Tuesday, August 18, 2009

क्या ट्रेन देती है रोटी?

बिहार की राजधानी पटना के निकट बिहटा में छात्रों नें श्रमजीवी एक्सप्रेस की एसी बोगियों को आग लगा दी। ऐसी खबर मिल रही थी टेलीविजन चैनलों के हवाले से। ज्यादा अपडेट के लिए इंटरनेट पर सर्च किया तो पता चला कि पत्रिका डॉट कॉम का कहना है कि दो ट्रेनों श्रमजीवी एक्सप्रेस और संघमित्रा एक्सप्रेस दोनों की मिलाकर 11 बोगियों को आग के हवाले किया गया है। खैर कितनी बोगियों और ट्रेनों को जलाया गया है ये शायद बाद में पता चलेगा, लेकिन आज(घटना के दिन) अभी तक तो ये ही तथ्य निकल रहे हैं। इस मामले के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि श्रमजीवी एक्सप्रेस के एसी कोच में सफर कर रहे छात्रों से जब आरपीएफ के जवानों ने टिकट मांगा तो छात्रों और आरपीएफ के जवानों के बीच कुछ तनातनी हुई। बात आगे बढ़ी तो छात्रों को शांत करनें के लिए आरपीएफ के जवानों ने उन्हें खदेड़नें के लिए लाठी चार्ज किया, जिस पर छात्रों के विरोध ने बड़ा रूप ले लिया जिसके जवाब में आरपीएफ के जवानों को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें एक छात्र की मौत हो गई। इसके बाद छात्रों नें ट्रेन जलाई।
दोस्तों तो कुछ ऐसे ये मामला प्रथम दृश्ट्या में सामनें आता है। दोस्तों ममता बैनर्जी के रेल मंत्री बननें के बाद ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि बिहार में ट्रेन जलाई गई हो या ट्रेनों को रोका गया हो। मामला चाहे स्टेशन खत्म करनें का हो या ट्रेनों के रूट बदलनें का, बिहार के लोगों को शायद बिहार में बाढ़, सूखा, बेरोजगारी, पलायन, कुपोषण, जातीय शोषण आदि से बड़ी समस्या रेलवे नज़र आती है। ट्रेनों को लेकर जितनें संजीदा हमारे बिहारी नौजवान है, उतनें शायद किसी और राज्य के नहीं? रेल मंत्रालय मिले तो बिहार को मिले? रेल के रूट बिहार से होकर जाए? ये सोच किसने दी? क्या और समस्या नहीं है मेरे बिहार में? क्या बिहार देश के किसी अन्य राज्य को कोई ऐसी सामग्री भेजता हैं जिससे कि राज्य के किसान या नागरिको की गुज़र बसर चलती हो? क्यों हर बार बलवा रेलवे को लेकर ही होता है? कई बड़े अखबारों के संपादकीय में मैनें बिहार से सरोकार रखनें वाले पत्रकारों, साहित्यकारों, जिनकी कर्मभूमि दिल्ली ही रही होगी, उन्हें दिल्ली की बुराई करते हमेशा देखता हूं। दिल्ली के लोगों के बारे यहां कि संस्कृति,लोगों के आचरण, सभी पर खुलकर बात करते हैं। बेबांकी से कहते हैं कि दिल्ली के लोग साले किसी की मदद नहीं करना जानते। कोई अपनें कोलकाता के दौरे का प्रसंग बताता है, तो कोई अपनें डीटीसी बस में किसी व्यक्ति द्वारा केवल सही पता बतानें पर इस बात से गौरवांवित हो जाते हैं कि वो व्यक्ति बिहार का था, "साल कोई दिल्ली का होता तो हमें गलत पता बता देता"। फिर मुझे 23 जुलाई 2009 को पटना में 22 वर्षीय महिला के सरे आम कपड़े उतरावानें की घटना याद आती है तो उससे संबंधित लेखों को खंगालनें की कोशिश करता हूं, ब्लॉग के मुहल्लों और कस्बों की गलियों से भी गुजरता हूं। लेकिन हर जगह बड़े शहरो औऱ वहां की संस्कृति, वहां के लोगों के व्यवहार और बड़े शहरो(विशेष तौर पर दिल्ली) की लड़कियों के चरित्र का तो केवल कपड़े पहननें भर से उल्लेख ही मिल जाता हैं उन्हें। लेकिन, कभी मेरे इन दोस्तों नें इस बारे में सोचा है कि क्या कारण है कि लोकतंत्र के चारों स्तंभों संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता में हमारे इसी राज्य(बिहार) के लोगों की भरपूर है, बल्कि यूं कहें की अन्य राज्यों से ज्यादा भागीदारी है। नेतागिरी की तो बात ही क्या 40 लोकसभा में सीट हैं और 4000 नेता दावेदार और सभी सक्षम। आई.ए.