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Sunday, February 8, 2009

भारतीय जनसंचार संस्थान का पूर्व छात्र मिलन समारोह

भारतीय जनसंचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता के छात्रों ने पूर्व छात्र मिलन समारोह आयोजित किया. जिसमें की संस्थान से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करनेवाले कई छात्रों ने आकर अपने पूराने दिनों को ताजा किया और संस्थान के छात्रों के साथ अपने पुराने अनुभवों को बांटा...हर कोई अपने पुराने दोस्तों से मिलने के लिए उत्सुक नजर आ रहा था. किसी की निगाहों में पुरानी दिनों की यादें ताजा दिखी, तो कोई अपने लिए नई राह की तलाश में व्यस्त दिखाई दिया.... तो कोई संस्थान में बिताए अपने पुराने दिनों की कहानी सुनाने को बोताब था.... किसी ने अपने प्यार के पाने के लिए संस्थान का धन्यवाद दिया... तो कोई अपने गुरुजनों के साथ के अनुभवों को बता रहा था जिसे की शायद वो कभी न भूला पाया. हर कोई खुश था... मैं भी.. समय कम होने की वजह से मुझे वहां अपनी क्लास के अनुभवों को बांटनें का मौका न मिला इस लिए आपसे वो पल बांचना चाहता हूं...
मेरा बैच तो इससे पिछला ही था (२००७-०८) तो मेरे साथियों की संख्या सबसे ज्यादा थी, पर फिर भी सभी ४० नहीं थे... हो सकता है कि अगले साल वाला बैच भी शायद ऐसा ही कोई आयोजन करें, तब हमारे बैच के सदस्यों की संख्या शायद और भी कम हो जाएगी... एक सवाल हमारे बैच के छात्रों के दिलों में था ओर कुच की जुबां पर भी आ गया कि, हमारे साल में हमनें ऐसा कोई आयोजन क्यों नहीं किया था? जवाब भी हमारे सब के पास था, जो क्लास पूरे साल सिर्फ सी.आर के चुनाव को लेकर राजनीति का शिकार रही, उसमें एक सफल आयोजन होना चुनौती पूर्ण था. हमारी क्लास (2007-08) में राजनीतिक विचारधाराओं का इतना बड़ा द्वंद होता था की कुछ लोगों के लिए वह प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता और यही कारण था की पूरे कोर्स के दौरान हमारा कोई एक नेता ही नहीं बन पाया था, जो किसी आयोजन को करने की जिम्मेदारी ले और क्लास के सभी लोग उसका समर्थन करते.
हर बात का निर्णय हमारे टीचर्स के सामने होते थे। हर बात एक विवाद का विषय बनती थी, पहले दिन से ही लोगों ने बिहारवाद, भूमिहारवाद फैलाना शुरु कर दिया। जिसके मन में ऐसे विचार नहीं थे वो भी बोए गए, कहीं कोई बिहारी नहीं है तो भूमिहार तो है, बस किसी न किसी तरह उसे अपने साथ लिया जाए... कई बार कोशिश ये हुई की कैसे सत्ता हमारे हाथ आए, मतलब कुछ लोगों के लिेए वो क्लास एक राजनीतिक अखाड़ा बन गई थी, जिसमें की गुटबाजी के बिना शायद नींद न आना संभव न हो पाता आप सोच रहें होगे की मैं अपनी क्लास की बुराई क्यों कर रहा हूं॥ पर दोस्तों ये वो सच है जो मैनें महसूस किया, मैं मूल रूप से राजस्थानी हूं मेरे पूर्वज ७० साल से दिल्ली में रह रहें है। मुझु लोग दिल्ली वाला कहते और बताते की दिल्ली के लोगों के बारे में उनके विचार कैसे है, फिरल मेरे बारे में कहने के लिए उनका तर्क था होता की ' तुम तो राज्सथान से हो ना इसलिए तुम ठीक बंदे हो वरना तो साले दिल्ली वाले सभी मतलबी होते है'।
मुझे लगा कि आगे देखेंगे की कोई कितना मतलबी होता है...१० दिनों के अंदर जोड़तोड़ की राजनीति पनपने लगी, कहीं क्षेत्रवाद की गंध ने सारी क्लास को सड़ा कर रख दिया था, तो किसी को जाति के नाम पर अपने साथ मिलाने की कोशिश हो रही थी, जिसके साथ इन दोनों में से कोई संबंध नहीं बन पा रहा था तो वैचारिक रूप से अपने साथ मिलाया जाए मतलब आप भी संघी हम भी संघी, ये भी नहीं बन पा रहा तो आरक्षण के विरोधी हो या समर्थन में इस मामले में भी बड़ी साख बनी हुई थी। ये भी नहीं तो सवर्ण और दलित पिछड़ा अलग, अल्पसंख्यक तो कोई था ही नहीं।
