Thursday, January 27, 2011

बिहारी साथी ध्यान दें।



मुगल सराय से दिल्ली आते समय मगध एक्सप्रेस में लगा ये प्रचार काम की तलाश में बिहार से दिल्ली आनेवालों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्र सरकार की मनरेगा से भी ज्यादा भरोसा दिलाता दिखाई देता है। विजय कुमार नाम के इन महोदय से बिहार के कितनें लोग संपर्क कर पाये है मैं नहीं जानता, परंतु बिहार के लेखक,पत्रकार,साहित्यकार और बुद्दिजीवियों ने भी अपने बिहार के लिए ऐसा माग़दा नहीं दिखाया होगा। रोज़गार के इस सागर से एक-एक लोटा सभी बेरोज़गार बिहारी भाई-बहन भर लें तो कम-से-कम किसी को अपनें घर से दूर जाकर किसी चाचा-भतीजे के गुंड़ों की पिटाई तो नहीं खानी पढ़ेगी। और ना ही बिहार के नेता रेल मंत्रालय मांगेगे! क्योंकि रोज़गार होगा तो बिहार से दिल्ली-मुंबई ट्रेन चला कर जनता को बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प बचेगा नहीं।

Friday, January 21, 2011

प्रेम का स्वरूप!


दिल्ली के सरकारी स्कूल में ग्यारवीं में पढ़ते वक्त एक दोस्त की प्रेम कहानी के चर्चे हमेशा यारों की बातचीत का विषय रहते थे। स्कूल के नज़दीक ही रहनें वाला नरेंद्र जाति से दलित था, उसके पिताजी किसी फैक्ट्री में मज़दूरी करते थे और घर में ही चाचा की दर्जी की दुकान थी। यौवन की उस उम्र में नरेंद्र को अपने मोहल्ले की ही डॉली से प्रेम हो गया वो भी हमारे ही स्कूल में सुबह की शिफ्ट में पढ़ती थी, लड़को की शिफ्ट दोपहर की थी। डॉली जाति से ब्राह्मण थी उसके पिता वकील थे। सामान्यत: जैसा होता है मोहल्ले में दलित जातियों की अपेक्षा उनका अधिक रसूख़ था। ग्यारवीं और बारहवीं क्लास के दौरान नरेंद्र और डॉली की प्रेम कहानी के चर्चे क्लास में आम थे। सरकारी स्कूल में किसी की प्रेम कहानी होना एक बड़ी बात थी। नरेंद्र पढ़नें में अच्छा था, वो हम इसलिए भी कह सकते है क्योंकि वह कभी भी फेल नहीं हुआ था क्योंकि स्कूल में एक बार में दसवीं पास करनें वाले दो-तीन ही छात्र थे और ग्यारवीं में कॉमर्स मिलना स्कूल में श्रेष्ठ माना जाता था ,क्योंकि साइंस नहीं थी। ख़ैर स्कूल पास करनें के बाद मेरी नरेंद्र से मुलाकात काफी सालों तक नहीं हुई। मैनें कॉलेज में बी.कॉम में एडमिश्न ले लिया और मेरी क्लास से क्या, पूरे स्कूल से मैं ही एक ऐसा छात्र था जिसनें रेगुलर कॉलेज में एडमिश्न लिया। मुझसे ज्यादा नंबर लेनें वाले नरेंद्र ने पारिवारिक स्तिथि के चलते कोई पार्ट टाइम काम पकड़ लिया था और ऐसे ही कई कारणों के चलते बाकि दोस्तों ने भी ऐसा ही कुछ किया। कॉलेज से आते वक्त कभी नरेंद्र के मोहल्ले के पनवाड़ी की दुकान से सिगरेट लेते वक्त नरेंद्र का हाल-चाल जान लेता था। वो दुकान मेरे ही स्कूल में आर्ट्स में पढ़नें वाले सिब्बू की थी,अब वो दुकान ही संभालता था। सिब्बू से पता चला कि नरेंद्र की प्रेमिका डॉली की शादी हो चुकी है उसके पिताजी ने जाति और रसूख़ के चलते उसकी शादी ज़बरदस्ती कहीं और कर दी है। मेरा मन हुआ कि एक बार नरेंद्र से मिला जाए, मैं उसके घर गया और शायद दो-तीन साल के बाद मैंनें नरेंद्र को देखा था। देखनें में मुझे वो बिल्कुल मुरझाया सा, हताश सा दिखा। मैनें उससे डॉली(उसकी प्रेमिका) की बात छेड़ी तो उसने कुछ जवाब नहीं दिया। मेरे काफी देर उसे दिलासा देनें पर वो बोला तो उसकी आवाज़ में एक विश्वास था ऐसा विश्वास जिससे मैं कभी रूबरु नहीं हुआ था और जिसे समझनें में मुझे कई साल लग गए। उसनें कहा कि “वो कहीं नहीं गई नवीन भाई वो आएगी...