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Wednesday, December 3, 2008

मुंबई हमलों के विरोध में प्रदर्शन

मुंबई में हुए आतंकी हमलों को लेकर सभी में आक्रोश देखनें को मिला क्या आम जनता, क्या सिनेमा सितारें, क्या सामाजिक कार्यकर्ता, और क्या उद्योगपति। सभी ने मानों एक जुट होकर आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा के मासले पर सरकार को आढ़े हाथों लिया। चाहे वो आम नागरिक हो या छात्र, गृहणी हो या सरकारी मुलाजिम, सभी के जह़न में बस एक, एक ही आवाज आ रही थी...बस बहुत हुआ...अब और नहीं। और एक खास बात...भाई सभी का जो आक्रोश, जो गुस्सा था वो केवल राजनीतिज्ञों के प्रति था...हममम् सही भी है भाई, जवाबदेही भी तो उन्हीं की बनती है...।
और हमला भी तो आखिर मुंबई पर हुआ है, कोई छोटी-मोटी बात है क्या? आखिर देश के सबसे ज्यादा जिम्मेदार लोगों का जो शहर है, जो अपने अधिकारों को लेकर जागरुक है, भारतीय संविधान के पैरोकार है....संविधान के खिलाफ़ कोई काम अगर सरकार या सरकार का कोई प्रतिनिधि, या कोई राजनेता करें तो उसे आढें हाथों लेने में पीछे नहीं हटतें। मुंबई में जो कुछ भी हुआ वो दुखद था, इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वो कम है, न जाने कितने मासूमों ने अपनी जान गवाई। परंतु दोस्तों हमें सोचना पड़ेगा की आज, जो आवाज हमारे जहन से आ रही है, जो क्रांति हम आज सड़कों पर मोमबत्तियां जलाकार कर रहें हैं...ये आवाज हमारे जहन से जब क्यों नहीं आती, जब उसी मुंबई में दंगे होते है? जब उसी महाराष्ट्र में दलितों की हत्या की जाती है? जब इतनी बड़ी तादात में किसान आत्महत्या करते हैं? और जब क्षेत्रियता के नाम पर इंसान को अपनी रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ता है, क्योंकि एक नेता अपनें लाभ के लिए आपकों दूसरों से भिन्न कर देता है...? तब क्यों नहीं कोई फिल्म कलाकार खुद को एक जिम्मेदार हिंदुस्तानी मानता? तब क्यों नहीं उस शहर के युवा एकजुट होकर किसी भैया को सुरक्षा देने की मुहीम छेड़ते? तब क्यों नहीं कोई सामाजिक कार्यकर्ता, पढ़े लिखे नौजवान और बुद्धिजीवी मोमबत्ती लेकर गेटवे पर मार्च करतें? क्यों नहीं हम सब मिलकर उस वक्त उस पीड़ित पक्ष को हौसला देतें? दोस्तों बात निकली हैं तो दूर तक जाएगी...क्यों न ये सवाल हम अपने आप से पूछें, की क्या हम केवल उन्हीं बातों के लिए नहीं आवाज उठाते जिसका सरोकार केवल हम से हो? क्या हमारे लिए केवल वही संविधान नहीं है जिसमें हम केवल अपने साथ कुछ गलत नहीं होनें देना चाहतें? बाकी कहीं जो कुछ हो रहा हो हमें क्या... दोस्तों मुद्दा गंभीर है, हमारी इस चेतना पर कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा जो टिप्पणी की जाती है(नक़वी) वो शायद सही सबित हो जाती है? क्योंकि वो जानते हैं की ये प्रदर्शन हम सभी केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करानें के लिए करते हैं, जनसरोकार के लिए नहीं, दोस्तों क्रांति के लिए तत्पर रहनें के लिए सबसे ज्यादा जरुरी हैं गलत बात का किसा भी परिस्थिति में साथ न देना, गलत किसी भी व्यक्ति के साथ क्यों ना हो रहा हो... आवाज उतनी ही बुलंद हो की, किसी भी नेता की ये हिम्मत न हो की हमें थोड़ा सा लालच देकर, बोली-भाषा, जाति-धर्म, और क्षेत्र के नाम पर अलग कर दें...किसी नेता की ये हिम्मत न हों की वो हमारे आक्रोश को किसी फिल्म से प्रेरित कृत समझें...।
दोस्तों ये जो कुछ भी घटा मुंबई में उस सब में कहीं न कहीं हमारा भी उतना ही दोष है, जितना की हम नेताओं पर दोष मढ़ रहे है, हम भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जिसे दोष देनें के लिए हम सड़क पर मोमबत्तियां लेकर विरोध जताते है। दोस्तों उन शहादों को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलेगी जब हम अपने जीवन में नैतिक और संवैधानिक दोनों आधारों पर सही गलत का निर्णय लें। जब हम अपनें स्वार्थ को त्याग कर, किसी के भी खिलाफ़ आवाज उठाने का दम रखतें हों....।
जरा सोचें...

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