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Friday, November 20, 2009

नेहरू चाचा का बड्डे!


दिन 14 नवंबर 2009 दिल्ली, मैं रोज़ की तरह अपनें काम पर जानें के लिएअपनी मोटर साईकिल पर निकला। नई दिल्ली स्टेशन से अजमेरी गेट होते हुएमुझे आईटीओ जाना होता है। रोज़ की तरह मैं अपने तय समय पर था। तुर्क़मानगेट तक रास्ता साफ था, पर दिल्ली गेट पहुंचनें पर अचानक ट्रैफिक काफीज्यादा सा दिखनें लगा। मैंनें लाल बक्ती का जाम समझा और अपनी कलाई परबंधी घड़ी देख इंतज़ार करनें लगा। समय हुआ था 7:30(सुबह के) सोचा किधीर-धीरे ट्रैफिक आगे बढ़ेगा। मुझे दिल्ली गेट की बत्ती से दाईं ओरबहादुर शाह ज़फर मार्ग पर मुड़ना था। वही बत्ती मेरे दाईं और बनेंलोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल(ईर्विन हॉस्पिटल) जानें वालों के लिए भीमार्ग है। पर 10 मिनट से ज्यादा हो जाने पर मैंनें जानना चाहा कि क्याकारण है जो कि इस तरफ की बत्ती नहीं हरी हो रही है? दूर नज़र दौड़ाई तोदेखा कि दिल्ली गेट के चौराहे पर लाल बत्ती बंद थी और ट्रैफिक पुलिस हीट्रैफिक नियंत्रण कर रही थी। फिर चारों और एक बार फिर देखा तो हर जगह हरतरफ ख़ाकी वर्दी में भी पुलिस वाले तैनात थे। एक बार को तो सोचनें लगा किकल रात की बड़ी ख़बर क्या थी? क्या अमेरिकी आतंकवादी हैडली भारत तो नहींआ रहा आज? ख़ैर ये मेरी मन में उपजा एक व्यंग भर था। मेरे साथ में ही दोअलग-अलग मोटर साईकिल पर तीन पुलिस वाले खड़े थे, वे भी ट्रैफिक छूटनें कीबाट जोह रहे थे, मेरी तरह। मैंनें उन्हीं से पूछा कि आज कोई ईवेंट हैक्या? जवाब आया “चाचा नेहरू का बड्डे है”। मैनें पूछा, तो इस तरफ काट्रैफिक क्यों रुका है? जवाब आया “हम भी उसी के छूट्ण का इंजार कर रे सै,प्रधानमंत्री आ रे सै भाई”।मैनें कहा कि अभी तो आए थे 2 अक्तूबर को गांधी जयंती पर और 31 अक्तूबर कोभी इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर, तब भी ट्रैफिक के रूट बदले गए थे औरलोगो को काफी परेशानी हुई थी? पुलिस वाले अपने हरियाणवीं लहज़े में फिरबोले “अजी के बतावै, इन्ननैं(नेताओं को) काम के है, रोजीना किसी ना किसीका जन्मदिवस और मरण दिवस मनावै सुसरे, तड़कै तीन बजै तै पुलिस फोरसलगावै है अर सारी फोरस एक्कै काम्मा मैं ई हाजरी दे है। या बीच फ़ेर कोईक्राईम हो जावै तै म्हारी(पुलिस की) जान आफ़त मैं आवै ”। ट्रैफिक अभी भीछूटा नहीं था, मैनें बातचीत दिलचस्प होती देख अपना हेलमेट उतार दिया औरफिर कई सवाल पूछे। तो नेता लोग तो शांति वन में फूल चढ़ा चुकें होंगे अबतक, फिर क्या देरी है? जवाब आया कि “अजी वा बी तो सै आज के कै हैं…?चिल्डरन डे, बाल दिवस भी तो सै आज, अंबेडकर सटेडियम में फ़ंगसन सै,बाल्ण्क खेल तमासे करेंगे। प्रधान मंत्री जी आरे हैं।”ट्रैफिक अभी-भी नहीं छूटा था, मैनें फिर घ़ड़ी देखी 7 बजकर 45 मिनट होचुके थे। बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मैनें कहा कि अपनें पीएमजी भी गज़ब हस्ती हैं, अभी उनके एक दौरे पर चंडीगढ़ में एक व्यक्ति केसमय पर अस्पताल ना पहुंच पानें के कारण मृत्यु हो गई थी, आज फिर इनकेदौरे से आम आदमी को परेशानी झेलनी पड़ रही है। (मेरा मतलब मेरे बाईं औरबनें एलएनजेपी अस्पताल (सरकारी अस्पताल) में आनें वाले मरीजों से भी था)।तो पुलिस वाले बोले “भाई के बतावै, थमनैं थारी पड़ री सै, हमनैं म्हारी,बत्ता तो दी तन्नै कि पीएम आरे हैं किसनैं पत्ता सै कि अस्पताल का मरीजहै कै आंतकवादी? सुरक्षा तो तगड़ी रखनी पडै है”। मैनें फिर झुंझलाहट मेंकहा कि ये कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के नेताओं का जन्मदिवस औरपुण्यतिथि आम लोगों के लिए हमेशा परेशानी का सबब क्यों बनती है?