मेरे पास ही आएगी...” मुझे उसका ये कहना एक हारे हुए आशिक की खुद को दी जानें वाली दिलासा लगी। और मैं जो अपनें को भावनाओं से ऊपर देखता था, उसे जीवन में आगे बढ़नें का धीरज बंधा रहा था। मैनें उसे सलाह दी कि “अब मत कुछ सोचो और छोड़ दो उसे वो अब नहीं आएगी, एक बार यदि लड़की पति के घर गई तो वो पति की हो गई बस! और तुम क्या सोचते हो कि वो तुम्हें अभी भी याद करती होगी या ऐसे ही तड़पती होगी जैसे तुम तड़पते हो? मेरे दोस्त नरेंद्र ऐसा नहीं होता वो खुश है अपनें जीवन में उसके मां-बाप की इज्जत, समाज का दिखावा, ऊंची जाति का रूबाब उसे कभी तुम्हारी याद नहीं आनें देगा मेरे दोस्त भूल जाओ उसे”। नरेंद्र ने मेरी तरफ एक कुटिल मुस्कान फेंकी और कहा कि “नवीन भाई तुम नहीं समझोगे मैं जानता हूं और वो जानती है कि हम एक ही है, आज भी मेरी है उसके पास रहते हुए भी, उसकी आत्मा तो मुझमें ही है, वो आएगी मेरे पास देखना तुम और जमानें के मुंह पर तमाचा मार के आएगी”। मुझे नरेंद्र की बातों में पागलपन लगा और मैनें उसे भविष्य की बधाई देते हुए अलविदा कह दिया। इसके बाद मैं एम.ए दर्शनशास्त्र पढ़नें के हिंदू कॉलेज चला गया फिर मेरा अपनें स्कूल के दोस्तों से जो रहा-सहा संपर्क था वो भी टूट सा गया। करीब एक साल बाद मेरे मोबाइल पर एक फोन आया "नवीन भाई मैं नरेंद्र बोल रहा हूं" मुझे लगा कौन नरेंद्र ग्रेजुएशन और एम.ए के दोस्तों में तो कोई नरेंद्र नहीं है, फिर उसनें कहा कि स्कूल वाला नरेंद्र, मैं पहचान गया था। नरेंद्र से हाल-चाल पूछा तो उसनें बताया कि आज शाम को मेरी शादी की पार्टी है और मुझे जरूर आना है।
मैं हैरान हुआ कि अचानक शादी कैसे? तो उसनें बताया कि आप आओ तो सही। मैं शाम को नरेंद्र के घर गया तो देखा डॉली और उसकी शादी हो चुकी है। मुझे बड़ी हैरानी हुई नरेंद्र ने मुझे पहली बार डॉली से मिलवाया मैं नरेंद्र से उम्र में बड़ा था तो उसनें मेरे पांव छूए। पार्टी में स्कूल के बाकि दोस्तों भी आए थे उनसे पता चला कि डॉली के पति ने उसे खुद तलाक़ दे दिया था, डॉली ने अपनें प्रेम की निष्ठा को बचाए रखा था, जिसके आगे वो हार गया था और अपनी कन्नी-काट बेटी का ब्याह रचानें वाले डॉली के मां-बाप ने अपनी बेटी को अपनानें से मना कर दिया था। नरेंद्र ने तो अपने प्रेम की लौ को जालाये रखा था तो उसनें तो डॉली को अपनाना ही था। प्रेम में अटूट निष्ठा के उदारहण बनें डॉली-नरेंद्र के सामने ज़मानें की भी हार हुई और प्रेम में व्यवाहरिकरता का ज्ञान-बघारनें वालों की भी। आज नरेंद्र एक एकाउंटेंट है और डॉली गृहणी, उनके एक बेटी भी है। मुझे नरेंद्र ने एक सीख दी की यदि अपने प्रेम पर विश्वास और साथी में निष्ठा हो तो उस प्रेम को कोई समाज,रूत्बा,पैसा,जाति,धर्म,संस्कृति डिगा नहीं सकती। ऐसे उदाहरण प्रेम के वास्तविक स्वरूप में विरले ही देखनें को मिलते है।

Tuesday, October 26, 2010

हेल्थ और वेल्थ के बीच पिसा “कॉमन”