एस बननें वालों और बनानें वालों में भी कोई मुकाबला नहीं है। न्यायपालिका एक स्वत्रंत इकाई है इस पर मैं टिप्पणी नहीं करुंगा, इसमें भी उपस्थिति बतानें की जरूरत नहीं। अब आता है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता, इसके बारे में तो मेरे पत्रकार मित्रों को कुछ बताना मेरे लिए छोटा मुंह और बड़ी बात होगी। क्योंकि मुझे भी किसी राज्य विशेष से जोड़कर देखेंगें। पत्रकारिता में कितनें मित्र बिहारी हैं इसकी यदि पड़ताल की जाए तो शायद बिहार की इसमें भी बाजी मार लेगा। अब सवाल ये उठता हैं कि मरे देश के जिस राज्य की उपस्थिति लोकतंत्र के चारों स्तंभ में अग्रणी हो उसी राज्य से काम की तलाश में होनें वाला पलायन सबसे ज्यादा हो ? क्या मेरे उस राज्य के पास अपनें नागरिकों को खिलानें के लिए दो जून की रोटी भी नहीं? क्या मेरे उस राज्य के तंत्र में केवल सूर्य ग्रहण को देखनें भर के लिए सारी सुविधा देनें का प्रावधान है? या केवल छठ पूजा के लिए नहानें का प्रबंध कर देनेभर के लिए लोग वोट डालते हैं? क्या मेरे उस राज्य की जनता केवल इसलिए वोट डालती है कि कोई नेता इसी राज्य का फिर से रेल मंत्री बनेगा और हमारे लिए अन्य राज्यों के बड़े शहरों के लिए गाड़ी चला देगा? दरअसल शायद बिहार के नेताओं की ये सोच बनी हुई है कि यदि हम राज्य में हुए तो केंद्र को दोष देंगे और यदि केंद्र में हुए तो रेल मंत्रालय मांग कर रेल गाडी चला देंगे। जिससे ये होगा कि कल को यदि हम केंद्र में न रहे तो क्या राज्य के लोगों को अपनें द्वारा चलाई गई गाड़ियों में बिठा कर कह देंगे कि देखों न हमनें जो काम किया है वो कहां कोई कर पाता। यहां कुछ नहीं है, हमसे कुछ नहीं मांगिऐं, केंद्र ने कुछ नहीं दिया है, सूखा है, बाढ़ आ गई है सब बर्बाद हो गया है और मेरे इस राज्य की गरीब जनता फिर बड़े शहरो की और रोजी-रोटी के लिए जाती हैं और किसी राज ठाकरे, बाल ठाकरे या उल्फा का शिकार बनती है। जो राज्य देश के विकास में इतनी अहम भूमिका अदा करता है, जो राज्य ने देश को चलानें के चारों पहियों को सबसे ज्यादा मजबूती प्रदान करता है उसी राज्य को क्यों ये सब कुछ झेलना पड़े ? इस सवाल शायद मेरे पत्रकार, साहित्यकार, विचारक और बुद्धिजीवी मित्र सोचे और इस पर एक बड़ी बहस खड़ी करे और राज्य-केंद्र सरकार से जवाब मांगे? राज्य के नेताओं से जवाब मांगे जो कि अन्य राज्य के लिए केवल ट्रेन भर चलवा कर नागरिकों को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। ताकि वो अपनी दुकानदारी जमा सके और मेरे राज्य के गरीब नागरिक किसी और राज्य में जाकर किसी राज ठाकरे या बाल ठाकरे के हाथों पिटाई खाऐ और बिहार के नेताजी अपनी बाईटों में बिहारियों के हित की बात करते हैं। हमारे पत्रकार मित्र अखबारों के संपादकीय में, न्यूज़ चैनलों की स्पेशल रिपोर्टों में और ब्लागों के कस्बों, मुहल्लों और गलियारों में फिर किसी बड़े शहर के नागरिको का चरित्र -चित्रण करें। मेरे पत्रकार मित्रों को बीस-बीस साल किसी बड़े शहर में काम करते हो जाते हैं, अपनें जीवन के महत्वपूर्ण दिनों को संजों कर वो किसी बड़े शहर में कमाते हैं और अपनें बिहार को केवल छठ मईय्या के बुलावे पर चले जाते हैं और आजकल तो वो भी वही मनानें लग गए हैं। रोटी-रोजगार, तीज-त्यौहार सबही तो कर लेईबे, बढ़िया गाड़ी, मकान सब कुछ दिए रहिन ई शहर, घर अब काहे जाईबै? काहे कलम घिसत हो भाई लोग? गर कुछ करनें का जज़्बा हो तो बड़े शहरों के लोगों का चरित्र-चित्रण करना बंद करों और इन सभी बातों पर गौर करो। सड़के बना देनें भर को विकास मान लेना और बिहार को ब्रांड बननें के रूप में महिमा मंडित करने भर से समस्या हल नहीं होगी। अगर हम ढ़ूंढ़ेंगे तो इतनी समस्या मिलेगी की लोकतंत्र के चारों स्तंभों में बिहार की इतनी बड़ी भागीदारी पर शर्म आ जाएगी।