इतना कह मैं शांत हो सोचनें लगा, कि और भी तो प्रधानमंत्री रहे हैं भारतमें या कांग्रेस पार्टी में भी, उन नेताओं को क्यों नहीं कोई क्यों नहींयाद रखता? क्यों नहीं कोई याद रखता पीवी नरसिंह राव का जन्मदिन यापुण्यतिथि? उनकी तो समाधि भी उनके पैतृक गांव में बनाई है। तो जवाहर लालनेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की समाधि क्यों नहीं इलाहाबाद मेंबनाई गई? जो अमेठी रायबरेली सीट आज तक नेहरू-गांधी परिवार की बपौती बनींहुई है क्यों नहीं उसी जनता के बीच ही उनके प्रिय नेताओं की समाधि बनाईंजाती। जिससे कि दिंवगत नेता भावी नेताओं के प्रेरणा स्त्रोत बनते? औरशायद इससे पार्टी की यूपी ईकाई भी आज तक मज़बूत बनीं रहती। सांसद कहीं केऔर समाधि कहीं? ये फैक्टर भी शायद काम कर रहा होगा यूपी में... जिस जनताका प्यार मिला पुश्तों तक, उसी मिट्टी में समा जानें का माग्दा हर किसीमें भी नहीं होता शायद...? चौधरी चरण सिंह, मोरार जी देसाई, वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर सभी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं, उनका जन्मदिन औरपुण्यतिथि कब होती है, शायद किसी को पता भी ना हो? इनमें से चौधरी साहबके सुपुत्र अजीत सिंह भी अपनें पिता कि समाधि दिल्ली में बनवानें मेंकामयाब रहे, ख़ैर ये शायद उनकी कोई जिद्द रही होगी! परंतु कांग्रेस केनेता और भारत के पूर्व राष्ट्रपति दिंवगत शंकर दयाल शर्मा का समाधि कहांहै पता नहीं, मैनें एक बार नाम सुना था, शायद शंकर घाट है, पर कहां है येनहीं जानता, कब जन्मदिन होता है और कब पुण्यतिथि किसी ये कांग्रेसी नेतासे पूछूंगा जरूर।अब मेरे साथ में खड़े पुलिस वाले ने मुझे आवाज दी “कै सोचण लगै भाई जी”?मैनें फिर अपनी घड़ी देखी, 8 बजकर 5 मिनट हो चुके थे। मोटर साईकिल कोस्टैंड लगा मैं आगे देखनें लगा तो मुझे सड़क पूरी तरह से बंद दिखाई दी,आगे बैरीकेट्स लगे थे। राजघाट से आनें वाले ट्रैफिक को पूरी तरह से आनेंदिया जा रहा था। नेताजी सुभाष मार्ग से बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर जानेंके लिए भी रास्ता धीरे-धीरे चालू कर दिया था। पर अजमेरी गेट से आईटीओ केलिए रास्ता अभी-भी ना खुला था। मेरे आगे खड़ी मोटर साईकिल पर बैठे एकअन्य पुलिस वाले ने समय व्यर्थ न करते हुऐ, सिगरेट निकाल कर सुलगाई औरट्रैफिक खुलनें का इंतजार करनें लगा। उसके लिए भी राहत का समय था क्योंकिवो भी अपनी ड्यूटी पर पहुंचनें की बजाए ट्रैफिक जाम का लुत्फ़ उठा रहाथा। अब मेरे सब्र का बांध भी टूट चुका था, मैं काफी लेट हो गया था। मेरेऑफिस से फोन भी आ रहे थे लेकिन मैनें कोई भी फोन नहीं उठाया। मुझे डर लगाकि सुरक्षा के इंतज़ाम इतनें पुख़्ता हैं, कहीं कोई ड्राईविंग करते समयमोबाईल के प्रयोग की धारा के तहत ट्रैफिक के उल्लंघन का चलान ना घर भेजदे! ख़ैर आखिरकार 8 बजकर 15 मिनट पर सड़क खड़े बैरिकैट्स हटाए गए,रस्सियां भी खोल दी गई। धीरे-धीरे ट्रैफिक सरकनें लगा। मैंनें मोटरसाईकिल स्टार्ट की और चल दिया। ऑफिस पहुंचा तो अपनें सहकर्मी से पूछा किबॉस आ गए क्या? जवाब आया कि “बॉस भी अभी नहीं आए”। मेरी जान में जान आई,मैं बोला कि वो भी शायद मेरी तरह चाचा नेहरू के जन्मदिवस में अप्रत्यक्षरूप से शामिल हो रहे होंगें। इतनें में मेरे सहकर्मी नें बताया कि “अभीक्यों डरते हो, अभी तो 19 नवंबर को इंदिरा गांधी की जयंती भी है”। अब आगेमेरे पास तो कहनें को कुछ नहीं है, आप स्वंय समझदार है।

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