दिल्ली में हाल ही में सम्पन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स का जश्न आप सभी ने
देखा होगा, कितना भव्य स्टेडियम, कितनी भव्य आतिशबाज़ी और कितना रंगारंग
कार्यक्रम, वाह! इस आयोजन पर हर किसी भारतीय को गर्व होगा। बात भी ठीक है
बेटी का ब्याह ठीक से हो जाए तो सभी घरातियों(लड़की वालों) को गर्व करनें
का अधिकार तो होता ही है। पर आज हम इस आयोजन की भव्यता की या कामयाबी की
बात नहीं करेंगे। हम बात करेंगे, सीडब्लूजी के मुख्य आयोजन स्थल जवाहर
लाल नेहरु स्टेडियम की भव्यता को गेम्स तक बनाए रखनें में योगदान देनें
वाले सफाईकर्मियों की या अंग्रेजी में कहे तो हाऊस कीपिंग स्टाफ की। इस
स्टाफ को तीन महीनें के लिए गुड़गांव की किसी एटूजेड नाम की कंपनी ने रखा
था। नियुक्ति के समय वादा किया गया किया गया कि 8 घंटे की शिफ्ट होगी और
5200 कुछ रु प्रतिमाह के हिसाब से मिलेगा। लेबर(सफाईकर्मियों) को खाना घर
से लाना है जिसके बदले आपको 750 रु खानें के अलग से दिऐ जाऐंगे चाय-पानी
कुछ नहीं। सुरक्षा कारणों के चलते मज़दूरों को ज्यादा दिनों तक खाना नहीं
लानें दिया गया। एक दिन में कोई ऐसा समय नहीं था जब हाऊस कीपिंग स्टाफ ने
अपने काम में चोरी की हो। बल्कि मुझे यह कहते हुए कोई शक-शुब़ा नहीं है
कि सबसे ज्यादा काम यदि कोई करता दिखता था तो, वो थे विदेशी कर्मचारी और
हाऊस कीपिंग स्टाफ। लोग आते-जाते रहते पर मैनें इन्हें हमेशा अपना काम
पूरी निष्ठा से करता पाया, ये बेचारे तो किसी आने-जानें वाले को मना भी
नहीं कर सकते थे कि “अभी पोछा लगाया आप ज़रा इधर से चले जाऐ”। हर एक घंटे
में कीट-पतंगों का ढ़ेर स्टेडियम के किसी कोनें को भी नहीं छोड़ता था।
कुछ पल बाद ही टिड्डे और तितलियों की संख्या सैंकडों से लाखों में हो
जाती थी, रात के समय तो मत पूछिए पलक झपकाना तक मुश्किल था। परंतु ऐसी
विकट स्तिथि में भी इन सफाईकर्मियों नें अपना काम पूरा किया वो भी निष्ठा
और ईमानदारी से। रोज़ सुबह मीडिया लॉंज, फोटों और प्रेस वर्क रूम कि सफाई
करनें वाली राधा का कहना था कि हर रोज़ उन्हें खानें को लेकर एक संघर्ष
करना होता है कभी खाना खराब आता है तो कभी आता ही नहीं है, कभी आता है तो
हमें खानें का समय ही नहीं मिल पाता और खाना खत्म हो जाता है। दरअसल
खानें को लेकर मामला क्यों इतना बिगड़ा आपको बताते है। आयोजन समिति ने
जेएनएल में खानें का ठेका पहले अग्रवाल फूड प्रोड्क्ट्स लि.(वर्क फोर्स
के लिए) को दिया, बाद में ये काम गोयल फूड(वर्कफोर्स और वॉलेन्टियर्स) को
दिया गया। वीआईपी लोगों के लिए खानें का ठेका ग्रेविस को दिया गया, अन्य
स्टेडियमों में वीआईपी लोगों के लिए खानें का ठेका लॉरेंस रोड़ दिल्ली के
सेवन सीज़ को दिया गया और दर्शकों के खरीद कर खाने के लिए स्टाल लगानें
का ठेका फास्ट ट्रैक को दिया गया, दिल्ली के मशहूर “नाथूज” को यमुना
स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में खानें का ठेका मिला और गेम्स विलेज में 5
सितारा होटल को खानें का काम दिया गया। आयोजन समिति की तरफ से अन्य
वेन्यूज़ पर अन्य कंपनी को खानें काम सौपनें पर भी खानें को लेकर वर्क
फोर्स को हमेशा से शिकायते मिलती रही। इसमें कोई दो राय नहीं कि खाना
ख़राब आ रहा था वो भी सप्ताह में पांच बार। जेएनएल में हाऊस कीपिंग स्टाफ
के लोगों को जब खाने को लेकर हड़ताल करनी पड़ी और काम रोक दिया गया तो
एटूजेड कंपनी नें आनन-फानन में अपनें से बीकानेरवाला के “आंगन” की पैक्ड
थाली मंगवाना शुरु कर दिया। पेट की भूख के लिए लड़ते सफाईकर्मियों को कम
से कम एक थाली भोजन से तो संतुष्टी मिली थी। दो दिन बाद नवरात्र शुरु हो
गए हमारी भारतीय महिला बेचारी किसी भी स्थिति में भगवान को नहीं भूलती
सुबह से शाम तक स्टेडियम में सफाई का काम करनें वाली राधा जैसी ना जानें
कितनी महिलाएं व्रत में रहते हुए भी अपना काम पूरी निष्ठा से करती। शाम
को एक कप चाय पीनें के लिए मुझसे सुबह की सफाई के समय ही कह देती कि
“मेरा व्रत है सर शाम को एक कप चाय के लिए बोल दिजिएगा मीडिया लॉंज में
वे लोग हमें मना कर देते है”। मुझे लगता कि जिसकी जितनी मेहनत है उसे
उतना क्यों नहीं मिलता है? सफाईकर्मियों की भांति विदेशी इंजीनियरों की
एक बात की तारीफ करनी होगी वे लोग अपना सारा काम स्वंय करते थे, इतनी
बड़ी-बड़ी लाईटों और ट्रांसमीटरों को वे स्वंय से उंची जगहों पर चढ़ाते
और उनकी सेटिंग करते वो भी बिना किसी लेबर के। ख़ैर हम बात कर रहे थे
हाऊस कीपिंग की उनके लिए खाना तो आनें लगा बीकानेरवाला, मुझे बड़ी खुशी
हुई कि चलों इन्हें तो हम से अच्छा खाना मिल रहा है। पर बाद में पता चला
कि एटूजेड कंपनी वालों अपनें कर्मचारियों(सफाईकर्मियों) के वेतन से खानें
का साला पैसा काट लिया है। जबकि हाऊस कीपिंग स्टाफ का कहना है कि कंपनी
ने पहले कहा था कि 5200 कुछ रुपयों के वेतन के अलावा आपको खानें के पैसे
अलग से दिए जाएंगे यदि नहीं मिला खाना तो। पहले तो खाना मिला नहीं, बाद
में खाना खराब आनें लगा और जब सही आया तो पैसे काट लिए गए। क्लोजिंग
सेरमनी में राधा ने बताया कि कंपनी ने 4400 रु देनें की बता कही है और
कहा है कि बाकि पैसे आपके खानें के काट लिए गए है...। वाह रे मेरे
कॉमनवेल्थ! पूरे दिन मेहनत करनें वालों को ना खाना ढंग का दिया ना पानी
और काम खत्म हुआ तो तनख्वा भी काट ली? क्या बताएं कौन सा कॉमनवेल्थ,
किसकी हेल्थ और किसकी वेल्थ!


