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Friday, March 6, 2009

स्लमडॉगस् की सच्चाई...

ऑस्कर तक के सफर के बाद, जीवन की सच्चाई से रूबरू होते असल जिंदगी के किरदार. जी हां बात कुछ अटपटी सी लग रही होगी आपको, शायद समझ में नहीं आ रहा होगा कि मैं किस कि बात कर रहां हूं?
दोस्तों दुनिया भर में धूम मचानें वाली फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी से लेकर किरदार तक भारतीय थे, यहां तक की गीत-संगीत, रिकार्डिंग और तमाम वो काम जो कि भारत में संभव हो सकते थे वो यहीं किए गए. फिल्म में काम करने वालों में कुछ तो नए लोग थे जिन्होंने शायद कभी अंदाजा भी नहीं लगाया होगा कि वो कभी किसी फिल्म में काम करेंगे, और कुछ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कुछ ऐसे नाम थे जो कि किसी तारीफ के मोहताज नहीं है.
खैर फिल्म विदेशी निर्देशक द्वारा बनाई गई जिसकी कहानी भी एक भारतीय लेखक के नॉवेल पर आधारित थी. मोटी बात ये कहें कि इस विदेशी फिल्म को भारतीयों के योगदान के बिना पूरा कर पान शायद तो संभव नहीं होता.
जिसमें कि सबसे अहम भूमिका यदि किसी की थी तो इस फिल्म की कहानी को सच साबित करते फिल्म के पात्रों के चुनाव की. फिल्म मुंबई की झुग्गी-बस्ती धारावी पर केंद्रीत है, जहां के बच्चे किस प्रकार अपनें को जिंदगी की पाठशाला में पढ़ाते है और फिर जीवन की किसी भी परिस्थिति में अपनें विवेक से निर्णय लेते है, जिसमें कि किसी का कोई योगदान नहीं होता, और यदि किसी का उनके जीवन में योगदान होता है तो वो भी सिर्फ स्वंय जिंदगी का....वो जिंदगी ही होती है जो कि इन बच्चों को जिंदा रहना कमाना-खाना अपने को बचाना, चालाक-चतुर बनाती है. खैर फिल्म में इस किरदार को जीवांत उतारनें के लिए विदेशी निर्देशक शायद हमारे बॉलीवुड के निर्देशकों से बाजी मार जाते है. और विश्व ख्याति प्राप्त कर हमारे देश के उन कलाकारों को छोड़ जाते है उसी झुग्गी की जिंदगी जीनें के लिए जिसे शायद वो अब तो नहीं जीना चाहते होंगें. लेकिन विदेशी निर्देशको का इसमें कोई कसूर भी तो नहीं है, वो अपनी एक फिल्म बनानें के लिए आऐ थे जिसकी कहानी भारतीय थी तो कलाकार भी भारतीय चाहिए थे, वो भी ऑरिजनल दिखनें वाले तो झुग्गी के बच्चे ले लिए, रहा काम पूरी फिल्म की शूटिंग का, तो वो तो किसी भी संघर्षरत कलाकार से करवा लेंगे.
दोस्तों बात पते कि ये है कि फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में गरीब झुग्गी के बच्चे सलीम का किरदार निभानें वाले 10 साल के अजरुद्दीन ने जो चरित्र निभाया है फिल्म में उसकी तारीफ सबनें की, लकिन ऑस्कर के रेड कार्पेट से लोटनें के बाद अजरुद्दीन की जिंदगी फिर से उसी झुग्गी में रह गई जो कि फिल्म में काम करनें से पहले थी. शायद फिल्म की शूटिंग के दौरान उसनें अपनें को इन बड़े-बड़ें नामों में जोड़ने की बात तो नहीं सोची होगी पर अपने इस झुग्गी के जीवन से तो कुछ बेहतर ही सोचा होगा. बांद्रा के गरीब नगर झुग्गी-बस्ती में रहनेंवाले अजरुद्दीन के जह़न से ऑस्कर की चकाचौंध की रौनक अभी हटी भी नहीं थी, कि उसके पिता इस्माइल ने अजरुद्दीन की मीडिया के सामनें ही पिटाई कर दी. ये वो हकीकत थी जिसनें अजरुद्दीन को
