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Thursday, October 9, 2008

क्रिकेट का बदलता दौर

सौरभ गांगुली के सन्यास की घोषण करते ही मानों क्रिकेट के जानकारों के यहां पत्रकार भाईयो का तांता लग गया। हर कोई चाहता था, की गांगुली के इस कदम का भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियो पर क्या प्रभाव पड़ेगा। क्या उनके प्रदर्शन मैं कोई सुधार आऐगा? क्या वो भी अब जल्दी सन्यास की घोषणा करेंगे? खैर कुछ भी हो, लेकिन दादा के इस कदम के परिणाम बहुत दूरगामी होंगे। आने वाले दिनों में हमें शायद कुछ और सीनियर खिलाड़ियों के सन्यास लेने की खबर मिल सकती है, और ये भी हो सकता है की आने वाले चंद सालों में हमें सौ टेस्ट मैच खेलने वाले खिलाड़ियो के बारे में केवल सुनने को मिलें। क्योंकि जिस तरह की क्रिकेट आज खेली जा रही है, उसमें निरंतर अच्छा प्रदर्शन करना अनिवार्य सा हो गया है, बात सीधी सी है, 'खेलों कमाओं और निकल जाओं ' कोई सरोकार मत रखो देश से, देश के लिए, टीम के लिए या जीत के लिए....

आज के परिदृश्य में हम देखते है की क्रिकेट में न तो वो जूनून है न वो जज्बा... अब सिर्फ हर कोई अपने लिए खेलता है। अब टीम में न तो वो रॉबिन जाडेजा की जोड़ी है, और न वो श्रीनाथ वेंकटेश की धार, न कुंबलें चौहान की फिरकी। और अब कुछ दिनों में रनों का अंबार लगाने वाले सचिन द्रविड भी नही दिखेंगे, गांगुली की तो बिदाई निर्धारित हो ही चुकी है। क्रिकेट में अब न वो रोमांच बचा है न वो जूनून। क्योंकि आप जब भी मैच देखने लगते है आपको पता चलता है कि कोई नया खिलाड़ी खेल रहा होता है, और जब तक लोग उस खिलाड़ी का नाम भी ठीक से जान पाते है वो बेचारा किसी विज्ञापन में दिखाई पड़ता है या किसी डांस शो में कुल्हे मटकाता, वाह रे मेरा भारतीय क्रिकेट....।

महाराजा रणजीत सिंह या लाला अमर नाथ ने ऐसी कल्पना तो नही की थी? खैर बेचारे क्रिकेटरों का भी क्या कसूर है, कम्बख्त ये ग्लैमर का कीड़ा ही कुछ ऐसा है। आज जो भी नौजवान भारतीय टीम में आना चाहता है, उसका उद्देश्य केवल एक दो मैच भर होता है क्योंकि उसे तो पता ही है कि उसके साथ क्या होना आगे... और बाद में उसे किसी न किसी विज्ञापन में काम तो मिल ही जाऐगा। बोर्ड के भरोसे तो बेचारे को रहना है नही है, जो बोर्ड टीम को दस हजार रन देने वाले खिलाड़ियों की कभी भी दशा बिगाड़ सकता है, वो नए रणबांकुरों का क्या हाल करेगा।

आज अगर वो टीम को जीत दिलाता है तो कोई शिकायत नही, लेकिन अगर किसी भी आपके प्रदर्शन में थोड़ी सी भी चूक हुई, तो आप देखे बाहर का रास्ता, या फिर आपको इतनी बार अंदर बाहर किया जाऐगा कि आपका सन्यास अपने आप हो जाऐगा... आज वो टीम नही है जिसके हारने पर दुख होता था और जीतने पर खुशी इतनी की हर गली मुहल्ला दीवाली और ईद सा जगमगा उठता था।

आज अगर भारत जीतता है तो उस जीत का अहसास कराने के लिए तथाकथित पत्रकार बंधुओं का बहुत बड़ा योगदान होता है, आखिर पचास प्रतिशत खबरें तो इन्हीं सबसे मिलती है कि कौन खिलाड़ी कहा रहता है, उसकी गली कौन सी है, और जबर्दस्ती लोगों को पकड़ कर पूछना की आज भारत जीता है कुछ कहना चाहते है आप? लोगों को तब पता चलता है कि आज कोई मैच भी था, चलो कोई बाइट ही दे देते है, इसी बहाने हम टीवी पर आ जाएंगे...

बात साफ है क्रिकेट की आज की दशा भावनाओं से परे है, देश की जनता की नजरों में और खिलाड़ियों की नजरों में भी...अगर किसी के लिए क्रिकेट मायने रखता है तो बस मीडिया के लिए...

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