नवीन कुमार "रणवीर"
09717370637

Thursday, September 16, 2010

भगवा ब्रिग्रेड पर तत्काल लगे प्रतिबंध

भगवा ब्रिग्रेड पर तत्तकाल लगे प्रतिबंध - JUCS
मध्य प्रदेश भाजपा सरकार स्थिति स्पष्ट करे - JUCS
चिदंबरम और दिगविजय सिंह भगवा ब्रिगेड पर चुप क्यों - JUCS

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS) की मध्य प्रदेश ईकाई ने जबलपुर रेलवे स्टेशन पर ‘भगवा ब्रिगेड का हिंदू योद्धा भर्ती अभियान’ का पोस्टर पाया। यह पोस्टर पूरे मध्य प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर लगा है। इस पोस्टर में हिन्दुत्वादियों द्वारा प्रस्तावित अयोध्या में राम मंदिर के ढ़ंाचे का छाया चित्र लगा है। इस पोस्टर में स्पष्ट रुप से लिखा है ‘म0 प्र0 में 10000 हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की शुरुआत की है हम हिंदू युवाओं से इस मिशन से जुड़ने की अपील करते हैं’ तब ऐसे में JUCS भाजपा शासित सरकार और मुख्य विपक्ष कांग्रेस की मंशा पर सवाल उठाता है।
इस पोस्टर में भगत सिंह, शिवाजी, चंद्रशेखर आजाद, भीम राव अंबेडकर समेत महान और क्रांतिकारी व्यक्तित्वों के छाया चित्र के साथ सावरकर जैसे व्यक्ति जिसने अग्रेंजों से माफी मांगी थी, के भी चित्र का इस्तेमाल करके भगवा ब्रिगेड युवाओं को अपने सांप्रदायिक एजेंडे पर भड़काना चाहता है। हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की बात करने वाले भगवा ब्रिगेड ने इस तथ्य को प्रमाणित कर दिया है कि हिंदू युवाओं को भड़काकर ऐसे संगठन उनका सैन्यकरण कर सांप्रदायिक और आतंकवादी देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त करते हैं।
इस पोस्टर पर भगवा ब्रिगेड के मार्ग दर्शक दामोदर सिंह यादव और संयोजक राजेश विड़कर के छाया चित्र लगे हैं और इनका पता 752 जनता क्वाटर्स, नंदानगर इंदौर और मोबाइल नंम्बर 8120002000, 9977900001 है। ऐसे में JUCS भगवा ब्रिगेड के दोनों नेताओं समेत इस संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों पर देश द्रोह के तहत कार्यवायी करने और दिये हुए पते के मकान को तत्काल सीज करने की मांग करता है। ऐसे में JUCS तत्काल प्रभाव से इस भगवा ब्रिगेड के पोस्टर समेत इस संगठन पर प्रतिबंध लगाते हुए इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग करता है क्यों की मध्य प्रदेश से लगातार हिन्दुत्ववादियों के आतंकवादी घटनाओं में लिप्त होने के मामले पिछले दिनों आए हैं।
ऐसे दौर में जब अयोध्या मसले पर फैसला आने वाला है, तब ऐसे पोस्टरों का मध्य प्रदेश में जारी होना भाजपा सरकार की मंशा को बताता है कि वो हर हाल में देश का अमन-चैन बिगाड़ने पर उतारु है। वो अब अपने लंपट गिरोह के बजरंगियों को सड़क पर उत्पात करने के लिए छोड़नें की तैयारी में है, जैसा की उसनें 92 में यूपी में और 2002 में गुजरात में किया था। ऐसे में हम मांग करते हैं कि भाजपा सरकार इस मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे।
JUCS ने मध्य प्रदेश में मुख्य विपक्ष कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह हिंदू वोट बैंक के खातिर इस गंभीर मसले पर शांत है। क्योंकि सांप्रदायिक तनाव में वह अपना भविष्य खोज रही है।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जो संघ गिरोह के आतंक पर यूपी में आकर राजनीति करते हैं वो इस मसले पर क्यों चुप हैं?
गृह मंत्री पी चिदंबरम जो इस मसले पर काफी बोल रहे हैं उनको JUCS भगवा ब्रिगेड के इस सांप्रदायिक करतूत को बता रहा है। गृह मंत्री इस गंभीर सांप्रदायिक मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें?