नवीन कुमार “रणवीर”
Ranvir1singh@gmail.com

Friday, July 24, 2009

पंचायती फरमानों की जरूरत !

झज्जर जिले के ढ़राना गांव के रविंद्र ने कादियान गोत्र की शिल्पा से चार महीनें पहले शादी की थी, शादी के बाद वो शिल्पा को लेकर दिल्ली चला गया था। रविंद्र का गोत्र गहलोत है लेकिन जिस पुश्तैनी गांव में रविंद्र के माता-पिता रहते है उस गांव में कादियान गोत्र के लोगों की संख्या ज्यादा है। है तो दोनों ही जाट समुदाय के, लेकिन विवाद गोत्र को लेकर ये हुआ जब रविंद्र अपनी पत्नी शिल्पा को लेकर गांव गया। बवाल ये हुआ की बारह गांवों की खाब पंचायत जो कि कादियान गोत्र की थी, उसनें फरमान जारी किया की ये लड़की शिल्पा जो कि रविंद्र की पत्नी है वो इसकी पत्नी नहीं हो सकती क्यों कि जिस कादियान गोत्र कि ये लड़की है वो इस गांव का गोत्र है(यानि की बहुसंख्य में लोग कादियान गोत्र के हैं) गांव के गोत्र की लड़की गांव के लड़के से शादी नहीं कर सकती वो उसकी बहन लगेगी। इस गांव(ढराना) के लोग शिल्पा को बहु या भाभी नहीं स्वीकार कर सकते वो उनकी बेटी है और बेटी अपनें ही भाई से नहीं ब्याही जाती।

