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Thursday, September 3, 2009

डॉक्टरी आला छोड़ कूद पड़ा मैदान में...


भारतीय राजनीति के वास्तविक परिदृश्य पर यदि सरसरी नज़र डाले तो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी जैसे नेता बहुत कम नज़र आते है। बात चाहे किसी भी पार्टी की हो या केवल कांग्रेस की, उनके मुकाबले का ज़मीनी नेता तो शायद कांग्रेस में भी नहीं है । 28 साल की उम्र में डॉक्टरी जैसे पेशे को छोड़कर क्यों करके राजनीति में आना वो भी मुख्यधारा की राजनीति में। किसी राज्य विशेष से राज्य सभा के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष के दम पर अपनें राजनीतिक जीवन के यौवन से, परिपक्व राजनीति की धूरी बननें तक के सफ़र को अंजाम देनें की ओर अग्रसर रहे राजशेखर रेड्डी। आंध्र प्रदेश में एनटीआर के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालनें के लिए उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बनीं बनाई सत्ता का स्वाद चखा। एनटीआर का कोई राजनीतिक वारिस (पुत्र) ना होनें का लाभ उन्हें मिला और एनटीआर की दो पत्नियों के होनें की वजह के बावजूद उन्हें एनटीआर का राजनीतिक वारिस माना गया और जनता की स्वीकृति मिली। आंध्र की राजनीति पर यदि एक निगाह डालें तो हम देखते हैं कि जो विश्वास लोगों को सिनेमा घर तक खींचता है, वही विश्वास राजनीति में, उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा को भी पूरा करनें में सफल होता है। आंध्र प्रदेश की जनता चाहे शहरों की हो या गांवों कस्बों की वो नेता और अभिनेता में खासा अंतर कर पानें में शायद उतनी सफल नहीं हो पाई थी जितनी की उत्तर-भारत की जनता रहती है। इस माहौल में आंध्र प्रदेश जैसे राज्य के लोगों की ज़मीनी हक़ीक़त को जाननें के लिए वाई एस राजशेखर रेड्डी नें उनसे सीधे संपर्क करनें के लिए 1400 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके एनटीआर जैसे नेता कि राजनीतिक विरासत संभाल रहे चंद्रबाबू की गद्दी को उखाड़ दिया। राजशेखर रेड्डी को लोगों ने सन् 2004 में राज्य की सत्ता के शिखर बैठ ये साबित कर दिया था कि राजनीति केवल भाषण देनें भर से या किसी नेता की कुर्सी पर उसके उत्राधिकारी के बैठ जानें भर से नहीं की जाती। जनता का भला करनें के लिए जनता से सीधे संपर्क करना पड़ता है। राजशेखर रेड्डी वास्तिक राजनीति में एक उदाहरण के रूप में साबित हुए। बिना किसी धर्म के पैरोकार बन, बिना कोई रथ लिए, बिना किसी जाति या संप्रदाय की लाठी थामें। बस जनता के लिए जनता की आवाज बनकर निकले थे औऱ पा गए उनका विश्वास। ऐसा नहीं है कि सत्ता पानें के बाद राजशेखर रेड्डी ने जनता से किए अपनें वादों से फिर गए हो या केवल घोषणाओं के अंबार भर से काम चलाया। राजशेखर रेड्डी ने मुख्यमंत्री रहते हुए भी जनता के बीच जाना नहीं छोड़ा और अपनी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लागू करवानें के लिए या उनके लागू होनें से संबंधित लोगों (विधायकों, नौकरशाहों) से संपर्क साधनें में भी वे पीछे नहीं रहते थे। जनता तक उनकी योजनाओं के पहुंचनें तक की सारी कार्यप्रणाली का जायज़ा राजशेखर रेड्डी स्वंय लिया करते थे। और इसी कारण आंध्र प्रदेश की जनता नें राजशेखर रेडडी को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया और उनके कार्यों से प्रभावित होकर ही कांग्रेस को लोकसभा के चुनावों में भारी जीत भी दिलवाई। क्या किसान, क्या मज़दूर क्या मध्यम वर्गीय लोग सभी के नेता के रूप में पहचान बनाई राजशेखर रेड्डी नें। हमें ये कहनें भी ज़रा भी हिचक महसूस नहीं होनी चाहिए की राजशेखर रेड्डी का नाम कांग्रेस से बढ़कर था आंध्र प्रदेश की जनता के लिए। आज देश को ऐसे ज़मीनी नेताओं की बहुत अधिक आश्यकता है। अपनी इसी कार्यप्रणाली के चलते वे कभी ठहरते नहीं थे। ख़राब मौसम हो या कोई आपदा राजशेखर रेड्डी की दिनचर्या के हिस्से मं था कि किसी भी योजना के क्रियांवन से संबंधित जानकारी लेनें के लिेए वे स्वंय जाते। एक नेता का क्या काम है औऱ कैसे राजनीति में आप लंबे समय तक कायम रह सकते हैं ये राजशेखर नें साबित किया था। केवल अपनें कार्यों और जनता से सीधे संपर्क के माध्यम से। औऱ अपनें इन्हीं कार्यों के चलते वे 2 सितंबर 2009 को अपनें नियमित दौर पर जा रहे थे कि हैलीकॉप्टर दु्र्घटना में उनका निधन हो गया। हालांकि उन्हें ख़राब मौसम के चलते अपना दौरा रद्द करनें की भी सलाह दी गई थी लेकिन वे अपनें दौरों को किसी भी हालत में रद्द नहीं करना चाहते थे। भारतीय राजनीति के लिए और देश में ज़मीनी सोच रखनें वाले लोगों के लिए वाई.एस.राजशेखर रेड्डी का जाना बहुत बड़ी क्षति है। हमारे देश में आज ऐसे कितनें नेता होंगें जो की बिना किसी राजनीतिक विरासत संभाले अपनें को केवल अपनें औऱ जनता के दम पर ही नेता साबित करते है और अपनी कथनी औऱ करनी में अंतर नहीं करते?
एक बार आंध्र प्रदेश विधान सभा में वाईएसआर नें चंद्रबाबू नायडू से कहा था कि मैं 60 वर्ष की आयु के बाद मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगा, और उम्र के 60वें साल में वे जिंदगी से संयास ले गए। वाई.एस.राजशेखर रेड्डी का जाना भारतीय राजनीति के लिए बहुत बड़ी क्षति है...

2 comments:

deevakar anand said...

Bade gaur se sunn raha tha zamana..
Tumhi so gaye dastaan kehte kehte ..

Mohd. Moin, Allahabad said...

Hum Logon KO Reddy Saahab ke baare me itne vistaar se jaankari dekar aapne unhe sachchee shraddhanjali di hai...
Mohd. Moin
Allahabad