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, विजय प्रताप, राजीव यादव, शाह आलम, ऋषि सिंह, अवनीश राय, राघवेंद्र प्रताप सिंह, अरुण उरांव, विवके मिश्रा, देवाशीष प्रसून, अंशु माला सिंह, शालिनी बाजपेई, महेश यादव, संदीप दूबे, तारिक शफीक, नवीन कुमार, प्रबुद्ध गौतम, शिवदास, ओम नागर, हरेराम मिश्रा, मसीहुद्दीन संजरी, राकेश, रवि राव।
संपर्क - 09415254919, 09452800752,09873672153, 09015898445 -- RAJEEV YADAV, Organization Secretary, U.P,

Peoples Union for Civil Liberties (PUCL) 09452800752

Sunday, September 5, 2010

मेरे मन की बात...


वो पहले प्रेमिका थी,

फिर पत्नि बनी, फिर मां...

हर किसी के लिए एक रिश्ते के साथ

हर किसी के लिए एक नाम के साथ
हर किसी के लिए नई जिम्मेदारियों के साथ

और हर किसी के लिए करुणा के साथ।

वो अपनें लिए कभी कुछ ना करे,

करे बस औरों के लिए...

बदली जो कभी वो,

तो बनी बुरी सदा...
सब कुछ वो ही क्यों निभाऐ?
क्यों साथी ना मिले ऐसा जो उसकी समझे
और अपनी भी बतियाऐ...
कौन सुनें उसकी और किसे अपनी व्यथा बताऐ?

गर जगह दे दिल में,

तो जिंदगी में जगह क्यों ना दे पाए?

समय पर ही ध्यान दे लेवे

तो वो काहे बाहर जाए...।

क्यों फिर तिरस्कार का अपमान,

झट बौना कहलाए...

रिश्तों की झूठी शान में,

क्यों बैरी मन हो जाए...।

क्यों ना करे वो अपनें मन की...

क्यों ढ़ोए वो झूठे रिश्तों की खाली गगरी...

Tuesday, August 3, 2010

संजय गांधी की लंपट परम्परा के नए वाहक वी एन राय: जेयूसीएस

संजय गांधी की लंपट परम्परा के नए वाहक वी एन राय: जेयूसीएस
- कुलपति पद से हटाने की मांग, चलेगा हस्ताक्षर अभियान
नई दिल्ली, 2 अगस्त । महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति वी एन राय के स्त्री विरोधी बयान की जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) ने कड़ी निंदा की है। जेयूसीएसनेउन्हें तत्काल कुलपति जैसे जिम्मेदाराना पद से हटाने की भी मांग की है।

