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Sunday, June 7, 2009

छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध और देश की बागडोर युवा हाथों में..!

छात्रसंघ चुनावों पर देश के कई राज्यों ने प्रतिबंध लगाया हुआ है, और जिन राज्यों में छात्रसंघ के चुनाव हो रहे हैं वहां भी लिंगदोह नामक सरकारी नीति लागू होती है। छात्रसंघ देश को एक नई दिशा और नीति देते हैं, देश में क्या गलत और सही है ,उसके विरोध औऱ समर्थन में देश के पढ़े-लिखे युवाओं का आवाज बुलंद करना, लोकतंत्र के जिंदा होनें का सबब होता है। देश को किस दिशा में मोड़ना है, क्या सही है और क्या गलत ये पॉलीसी मेकर का काम होता है, और पॉलिसी मेकर बनानें की फैक्टरी ही बंद कर दी जाएगी तो पॉलीसी का विदेशों से आयात करना ही वाज़िब कहलाया जाएगा। हमारे देश में ऐसा ही कुछ हो रहा है, हमारे आज के युवा विदेशों से पढ़कर आए हमारे नेताओं के बेटों को ही देश के युवाओं का प्रतिनिधि मानतें है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में 7 साल से भी ज्यादा समय तक सक्रीय रहा, मैंनें डीयू की राजनीति को समझा कि वहां आनें वाले दस साल तक अभी और ग्लैमर और पैसों की राजनीति ही चलेगी और हो सकता है कि उससे ज्यादा समय भी लग जाए। दरअसल 2002 के बाद से अगर इस बार 08-09 के चुनावों को छोड़ दे तो डीयू के अध्यक्ष पद पर कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई ही जीतता है,और सीटों के बहुमत के आधार पर भी वो ही जीतता आया है। कारण मैं बता चुका हूं, कांग्रेस को पता है कैसे डीयू का राजनीति में मनी-मसल-ग्लैमर की राजनीति ही जीत का मूल मंत्र है। लिंगदोह कमेटी के बाद हुए चुनावों में मसल की क्षमता थोड़ी घटी है लेकिन बाकी चीजें जस की तस बनीं हुई है। और यही फार्मूला कांग्रेस नें राजनीति की मुख्य धारा में अपनें चिकनें चेहरों वाले विदेशी ब्रांड के नेताओं को युवा ब्रिगेड के नाम पर उतार कर साबित कर दिया। देश के युवा की परिभाषा ही बदल दी, देश का युवा सवाल न करे, देश के युवा में की सोच को तकनीकि शिक्षा के माध्यम से इतना संकीर्ण कर दिया जाए कि वह महज नौकरी पानें तक के लिए पढे और चुप करके बैठ जाए औऱ विज्ञापन के प्रभाव के कारण केवल दोस्तों में खीझ के डर से वोट डालनें को अपनी सबसे बढ़ी उपलब्धी मानकर देश की बागडोर सौंप दें एक कॉर्पोरेट कंपनी के हाथों में जो अपनें फायदों के हिसाब से पॉलिसी बनाए। आपकी बात में दरअसल हांजी के भाव वाले युवाओं की आवाज का विरोध है, ये हांजी का माहौल किस नें बनाया है, क्या कारण रहा होगा कि देश के युवा आज सहीं गलत के विरोध में मोमबत्ती लेकर तो सड़क पर उतरनें का शौक रखतें है पर छात्र संघ को सही मयनों में जीवीत रखनें का मागदा नहीं। मैं बताता हूं ये जो पॉलीसी मेंकिंग की बात मैनें कही ना, ये ऐसा तुर्रा है कि जनता के मुंह से हांजी के अलावा कुछ न निकले, आप इतनें लोगों को अंधा बना दो की आपको कानें को राजा मानना ही पड़े।

1 comment:

रंगनाथ सिंह said...

is mudde par mai jansatta ke liye ek article taoyar kar rha tha lekin 80% likhne ke bad drop kar diya ki jyadar bate kyi logo ne kah di thi.
lekin aap ne jo point rakha h wo bahut achha h. amine kahi bhi il line par koi article nhi dekha tha.

likhte rahiye, hum padhte rahenge