सवाल है जब शादी होती है तो कुछ गोत्र बचानें होते हैं ये हरियाणा और राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होता है जहां तक मैं जानता हूं, मां का गोत्र खुद का गोत्र और दादी का गोत्र ये तीन गोत्र विशेष तौर बाधा उत्पन्न करते हैं शादी-विवाह में। गांव के गोत्र कभी जब मायनें रखा करते थे जब कभी एक गांव में एक ही परिवार रहा करता था तो इसलिए समय के साथ-साथ वो बढ़ता जाता औऱ उस गांव में उनकी संख्या बढ़ जाती पूरा गांव एक गोत्र का कहलाया जाता। लेकिन आज के परिवेश में रोजी-रोटी के लिए आदमी को भटकना पड़ता है कभी कौन गांव,कभी कौन शहर, सालों बीत जाते हैं एक गांव में रहते औऱ कमाते खाते दो-तीन गोत्र और आ जाते हैं उसी गांव में कमानें के लिए या तो जमीन खरीद लेते है या मज़दूरी करते हैं। फिर कौन गांव से आए थे कौन से नहीं बस यही याद करनें के लिए रोटी खानें को मिली जमीन को खोना थोड़े है। जिंदगी चलती रहती है। अब शादी करने के लिए यदि गांवों के गोत्र को बचानें लगे तो मिल जाएगी शादी के लिए लड़की या लड़का। यहीं कारण है कि शादी के लिए हरियाणा में शादी के लिए लड़की मिलना मुश्किल हो जाती है। एक तो कन्या भ्रूणहत्या के मामले में अव्वल है हरियाणा और नारी के शोषण की खबर तो आपको जब मिलेगी जब वो घर से बाहर निकलेगी आज भी हरियाणा में लड़की को हिंदू धर्म में सबसे ज्यादा तुगलकी फरमानों से गुजराना पड़ता है। मर्द बैठे हुक्का गुडगुडाएंगें और उनकी औरतें(पत्नियां) खेत में जाएंगी काम करेंगी, सुबह 4 बजे से पहले उठ कर पशुओं को सानी करेगी(चारा बनाना) दूध निकालेगी, घर का काम अलग करेंगी। शादी के लिए लड़कियों का मिलना कितना मुश्किल वैसे ही हो जाता है हरियाणा के युवकों के लिए उपर से पंचायत ऐसे फरमान जारी करती है जिससे कि जिस बेचारे कि शादी हुई हो वो भी टूट जाऐ। अब शादी के लिए कितनें गोत्र बचाए जाते हैं ये आपको जरा बता दिया जाऐ...पहला गोत्र लड़के या लड़की का, मां का गोत्र, दादी का गोत्र, बड़ी मां का गोत्र(ताई के गोत्र का लड़का या लड़की ना हो) चाची का गोत्र(सामनें ना हो) गांव का गोत्र ये सभी गोत्र आपको एक जाति में शादी करनें के लिए बचानें है। अब ऐसे में पंचायत किसे बताएगी की इससे शादी करे। औऱ फिर राज्य की भी बात आ जाती है रहने सहन का तरीका, भाई हरियाणा में ही नहीं दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भी जाट समुदाय के लोग रहते उनमें भी हेर-फेर करना होता है। तो कहां करेंगे शादी औऱ कहां न करें? खैर हमारे देश का संविधान तो हमें इजाज़त नहीं देता इन सभी गोत्रों को मिलानें की या धर्म के आधार पर या जाति के आधार पर लेकिन समाज में पंचायत व्यवस्था इंसान अपनी सहुलियत के लिए बनाता है, ताकि उसके अपनें स्वयं के या आसपास के लोगों के बीच वैमनस्य न रहे और समरसता बनी रहे। लेकिन यदि ऐेसे फरमान ही लगती रही पंचायते तो कोई क्यों मानेंगा इन पंचायतों को कोई क्यों गांवों में रहेगा और कोई क्यों कहेगा "मेरा हरियाणा... जहां है दूध-दही का खाणा"।

Wednesday, July 15, 2009

कौमार्य की अग्निपरीक्षा!