ऑस्कर की दो पल की अमीरी से गरीब नगर की हकीकत से रु-ब-रु
करा दिया था. हमारे देश में हर साल न जाने कितनें अवार्ड दिए जाते है, हर साल एक नए नाम से अवार्ड दिया जाता है, एक ही फिल्म परिवार को न जाने कितनें अवार्ड मिल जाते है, और बेटी-बेटा फिल्मों में चल पड़ते है.
कैसे न कैसे करके हमारें निर्माता-निर्देशक चले जाते है उनकी दहलीज पर उन्हें साइन करने के लिए. और वे बन जाते है स्टार..
भारतीय फिल्म इतिहास में कितनें ही ऐसे स्टार होंगे जो कि बादशाह, किंग, शहंशाह, हीरो न.1 खिलाड़ी, सुपर स्टार औऱ न जाने कितने ही उपनामों से जानें जाते है. लोकिन ऑस्कर के उस स्टेज तक पहुंचनें में किसी को कामयाबी आज तक नहीं मिली. पर एक झुग्गी के एक लड़के में शायद ऑस्कर की नहीं बल्कि अपने लिए एक बेहतर जिंदगी की आस थी,
लेकिन आठ ऑस्कर जितनें वाली फिल्म का बेहतरीन हिस्सा होनें के बावजूद अजरुद्दीन की सुबह में वही बात थी जो कि फिल्म के बारे में जाननें से पहले थी. म्यूनिसिपल स्कूल में पढ़ने वाला अजरुद्दीन शायद सोच रही होगा कि अब उसके दिन फिर जाएंगें. पर ऐसा हुआ तो नहीं. ये कोई “भारतीय रिऐलिटी शो थोड़ी न है जिसमें की आपकी मुंबई का ही कोई नेता आप से खुश होकर आपको फ्लैट गिफ्ट कर दे” न ही आप कोई लड़की है जिस पर की कोई कृपा करें. और रही बात भारतीय फिल्म निर्माताओं की तो वे तो पहले ही उन कलाकारों को लेते है जिनसे कि उनकी फिल्म को पैसा मिल सके. निर्देशक तो पहले से ही सुपर स्टार से कम में बात ही नहीं करते, जो छोटे निर्देशक हैं भी वो बेचारे बिना स्टार पुत्र-पुत्री जो लोग फिल्मों में जो लोग काम कर रहें है वे उनके अन्नदाता है, हां कुछ लोग है जो कि अपनें को कॉमर्शियल सिनेमा से अलग मानते है ऐसे भी निर्देशक है, और भाई लोग बनाते भी नेशनल अवार्ड वाली फिल्में है. पर आपने कोई एफटीआईआई से या एनएसडी से एकटिंग में डिग्री भी तो नहीं की न...
तो थोड़ा मुशकिल है भाई अजरुद्दीन के दिन फिरना...अभी तो बांद्रा के गरीब नगर को ही अपनें जीवन की सच्चाई मानों.
हमारे देश में शायद जीवन की सच्चाई पर फिल्में नहीं बनती है, और अगर बनती भी है तो निर्देशक फिल्म के किरदारों के साथ पूर्ण न्याय नहीं कर पाते या फिर वो भारत की उस सच्चाई को बतानें से डर जाते है जो कि विदेशी फिल्मकार या भारतीय मूल के विदेशी फिल्मकार भारत में आकर बता जाते है, और ऐसा बता कर जाते है कि भारतीय फिल्मकारों के अच्छी फिल्म के विदेशी सपनें को वो स्वंय इस देश में यहां की कहानी, यहां के चरित्र, यहां के ही साथियों-सहयोगियों द्वारा सच साबित कर मुंह चिढ़ाकर चले जाते है. और शायद यही चिढ़ और खीज हमारे बॉलीवुड के फिल्मकारों को भारतीय कहानी पर आधारित विदेशी फिल्मों में काम करनेंवालों भारतीय कलाकारों को भारत में उपजनें नहीं देती. यदि कोई सक्षम इंसान भी कोई ऐसा काम करता है जिससे किस देश का क्या उसके राज्यभर में उसका नाम हो जाए तो न जाने कितनें ही लोग, कंपनियां, फिल्मवाले औऱ बहुतेरे ऐसे लोग जो कि अपने नाम को उस व्यक्ति के साथ जोड़ना चाहते है लंबी-लंबी कतारे लगाए खडे हो जाते है, लग जाते है उसकी सक्षम जिंदगी को वैभव और