क्लास के पहले ही दिन कुछ राजनीतिक मठाधीशों ने लोगों के उपनाम जांचना शुरू कर दिए थे कौन-कौन किस-किस जाति का है, कौन राज्य का है।
यहां तक की क्लास का काम जो एसाइंमेंट या जो प्रैक्टिकल काम मिलता था उसे पूरा करने के लिए भी लोगों को अपने जातिबंधुओं का ही ग्रुप चाहिए होता था। क्या भाई ऐसा तो शायद उस दिल्ली में भी नहीं होता जिसे आप गाली देते हुए आप अपने राज्य से आए और आज भी गाली ही देते हुए यहां कमा खा रहें हैं। ऐसा नहीं है कि सभी ऐसे लोग थे, पर जो नहीं भी थे उन्हें भी उनके जैसा होना पड़ा।
खैर बात सीआर के चुनावों की हो रही थी हम आगे निकल आए... तो क्या हुआ की चुनाव बड़े ही गजब हुए थे भाई, मेरा तो उस दिन जन्मजिन था तो मैं तो आया नहीं था, अचानक चुनाव करवा दिए गए, संख्या के अनुपात में बिहार, उ।प्र के छात्र सबसे ज्यादा थे, उसके बाद कुछ झारखंड़ थे, तो कुछ
हिमाचल से, दिल्ली से दो तीन थे, दो राजस्थान से। चुनाव में जीत उसी ग्रुप के प्रत्याशी की हुई जिसके लिए ये सारी जोड़-तोड़ शुरू हुई पर मामला बिगड़ गया। जिसे मनमोहन सिंह बना कर बिठाया, उसके लिए सबके हित की बात करना मठाधीशों को भारी लिए भारी पडने लगा था, एक महीनें के बाद दुबारा चुनाव के लिए अध्यादेश जारी कर दिया गया था... पर बात को किसी तरह संभाला गया...
परंतु पूरे कोर्स के दौरान बेचारी सीआर को हटाने का जुगाड़ करते नेताजी ने क्या नहीं किया...
मुझे समझ नही आया की अब अचानक ये क्या हो गया कि जिस लड़की को सीआर बनवाने के लिए बिहार को लामबंद किया गया, भूमिहार को लामबंद किया गया, और जो लड़की प्रत्याशी थी वो ब्राह्मण थी हिमाचल पीठ तक के मठाधीशों ने समर्थन किया था, पर आज केवल वहीं दो पांच लोग उसे हटाना चाहते है, जबकि उसके विरोधी दौबारा चुनाव नहीं चाहते थे... क्या यार पूरा साल ये सब करते रहे कुछ लोग....अब समझ नहीं आता की दिल्ली वाला कितना बुरा हो सकता है या किसी और राज्य का नागरिक, मेरे दोस्त आज भी तू कहीं भी हो ये दिल्ली वाला तेरे लिए अच्छा ही सोचेगा क्यों की कभी साथ बैठ एक थाली में खाया था, इससे तो बड़ा कोई क्षेत्र या राज्य या देश नहीं ,कोई राज्य, बोली, भाषा, जाति, धर्म, बुरा नहीं होता बुरी होती है सोच, बुरे् होते हैं आपके कुछ अनुभव, जिसे की आप अपनी जिंदगी का नियम बना लेते हैं... मैं आप से मिला तो क्या मैं आपके पूरे राज्य या जाति के बारे में एक विचार रखूं...
पर मैनें अपनी जिंदगी के सबसे हसीन पल बिताए आईआईएमसी में....

2 comments:

विजय प्रताप said...

दोस्त,
दरअसल जाति हमारे समाज की एक बड़ी सच्चाई है. कुछ लोगों के आत्मविश्वास का यही आधार होती है तो कुछ को पीछे रखने में इसी का हाथ है. आई आई एम् सी के अपने दिनों में भी हमने इसी सच्चाई को देखा जैसा की रोज के जीवन में दिखाते हैं. हमें ख़ुशी होनी चाहिए की हम लोगों ने इससे लड़ने की खूब कोशिश की. बाकी तुम लोगों के साथ गुजरे वो दिन जिन्दगी के बेहतरीन लम्हों में से है, मीट मेंनहीं आ सका इसका हमेशा मलाल रहेगा.

अरुण कुमार वर्मा said...

यार नवीन तूने सच ही लिखा है कोई भी जगह खराब नहीं होती। खराब होती है हमारी सोच। हमें अपनी सोच को बदलना चाहिए। जिसके लिए कम से कम मैं तो प्रयासरत हूं।