मध्य प्रदेश का शहडोल जिला आजकल सुर्खियों में हैं, क्यों है? शायद आप सोच रहे होंगे की विकास पुरुष की संज्ञा दिए जानें वाले शिवराज सिंह चौहान नें कोई नया करतब दिखाया होगा... विकास का नया मॉडल पेश किया होगा... आपको बताते हैं कि इस विकास पुरुष ने किस प्रकार एक तुगलकी फरमान से जनकल्याण की योजना बनाईं है। मध्य प्रदेश सरकार के कन्यादान योजना के तहत शहडोल जिले में दलित और आदिवासी महिलाओं के सामूहिक विवाह का आयोजन कराया गया। जिसमें कि सरकार नें 152 लड़कियों की शादी करवानें की व्यव्स्था की। सरकार इस योजना के तहत प्रत्येक लड़की को 5 हज़ार रु और घरेलू सामान देती है। "कन्यादान योजना" यानि सरकार (गरीबों) दलितों और आदिवासियों की बेटियों का कन्यादान करेगी जिसे कि हम यूं भी समझ सकते हैं कि सरकार के मुखिया तो राज्य के मुख्यमंत्री माननीय विकास पुरुष, हिंदू हृदय सम्राट, शिवराज सिंह चौहान हैं। अब ये राज्य की अपनीं बेटियों का कन्यादान किस प्रकार करते हैं आपको बताते हैं... इस योजना को सरकार कल्याणकारी योजना करार देती है और इसके तहत सामाजिक सभ्याचार के नए तानें-बानें बुनती हैं। एक संदेश इस रूप में भी देती हैं कि हम दलितों और आदिवासियों के कितना हित साधते हैं।
लेकिन सच्चाई जान कर आप स्वंय फैसला करेंगे की ये कौन से सभ्य समाज का नियम हैं जहां पर शादी से पहले किसी लड़की को अपनें गर्भवती न होनें के सबूत देनें होते हैं? जी हां दोस्तों ये बात बिल्कुल सही है कि इस प्रकार(सरकारी खज़ानें से) यदि किसी गरीब दलित या आदिवासी लड़की को शादी करवानीं है तो उसे अपनी मेडिकल जांच करवानी होती है, कि कहीं वो लड़की गर्भवती तो नहीं है? ये सवाल करती है मध्य प्रदेश सरकार और वो भी स्वंय के प्रमाण के बिना माननें को तैयार नहीं होती की लड़की झूठ तो नहीं बोल रही। आप सोच के देखिए की क्या भारत में होनें वाले सारे विवाह क्या इसी कसौटी पर होते हैं ? और यदि ऐसा होता है तो आपको और इस तथाकथित सभ्य समाज को और ऐसी सरकार को अधिकार है इसे सही साबित करनें का! इस मुद्दे पर जब विकास पुरुष शिवराज सिंह चौहान से पूछा गया तो सिंह साहब कहते हैं कि "प्रेगनेंसी टेस्ट नहीं करवाया गया है कौमार्य परीक्षण(वर्जीनिटी टेस्ट) करवाया गया है"। जी साहब वाह! आप तो महान हैं! मात्र 5000 हजार रूपयें में आपकी सरकार को ये अधिकार मिल जाता है कि आप किसी दलित औऱ आदिवासी लड़की से ये जान सकते हैं कि आपकी महावारी(पीरियड्स) कब हुई थी? आपनें कभी सेक्स तो नहीं किया ? यही ना... और क्या होता है कौमार्य परीक्षण ? क्या पता लगाना चाहती थी आपकी सरकार? मात्र पांच हज़ार रुपयों के लिए आप किसी भी लड़की को मज़बूर करते हैं कि वो अब आपसे अपनें चरित्र का प्रमाण पत्र प्राप्त करेंगी? सवाल बहुत निकलकर आते हैं...म.