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Friday, October 3, 2008

अपना-अपना स्वार्थ

साल खत्म होने को है, और दिल्ली विधान सभा चुनावों के सामने, बात समझनें की कोशिश करें तो दोनों में कोई फर्क नही है। पूरे साल जो भी घटा दिल्ली में, जो भी इस शहर ने देखा चाहे वो बम घमाके हो या एनकाउंटर, महंगाई की मार हो या कॉलोनियों को नियमित करने के सरकार के वादे, इस साल पर भी वही बीती जो दिल्ली की बेचारी जनता पर बीती, ये साल भी बेचारा कभी सृष्टी के खत्म होने की चिंता में लगा रहा, तो कभी टेलीविजन चैनलों में बैठे पंडितों की भविष्यवाणियों से, फर्क बस इतना था की कही नेता जनता को बेवकूफ बना रहे थे, तो कही तथाकथित पत्रकार।

बेचारे साल की भी वही हालत थी जो दिल्ली की जनता की। मैं साल की दिल्ली की जनता से इसलिए

तुलना कर रहा हूं क्योंकि दोनों ही जगह उनको ठगा गया जो कि पूरक है उनके, जो उनको ठग रहे थे।

होना क्या था जैसे की नेता वापस आए जनता के पास वैसे ही, हमारे चैनल वाले मीडिया बंधु भी वापस आ गए लोगो को कल का पंचाग बताने के लिए, और बात गई-आई हो गई। वही नेता साल खत्म होने से पहले लोगों के घर-घर जा कर अपनी ही कही बात को गई आई करके फिर चल देंगे, उसी जनता को ठगनें। सृष्टी खत्म होनें पर पंचाग का कैसे पता चलेगा मीडिया बंधुओं को? और जनता के वादे पूरे कर देंगे अगर नेता तो, चुनावों में उन्हें क्या कहेंगे? इसलिए दोनों बेचारो का हाल एक जैसा है...

आखिर नेताओं को नए वादे देनें है, और न्यूज चैनलों को साल का पंचाग। कहा जाता था कभी की, 'पत्रकार जनता को ठगने वाले लोगों के खिलाफ एक आवाज है कलम के माध्यम से' । बात साफ हो जाती है की सच और झूठ में अब अंतर कुछ रहा नही है, जिसे जो चाहिए वो लेने के लिए इंसान तो क्या भगवान,ब्रह्माण्ड, और नक्षत्रों को भी नही बख्शा जाएगा...

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