संजय गांधी
जेयूसीएस की तरफ से सोमवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि कुलपति जैसे अकादमिक महत्व के पद पर नियुक्त व्यक्ति अगर स्त्रियों के प्रति ऐसा नजरिया रखता हो तो समाज को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। क्योंकि विश्वविद्यालय जैसे संस्थान ही किसी भी देश के भविष्य को तय करते हैं। संगठन ने उन्हें तत्काल उनके पद से हटाने की मांग करते हुए कहा कि वीएन राय का यह बयान बहुत हद तक आपेक्षित है, क्योंकि वह जिस पुलिसिया पृष्टभूमि से आते हैं, उनसे इससे इतर कुछ उम्मीद नहीं की जा सकती। दरअसल, पिछले दिनों जिन तीन विश्वविद्यालयों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया और वर्धा विश्वविद्यालय में पुलिसिया और प्रशासनिक पृष्टभूमि के लोग कुलपति बने हैं, तब से इन विश्वविद्यालयों में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। कहीं सूचना का अधिकार का इस्तेमाल करने पर लगभग डेढ़ सौ छात्रों को निलम्बित कर दिया गया तो कहीं विश्वविद्यालय में संगोष्ठी व सेमिनारों पर भी प्रतिबंध है। वर्धा में तो दलित विरोधी व अपनी जाति के भाई-भतीजों की नियुक्ति से लेकर नकल करके किताबें लिखने वाले अनिल अंकित राय को विभागाध्यक्ष बनाने का मामला पहले ही सामने आ चुका है। अब वहां के कुलपति ने जो स्त्रियों के प्रति अपनी गंदी सोच जाहिर की वह इस सिलसिले का नया धत्तकर्म है।
जेयूसीएस का मानना है कि अपने गृह जनपद में महिला हिंसा जैसे मुद्दों पर एनजीओ चलाने वाले ऐसे कुलपति को अब तक संरक्षण देने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय और यूजीसी भी जिम्मेदार है। जिसने इनके खिलाफ अब तक छात्रों व तमाम जन संगठनों की तरफ से मिली शिकायतों व साक्ष्यों को न सिर्फ नजरअंदाज किया बल्कि इस पूर्व पुलिस अधिकारी को विश्वविद्यालय में डंडा भांजने, गाली-गलौज करने की खुली छूट भी दे रखी है। ऐसा लगता है कि राज्य भविष्य के जिस अपने सैन्य राष्ट् की परियोजना पर काम कर रही है, यह सब उसी के तहत हो रहा है। जिस तरह से छत्तीसगढ़ में राज्य, माओवाद के दमन के नाम पर फिराक गोरखपुरी के पौत्र व तथाकथित साहित्यकार का लबादा ओढ़े विश्वरंजन का इस्तेमाल आदिवासियों के निर्मम दमन के लिए करती है, ठीक उसी तरह कैम्पस में लोकतंत्र की हत्या के लिए इस कथित प्रगतिशील पुलिस वाले का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह दरअसल ‘मिलिट्री रिप्रेशन विद ह्यूमन फेस’ (मानवी चेहरे के साथ सैन्य दमन) का मामला है। इसलिए संगठन का मानना है कि वी एन राय के इस बयान को सिर्फ साहित्यिक दायरे तक सीमित करके देखने की बजाय लोकतंत्र के व्यापक फलक में देखा जाना चाहिए।

रविन्द्र कालिया
राय के स्त्री विरोधी व लंपट विचारों को स्थान देने वाली पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रविन्द्र कालिया वही व्यक्ति हैं जो आधुनिक भारत के लंपटीकरण के प्रवर्तक संजय गांधी का भाषण लिखा करते थे। ऐसा लगता है कि जिस तरह से दिन ब दिन कांग्रेस का खूनी पंजा मजबूत होता जा रहा है, वैसे-वैसे उस दौर की तमाम विकृतियां भी समाज में कालिया व राय जैसे लोगों के माध्यम से सचेत रूप से फैलायी जा रही हैं। आखिर स्त्रियों को ‘छिनाल’ कहने वाले वी एन राय, उसे जगह देने वाले कालिया और तीन दशक पहले जबरन लाखों लोगों का नसबंदी कराने वाले संजय गांधी में क्या अंतर है? संजय युग की घोर दलित, स्त्री व गरीब विरोधी युग की वापसी का प्रयत्न करने वाले रविन्द्र कालिया इससे पहले भी नया ज्ञानोदय के जनवरी 2010 के मीडिया विशेषांक के संपादकीय में कथित विकास की दौड़ में पिछड़ गए और राज्य की जिम्मेदारी से भागने की स्थिति में फुटपाथों पर भीख मांग कर जीवनयापन कर रहे वर्ग को भी गरिया चुके हैं (देखें नया ज्ञानोदय का जनवरी 2010 मीडिया विशेषांक - अब तो संपन्नता का यह उदाहरण है कि भिखारियों के पास भी फोन की सुविधा उपलब्ध है। वे फोन पर खबर रखते हैं कि किस उपासना-स्थल पर दानार्थियों की भीड़ अधिक है।) क्या कालिया का यह बयान तुर्कमान गेट के भिखारियों को अपने महंगी विदेशी गाड़ियों से रौंदने वाले संजय गांधी के काले कारनामों की पुनर्वापसी की वैचारिक पृष्टभूमि तैयार करने जैसी नहीं है?
संगठन ने तमाम प्रगतिशील धारा से जुड़े लेखक, पत्रकार व जन संगठनों से भी अपील की है कि जब तक इस स्त्री विरोधी, दलित विरोधी, जातिवादी, भ्रष्ट् कुलपति को वर्धा विश्वविद्यालय से हटा नहीं दिया जाता, तब तक वर्धा विश्वविद्यालय और उसके दूरस्थ केन्द्रों पर आयोजित कार्यक्रमों का बहिष्कार करें और इन्हें अपने कार्यक्रम में प्रवेश प्रतिबंधित कर दें। जेयूसीएस ने कुलपति वी एन राय को हटाने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान का निर्णय लिया है। इसके तहत संगठन के लोग छात्रों व समाज के प्रति संवेदनशील लोगों से समर्थन की अपील करेंगे।
- द्वारा जारी
अवनीश राय, शाह आलम, विजय प्रताप, ऋषि कुमार सिंह, देवाशीष प्रसून, अरूण उरांव, राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम, चन्द्रिका, दिलीप, लक्ष्मण प्रसाद, उत्पल कान्त अनीस, अजय कुमार सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह, शिवदास, अलका सिंह, अंशुमाला सिंह, श्वेता सिंह, नवीन कुमार, प्रबुद्ध गौतम, अर्चना महतो, विवेक मिश्रा, रवि राव, राकेश, तारिक शफीक, मसिहुद्दीन संजारी, दीपक राव, करूणा, आकाश, नाजिया अन्य साथी
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस), नई दिल्ली इकाई द्वारा जारी. संपर्क – 9873672153, 9910638355, 931312994

