लोगों के भले के लिए अपनें भले को दांव पर लगा देते हैं, परंतु ये बात आपकी बात से ही निकल कर आती है कि नेता लोग आपनी जाति तक ही सीमित रहते हैं? मरे भाई आपनें राजस्थान के जिस क्षेत्र की बात कि मेरे पूर्वज कभी उसी क्षेत्र से दिल्ली मजदूरी करनें के लिए दिल्ली आए थे, मैं आज भी अपनें गांव जाता हूं और जातिवाद का जितना गहरा दंश आज भी राजस्थान के पढ़े-लिखे और अनपढ़ में विद्यमान है उससे आप भली-भांति वाकिफ होंगे, वरना क्या कारण रहा होगा कि यू.पी के राजेश पायलेट को राजस्थान के गुर्जर बाहुल इलाके से टिकट दिया गया और जब तक वो सीट रिजर्व नहीं हुई थी वो उनकी खानदानी बपौती बनीं हुई थी और क्या भला किया उन्होनें अपनें समाज का ये आपनं गुर्जर आंदोलन में देख ही लिया होगा।एक कर्नल साहब आए पढ़े-लिेखे थे गुर्जर समाज में औऱ मूल रूप से राजस्थान के भी थे, पर समाजिक आंदोलन को राजनीतिक रूप दे कर अपनें लिए भी एक सीट लेनें की पूरी कोशिश की थी लेकिन समाज ने उनका साथ नहीं दिया और हार गए आप जिस 21वीं सदी की बात कर रहे हो वहां आज भी जातिय शोषण कितना होता है इसे आप भली-भांति परिचत होंगे। आज लोगों को जातिय दलों और नेताओं से चिड़ होनें लगी है हमारे तथाकिथित उदारवादी पत्रकार इसे बुरा समझते हैं, पर क्या आप उस समाज को या उस राजनीतिक सोच को सही ठहराएंगे जिसमें कि आप केवल कांग्रेस की हां में हां मिला कर उसके राजनीतिक पिछलग्गू बनकर अपनें वोट की एफ.डी करवाते रहें?ये कांशीराम-लालू-मुलायम-पासवान-मायावती सभी लोग उस टीस और उस शोषण की उपज हैं जिसे की आप एक पार्टी के नीचें खड़े हो कर हां में हां मिलाना और सामजिक समरसता का नाम देंगे।क्योंकि आरक्षण न होता तो शायद कोई दलित या आदिवासी चुनाव लड़ना तो दूर मेरे मित्र वोट होता क्या है ये नहीं जानते थे। आज जब लोगों में अपनें प्रितिनिधित्व की सोच जागी हैं तो राजनीतिक दलों नें भी माना कि इधर इनकी आवाज को दबा कर नहीं रखा जा सकता। आप कल्पना करें कि जब ये छोटे राजनीतिक दल नहीं थे जिनका मैनें जिक्र किया तो समाज में समरसता थी? कोई किसी पर शोषण नहीं करता था ? सभी लोग बराबर थे? आज लोग जानते हैं कि कोई उनकी बात सुननें वाला है औऱ यदि नहीं सुनेगा तो बता भी सकते हैं उस नेता को। ये जो जातीय महत्ता की बात आपनें कहीं ना वो जब नहीं होती जब जगजीवन राम जैसे दलित नेता अपना मंत्रालय भर तक सीमित रहते है..ये जब होती है जब एक बड़ी आवाज डीएस फोर से उठकर मंडल तक जा कर उ.प्र और बिहार जैसे राज्यों में अपनी ताकत को दर्शाती है... आगे फिर कभी...

Saturday, June 13, 2009

मोहल्ला पर बहस

मोहल्ला पर बहस में हम भी कूद पड़े, सवाल था कि भाई, छोटे वस्त्र: दुर्व्यवहार करने का न्यौता ! और गंभीर बात ये कि इस पोस्ट के लिखक मुस्लिम थे, और उन्होनें इस्लाम में परदा प्रथा के बारे में बताई गई बातों को कुरान के उदाहरणों से स्पष्ट किया। हालांकि मैं भी परदा प्रथा के खिलाफ हूं, पर न जानें क्यों जो प्रतिक्रिया मिली न वो बेहद बुरी थी, टिप्पणियों के कॉलम में मानों सारे लोग सोचे बैठे थे कि आज अपना सारा गुस्सा उतार देंगे इस मुस्लिम समाज पर। हर कोई नफरत की बंदूक भरे बैठा था, और सीधा ब्लॉग का ही बहिष्कार करनें को आमादा है....

