
वो पहले प्रेमिका थी,
फिर पत्नि बनी, फिर मां...
हर किसी के लिए एक रिश्ते के साथ
हर किसी के लिए एक नाम के साथ
हर किसी के लिए नई जिम्मेदारियों के साथ
हर किसी के लिए नई जिम्मेदारियों के साथ
और हर किसी के लिए करुणा के साथ।
वो अपनें लिए कभी कुछ ना करे,
करे बस औरों के लिए...
बदली जो कभी वो,
तो बनी बुरी सदा...
सब कुछ वो ही क्यों निभाऐ?
क्यों साथी ना मिले ऐसा जो उसकी समझे
और अपनी भी बतियाऐ...
कौन सुनें उसकी और किसे अपनी व्यथा बताऐ?
सब कुछ वो ही क्यों निभाऐ?
क्यों साथी ना मिले ऐसा जो उसकी समझे
और अपनी भी बतियाऐ...
कौन सुनें उसकी और किसे अपनी व्यथा बताऐ?
गर जगह दे दिल में,
तो जिंदगी में जगह क्यों ना दे पाए?
समय पर ही ध्यान दे लेवे
तो वो काहे बाहर जाए...।
क्यों फिर तिरस्कार का अपमान,
झट बौना कहलाए...
रिश्तों की झूठी शान में,
क्यों बैरी मन हो जाए...।
क्यों ना करे वो अपनें मन की...
क्यों ढ़ोए वो झूठे रिश्तों की खाली गगरी...
1 comment:
achchhi kavita likhi hai sathi....vastvik jindgi me bhi yah jari rahana chahie.....sanjida kavita!
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