Friday, May 7, 2010

जातिगत जनगणना से परेशान विनोद दुआ!

जातिगत जनगणना पर मीडिया जाति के आधार पर जनगणना के विरोध में और समर्थन में उठ रहे स्वरों पर एनडीटीवी इंडिया के ख़ास कार्यक्रम विनोद दुआ लाइव में, विनोद जी का कहना है कि देश के वो नेता जिन्होनें मंडल के दौर(90) से राजनीति में कदम रखाया अपनें राजनीतिक भविष्य की नींव रखी। उन नेताओं को इसलिए इस सेंसेस की आवश्यकता है क्योंकि उन्हें ये पता चल जाए कि उनका वोट बैंक कितना है? विनोद जी नें अपनी ख़बर में ये भी कहा कि 1931 के बाद से जाति आधारित जनगणना नहीं हुई थी और 80 के दशक में कांग्रेस का नारा "जात पर ना पात परमोहर लगेगी हाथ पर" ने जाति को तोड़नें का काम किया। विनोद जी का ये भी कहना है कि वी पी सिंह नें यदि आरक्षण का आधार आर्थिक रखा होता तो शायद देश में जाति के नाम होनें वाले अत्याचार और भेदभाव ना होते और मंडल कमीशन नें देश में जातिगत भेदभाव को कम करने में बाधा का काम किया है। इसका उदाहरण उन्होनें ये कहकर दिया है कि 80 के दशक में अंतरजातीय विवाह और प्रेम-विवाह के मामले ज्यादा आ रहे थे, जिससे ये लगता था कि देश अब जातिगत बंधनों से आगे की सोच की ओर अग्रसर है। परंतु वी.पी.सिंह जैसे नेताओ ने जातिगत भेदभाव बढ़ानें का काम किया है। विनोद जी ने ताज़ा मामले को मिसाल के तौर पर पेश करते हुए ये बताया है कि पत्रकार निरुपमा पाठक की हत्या भी अंतरजातीय विवाह के विरोध में हुई है। जिसमें बिहार का रहनें वाला लड़का कायस्थ था और झारखंड की रहनें निरुपमा ब्राह्मण थी। विनोद जी सीधे तौर पर आरक्षण के विरुद्ध है या आधार पर आरक्षण के विरुद्ध है? विनोद जी ने मंडल का उदाहरण दिया कि "इन नेताओंनें (मुलायम,लालू,पासवान,,करुणानिधि) जातिगत भेदभाव को बरकरार रखने और बढ़ाने का काम किया है"
लेकिन मैं विनोद जी से पूछना चाहता हूं कि क्या देश म जितनें अंतर जातीय विवाह 90 से लेकर आजतक हुए हैं क्या उनकी संख्या 1950 से 90(मंडल) तक से कम है?क्या देश में जितनें जातिगत अत्याचारों के मामले एससी-एसटी कमीशन में है या जो सामनें आए है (संख्या सामनें ना आनें वालो की ज्यादा है) वो सभी 90 के बाद की है? 90 से पहले के दौर में लोगों तक सूचना तो पूरी तरह तक पहुचती नहीं थी और आप कह रहे है कि "देश जातिगत बंधनों से ऊपर उठ रहा था, देश में अंतर जातीय विवाह हो रहे थे "विनोद जी क्या उस समय में (90 से पहले) किसी अख़बार में जाति के आधार पर शादी के विज्ञापन नहीं आते थे? 90 से पहले तक कितनें लोग सवर्ण (जनरल कैटगिरी) के सरकारी नौकरी पर या राजनीति में अच्छे पदों पर थे? और कितनें बाबू जगजीवन राम और कपूरी ठाकुर थे? जिस दौर की आप दुहाई दे रहे है ना, उसी दौर में एक दलित सरकारी कर्मचारी(कांशीराम) सरकारी तंत्र में भेदभाव के चलते अपनी नौकरी छोड़कर दलितों-अल्पसंख्यकों और पिछड़ों की आवाज को डीएस-4 और बामसेफ के माध्यम से चेतना की मशाल लिए आगे बढ़ रहा था। ये वही दौर था जब कांशीराम के भाषणों की कैसेटों को टेपरिकॉडर में सुनानें के लिए माहौल की तलाश में कई बार लोगों नें उच्च जातियों के अत्याचार सहे। ये वही दौर था जब 1994 में डीएस-4 को बसपा का नाम मिला। परंतु आपको लगता है कि एक वी.