अविनाश भाई, मुझे नहीं पता कि जिन लोगों ने प्रतिक्रिया दी है वो पत्रकार हैं या लेखक, वो संघी है या कम्यूनिस्ट य़ा फिर चौराहे की रौनक, जिन्हें कि चौक पर खड़े हो कर ज्ञान बघारनें में मजा आता है और किसी अन्य की बात सुननें पर बवाल करनें में।
हो सकता है कि आप लेखक के लेख से सहमत न हो पर, उसका तार्किक विररण किया जा सकता है, पर जिस प्रकार के कमेंट मिल रहे हैं, वो सही नहीं लग रहा, आप सीधा ये कह रहे हैं कि 'इन सालों के साथ जो गुजरात में हुआ वो ठीक है"। भाईयों लेखक अपनी बात को रख रहा हैं, वो बात किसी धर्म विशेष से जुड़ी है, जिसका जिक्र भी किया उन्होनें उस धार्मिक ग्रंथ को कोड करके...। मेरे मित्रों हम यहां केवल बोलनें या ज्ञान बघारनें के लिए नहीं आते हैं, हमें सुनना भी होगा,समझना भी होगा। मैं फेवर नहीं करता बुर्खा प्रथा का, पर हिंदु धर्म में भी तो परदा प्रथा आज तक चली आ रही है। आप और हम केवल एक धर्म विशेष को घृणा की नजरों से आंकना जब जक नहीं छोड़ेगे तब तक कोई अपनी पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर हमारे साथ मिलकर चलनें को नहीं तैयार होता। अगर कोई हिंदू लेखक इसी विषय को उठाता तो शायद इतनी तो कड़ी प्रतिक्रिया नहीं मिलती की ब्लॉग का ही बहिष्कार करें। अरे आप भी कहें हम भी कहें औरों को भी कहनें दे, फिर एक स्वस्थ बहस छिड़े कुछ आप सीखें कुछ हम सीखे...माहौल खराब न हो, वरना आपमें और चौक पर हलवाई की दुकान पर खड़े ज्ञान बघारते लोगों में फर्क कर पाना मुशकिल हो जाएगा, वो ज्यादा खतारनाक होगा।

Sunday, June 7, 2009

छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध और देश की बागडोर युवा हाथों में..!

छात्रसंघ चुनावों पर देश के कई राज्यों ने प्रतिबंध लगाया हुआ है, और जिन राज्यों में छात्रसंघ के चुनाव हो रहे हैं वहां भी लिंगदोह नामक सरकारी नीति लागू होती है। छात्रसंघ देश को एक नई दिशा और नीति देते हैं, देश में क्या गलत और सही है ,उसके विरोध औऱ समर्थन में देश के पढ़े-लिखे युवाओं का आवाज बुलंद करना, लोकतंत्र के जिंदा होनें का सबब होता है। देश को किस दिशा में मोड़ना है, क्या सही है और क्या गलत ये पॉलीसी मेकर का काम होता है, और पॉलिसी मेकर बनानें की फैक्टरी ही बंद कर दी जाएगी तो पॉलीसी का विदेशों से आयात करना ही वाज़िब कहलाया जाएगा। हमारे देश में ऐसा ही कुछ हो रहा है, हमारे आज के युवा विदेशों से पढ़कर आए हमारे नेताओं के बेटों को ही देश के युवाओं का प्रतिनिधि मानतें है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में 7 साल से भी ज्यादा समय तक सक्रीय रहा, मैंनें डीयू की राजनीति को समझा कि वहां आनें वाले दस साल तक अभी और ग्लैमर और पैसों की राजनीति ही चलेगी और हो सकता है कि उससे ज्यादा समय भी लग जाए। दरअसल 2002 के बाद से अगर इस बार 08-09 के चुनावों को छोड़ दे तो डीयू के अध्यक्ष पद पर कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई ही जीतता है,और सीटों के बहुमत के आधार पर भी वो ही जीतता आया है। कारण मैं बता चुका हूं, कांग्रेस को पता है कैसे डीयू का राजनीति में मनी-मसल-ग्लैमर की राजनीति ही जीत का मूल मंत्र है। लिंगदोह कमेटी के बाद हुए चुनावों में मसल की क्षमता थोड़ी घटी है लेकिन बाकी चीजें जस की तस बनीं हुई है। और यही फार्मूला कांग्रेस नें राजनीति की मुख्य धारा में अपनें चिकनें चेहरों वाले विदेशी ब्रांड के नेताओं को युवा ब्रिगेड के नाम पर उतार कर साबित कर दिया। देश के युवा की परिभाषा ही बदल दी, देश का युवा सवाल न करे, देश के युवा में की सोच को तकनीकि शिक्षा के माध्यम से इतना संकीर्ण कर दिया जाए कि वह महज नौकरी पानें तक के लिए पढे और चुप करके बैठ जाए औऱ विज्ञापन के प्रभाव के कारण केवल दोस्तों में खीझ के डर से वोट डालनें को अपनी सबसे बढ़ी उपलब्धी मानकर देश की बागडोर सौंप दें एक कॉर्पोरेट कंपनी के हाथों में जो अपनें फायदों के हिसाब से पॉलिसी बनाए। आपकी बात में दरअसल हांजी के भाव वाले युवाओं की आवाज का विरोध है, ये हांजी का माहौल किस नें बनाया है, क्या कारण रहा होगा कि देश के युवा आज सहीं गलत के विरोध में मोमबत्ती लेकर तो सड़क पर उतरनें का शौक रखतें है पर छात्र संघ को सही मयनों में जीवीत रखनें का मागदा नहीं। मैं बताता हूं ये जो पॉलीसी मेंकिंग की बात मैनें कही ना, ये ऐसा तुर्रा है कि जनता के मुंह से हांजी के अलावा कुछ न निकले, आप इतनें लोगों को अंधा बना दो की आपको कानें को राजा मानना ही पड़े।

