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Friday, November 14, 2008

बदलते नेता और हम...

दिल्ली में जैसे-जैसे सर्दी बढ़ रही है, चुनावी सरगर्मी भी उसी रुबाब में आ रही है, नेताओं के सफेद कुर्ते तो बाहर निकल ही आए, साथ में नेताजी के समर्थको ने भी लगे हाथ सफेद रंग की पैन्ट-शर्ट निकाल ली है। भाई...क्या पता कब कोई टी.वी चैनल का कैमरामैन सामने आ जाए और हमें नारे लगाने पड़ जाए....भई चुनावी मौसम जो है.... जिस इंसान को आप ने अपने मुहल्ले में भी कम देखा होगा वो अचानक आप से आ कर कहता है की "ये मेरे बड़े भाई है मैं आपके ही मुहल्ले में रहता हूं, कृप्या इन्हें ही वोट दीजिएगा" साथ में आने वाले भाई के जाने पर आप सोच में पड़ जाएंगे की आखिर ये बंदा आपको कैसे जानता है... खैर जाने दीजिए।

चुनावी मौसम में फ़िजा का यूं बदलना लाज़मी है...

आप बदले न बदले, पर सोच बदलना लाज़मी है...

जी हां दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा? ये तो तय कर पाना अभी मुश्किल है। पर ये बात भी दीगर नहीं की दिल्ली के ये चुनाव पहले हुए दो विधानसभा चुनावों से भिन्न होंगे...आज के नेता भी जान चुके है.......... कि अब न तो वो कार्यकर्ता है और न ही नेता।

आज जो नेता आपके साथ खड़ा आपके नाम के नारे लगा रहा है वो अगले चुनावों में आपकी ही सीट पर टिकट की ताल ठोक देगा...आपकी पार्टी से नही मिले तो क्या? इस चुनाव में आपके साथ लगकर कमा लेंगे...ओह.......... मेरा मतलब था की इस बार आपके साथ लगकर काम कर लेंगे और अगली बार बसपा से टिकट की दावेदारी ठोक देंगे।

भैया सीधा-साधा फार्मूला है, इस बार किसी भी नेता के साथ मिलकर, आप चमचे बनकर कमा ले...ताकि आप अगले साल की टिकट का प्रबंध हो जाए...फिर अपनी पार्टी नही तो क्या बसपा ने दिल्ली में दस्तक दे दी है...अब केवल एक विकल्प नहीं बचा रहा... आज दिल्ली प्रमुख सीटों पर बसपा के उम्मीदवारों ने कांग्रेस-भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर दी है...बसपा के उम्मीदवार भी कुछ ऐसे है पहले जो कि कभी भाजपा में थे या कांग्रेस से इस बार टिकट की दावेदारी ठोकीं थी पर ताल जोर से न लगी और आवाज बसपा के कार्यालय में सुनाई देने लगी... देखना है कि इस बार के चुनावो पर कौन किसका भाई बनकर आपके पास आता है और कौन विरोधी....

संभलकर दिल्ली.

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