पी.सिंह आकर सारे देश में जातिगत भेदभाव फैला गया वरना तो देश के सवर्ण वर्ग के लोग दलितो से बेटी-रोटी का रिश्ता रखते थे। ये वी.पी.सिंह और मंडलियों(मंडल के कमीशन के समर्थक नेता) नें राहुल गांधी को देश के दलितों के घर में जाकर खाना खानें को मज़बूर कर दिया। आपका तर्क था कि देश में आरक्षण का आधार यदि आर्थिक होता तो शायद देश इस जातिगत भेदभाव, जिसके कारण हाल ही में युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की हत्या हुई है वो नहीं होती, याकि देश में ऐसे मामले कम देखनें को मिलते। विनोद जी मैं आपको बता दूं कि मैं भी उसी संस्थान का छात्र रहा हूं जहां निरुपमा और प्रियभांशू पड़ते थे। दोनों ही सवर्ण है और दोनों में से कोई भी आरक्षण के दायरे में नहीं आते। जातिगत भेदभाव आरक्षण का लाभ ना लेनें वाली जातियों में भी है और एक जाति में भी है, सवर्णों में भी वरीयता है और ब्राह्मणों में भी है। सरयूपारी-कानिबकुंज का भेद तो आप कोपता ही होगा, नहीं पता तो तो मैं आपको बता देता हूं मुझे भी लखनऊ के ही दो शुक्लाओं (टीवी पत्रकारों) नें बताया था। रावण को मारनें के बाद रामजी द्वारा किए गए रावण के श्राद को खानें के लिए जो ब्राह्मण सरयू नदी पार करके गए थे उन्हें कनिबकुंज ब्राह्मणों नें वापस आनें नहीं दिया और उनसे सारे संबध तोड़ दिए, क्योंकि रावण भी ब्राह्मण था और राम जी पर ब्रह्महत्या का पाप लगा था। आज भी वो लोग आपस में शादी-ब्याह का संबंध करने से बचते हैं। शुक्ला, तिवारी, पांडे, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, उपाध्याय उपनाम के लोग चौरसियाओं और त्यागीओं में शादी-ब्याह नहीं करते। वो तो किसी आरक्षण के दायरे में नहीं आते। शर्मा जी का तो कोई भरोसा ही नहीं करता शुक्ला,तिवारी,पांडे,द्विवेदी,त्रिवेदी,चतुर्वेदी और उपाध्याय लोगों का कहना है कि ये तो पता ही नहीं चलता कि ये (शर्मा जी) कौन से ब्राह्मण है? भूमिहार ब्राह्मण और भूमिहार ठाकुर अन्य ठाकुरों और ब्राह्मणों से शादी करनें के लिए जातिगत आडंबरों से आज तक ऊपर नहीं उठ पाए हैं। ये लोग भी आरक्षण के दायरे में नहीं आते। तो जब मामला सामजिक भेदभाव का हो तो उसे मिटानें या कम करनें के लिए या समाज के उस तबके को ऊपर उठानें के लिए सामजिक आधार होना महत्वपूर्ण ही नहीं आवश्यक है। जातिगत भेदभाव पुश्तों से चली आ रही सामंती सोच की देन है, ना कि बाबासाहब अंबेडकर या मंडल के समर्थक नेताओं की या किसी कमीशन की सिफारिशों की। सोच को बदलनें के लिए कोई आरक्षण बाधा नहीं बनता, बल्कि अपनी आवाज़ और बात कहनें का हक़ देता है। जातिगत जनगणना आवश्यक है, ताकि लोगों को पता चले कि सदियों से शोषण करती आ रही जातियों के पास आज भी कितना सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक वर्चस्व है तथा देश की कितनी बड़ी आबादी कभी साढ़े 22 फिसदी और कभी 27 फिसदी की हिस्सेदारी के लिए लड़ती है।

नवीन कुमार "रणवीर"