Tuesday, June 2, 2009

दलित महिला स्पीकर!

कांग्रेस का दलित प्रेम किसी भी दलित नेता को सक्रीय राजनीति से अलग करना ही होता है,पहली बार तो कांग्रेस या भाजपा में दलित नेताओं की उपस्थिति केवल एक मंत्रालय के लिए सामाजिक न्याय के संदेश देनें भर के लिए होती है, जिन पार्टियों में आज भी मनुवाद जिंदा हो,वहां राहुल गांधी का किसी दलित के घर में ठहरना या मीरा कुमार को स्पीकर बनाना एक समान लगता है। ये आधुनिक मनुवाद है, जिसमें आप को सत्ता कि शक्तियों से दूर रख काम निकाला जाता है। दोस्तों हम आपको एक बात और बता दें कि कांग्रेस आरक्षित सीटों पर खड़े किए गए अपनें दलित प्रत्याशियों को ही दलित नेता मानती है। सोच लिजिए अगर बाबा साहब अम्बेडकर ने संविधान में दलितों का आरक्षण न दिया होता तो ये शब्द कांग्रेस शब्दकोश में न दिखाई पड़ता। बाबू जगजीवन राम कांग्रेसियों के कहे मुताबिक दलित नेता थे, लेकिन वो अपनी राजनीतिक ज़मीन कभी बिहार के सासाराम से आगे नहीं ले जा सके। आज उनकी ही राजनीतिक विरासत को उनकी आईएफएस बेटी संभाल रही है, औऱ वो भी अपने सीमा क्षेत्र में रह कर। कांग्रेस कोई उन्हें दलितों की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों में प्रचार के लिए नहीं बुलाती और न ही अपनी किसी रैली में दलित नेता के रूप में प्रमोट करती है। कांग्रेस भली-भांति जानती है कि "नेता हमारा और वोट तुम्हारा"। कांग्रेस ने कोई पहली बार ऐसा काम नहीं किया, दिल्ली अंबेडकर नगर से 44 साल से जीतते आए चौ.प्रेम सिंह को जब दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया तो कांग्रेस की जीत हुई, लेकिन जब उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किए जानें की बात हुई तो,विधानसभा अध्यक्ष बना कर उन्हें सक्रीय राजनीति से अलग कर दिया।कांग्रेस अपनें दलित नेताओं को न तो प्रचार के लिए उतारती है औऱ न ही दलितों से सीधे संपर्क साधनें की आज्ञा देती है। नारा आज भी वही है जिसको लेकर बाबा साहब अम्बेडकर ने विरोध जताया तो गांधीजी अनशन पर बैठ गए थे "नेता हमारा वोट तुम्हारा". बीजेपी की तो क्या कहें पहली बार किसी दलित को अध्यक्ष बनाया ओर उसी का स्टिंग ऑपरेशन करवा कर बता दिया कि आने वाले समय में कभी किसी दलित को कोई बड़ा काम नहीं दिया जाएगा।