विलासिताओं से लैस करनें में. हमारे मीडियाकर्मी भी अपनी टीआरपी की गिनती बढ़ानें में शायद जिंदगी की उस हकीकत को भूल जाते है जिसे जिदंगी का संघर्ष कहते है. आपको शायद याद हो कि नहीं लेकिन सन् 1988 में एक भारतीय मूल की विदेशी फिल्मकार मीरा नायर ने एक फिल्म बनाई थी सलाम बाम्बे जोकि उस समय में लीक से हटकर बननें वाली फिल्मों में मील का पत्थर साबित हुई. फिल्म में चाय बेचनें वाले बच्चे कृष्णा के किरदार को जीवांत रूप दिया 11 वर्षीय शफीक ने, सलाम बाम्बे ने देश में ही नहीं विदेशों में भी खूब वाहवाही बटोरी. फिल्म की निर्देशक एनआरआई थी और कहानी भारतीय (स्लगडॉग की भांति). सलाम बाम्बे ऑस्कर के लिए भी नांमांकित हुई. लेकिन मिला नहीं, फिल्म में कृष्णा का किरदार निभाने वाले शफीक को बेहतरीन अभिनय के लिए बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. उस समय भी मी़डिया में शफीक के खूब चर्चे थे. पर उसके बाद न तो शफीक का पता चला की वो कहां है न ही वो किसी फिल्म में नजर आया. शायद हमारे देश में उसके बाद ऐसी फिल्में बनना बंद हो गई थी, आज जब किसी विदेशी फिल्मकार को भारत की कहानी पर फिल्म बनानें का मौका मिला तो शफीक की उम्र 32 साल हो गई. तो इसलिए बेचारा आजकल बंगलुरु की सड़को पर रिक्शा चलाकर अपना और अपनें परिवार का पेट पाल रहा है. क्या वो कोई स्टार पुत्र होता तो आज भी उसका ये हाल होता? ऐसा नहीं हे कि केवल स्टार पुत्र ही इस बॉलीवुड में काम पाने में सफल हुए है. परंतु ऐसा क्यों है कि हमारे यहां के निर्देशकों को हमारे देश में हुनर या तो गोरे चिकनें चेहरों में नजर आता है, या कुछ तथाकथित कला फिल्मकारों को केवल एफटीआईआई या एनएसड़ी में. जिस इंसान को जिंदगी ने एक्टिंग सिखा दी उसे कलाकार मानने को कोई राजी नही होता. जैसा कि इस फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में दिखाया गया है. कि बिना किसी डिग्री के कोई व्यक्ति कैसे इतने सारे सवालों के जवाब जानता है. जबकि उस जमाल से ज्यादा पड़े लिखे लोग उस प्रतियोगिता में जाने का सपना मात्र ही देख पाते है. मुझे हमारे फिल्मकारों की स्थिति इस फिल्म के पात्र अनिल कपूर की तरह लगती है, जो कि किसी भी कीमत पर ये माननें को तैयार नहीं होते की हुनर किसी कॉलेज या संस्थान मात्र से नहीं आ जाता, कुछ तो कुदरती भी होता है और कुछ जिंदगी की इस यूनिवर्सिटी में इंसान खुद सीख जाता है.
देखते है कि आने वाले दिनों में अजरुद्दीन का हाल भी शफीक जैसा होता है या उसके दिन शायद फिरेंगे. खैर अभी तो अजरुद्दीन की झुग्गी टूटनें के लिए ऑ़डर आया है. जो कि शायद उसकी दिनचर्या का ही हिस्सा है....

नवीन कुमार‘ रणवीर’

2 comments:

विजय प्रताप said...

अलग - अलग पेशों से जुड़े लोगों का काम अलग - अलग होता है. हालाँकि वह भी समाज के हिस्से हैं इसलिए उनसे भी यह उम्मीद जायज है की उन्हें अगर कहीं गलत दीखता तो उसे ठीक करने में आपना योगदान करे. slamdog कि सच्चाई से लड़ने के लिए कोई विदेशी हमारा नेता हैं हो सकता. उसके लिए हमें खुद खडा होना होगा. वहीँ से जहाँ हम खड़े है. विजय प्रताप

अरुण कुमार वर्मा said...

bhaut sahi bahi... kab se suru kiya?