प्र सरकार की ये योजना यदि सवर्ण वर्ग की गरीब लड़कियों के लिए होती तो क्या सरकार ऐसा कोई नियम काय़दा बनाती? यदि बनाती तो क्या हमारे समाज के तमाम धर्मावलंबी (ख़ासकर आपकी पार्टी के लोग) इसे उतना ही वाज़िब ठहराते जितना की आज ठहरा रहे हैं? या आपकी विचारधारा में ये महिला की अग्निपरीक्षा की प्रासंगिकता है? आपका ये तुर्रा है कि ये जो महिलाएं होती है ऐसे विवाह में 5000 रु. के लालच में शादीशुदा होनें के बावजूद इस योजना का लाभ उठाती हैं, इसीलिए हमारे जांच करनें पर हमें 14 लड़कियां प्रेगनेंट पाई गईं, और बात भी तय है कि उन उन गरीब लड़कियों को ऐजेंटों द्वारा उनकी गरीबी का लाभ उठाकर ऐसे विवाहों में भेजा जाता हैं, उसके लिए आपकी सरकार कुछ नहीं करेगी। सारा ज़ोर आपका जो है वो महिलाओं पर ही चलता है। शिवराज जी आप साइकिल चलाकर मीडिया को बताते हैं कि मैं पैट्रोल की बचत करता हूं औऱ साईकिल से ऑफिस जाता हूं, लेकिन अब आपकी ये नई योजना है कि सरकारी लाभ यदि किसी को मिले तो वो भी कौमार्य परीक्षण के बाद, आप केवल लड़कियों का ही क्यों कौमार्य परीक्षण(वर्जीनिटी टेस्ट) करवातें हैं? लड़को का भी तो करवाइयें? क्या पता कोई लड़का किसी और महिला का पति हो? या पहले से किसी बच्चे का बाप हो? क्या पता की वो पहले से भी कभी-न-कभी सेक्स करता आ रहा हो? क्य़ा पता कि आपका वो "मर्द" बिना शादी के ही बाप बना हुआ हो? क्या सबूत होता है आपके पास उस "मर्द" कौमार्य का? मेडिकल साइंस की ऐसी कौन सी तकनीक से पता लगाएंगे आपके डॉक्टर कि इस युवक/नौजवान/आदमी/पुरुष/मर्द ने आज तक सेक्स नहीं किया? किसी के बच्चे का बाप नहीं है? किसी औरत़ का पति नहीं है? या कि ये कि वो बाप बननें वाला है या नहीं?
गर्भ में यदि बच्चा हो तो अल्ट्रासाउंड के जरिये लिंग की जांच करवाना गैर कानूनी है लेकिन शादी से पहले लड़कियों का कौमार्य परीक्षण(वर्जीनिटी टेस्ट) करवाना शायद ये कानून बन गया हो मध्य प्रदेश में! और यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं की हर लड़की को शादी से पहेल किसी एमबीबीएस, गायनाकॉलोजिस्ट से चरित्र प्रमाण-पत्र बनावाना होगा। खैर राम राज्य के लिए शायद ये प्रसंग भी आवश्यक है बिना इसके(अग्निपरीक्षा) आपके राम राज्य़ की अवधारणा वास्तविकता में कैसे परिवर्तित होगी भला...!

Friday, July 3, 2009

धारा-377...ऐसा देस है मेरा!

2 जुलाई 2009 दिल्ली हाईकोर्ट नें समलैंगिक संबंधों को लेकर सालों से चले आ रहे बवाल पर कानूनी मोहर लगाते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट नें समलैंगिक संबंधों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 से बाहर माना है। कोर्ट का कहना हैं कि समलैंगिकों पर धारा 377 के तहत कार्यवाही करना भारत के प्रत्येक नागरिक को संविधान की धारा 14, 15 और 21 द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन है। अब सवाल उठता है की आईपीसी की धारा 377 क्या है, इस धारा के तहत किसी भी व्यक्ति( स्त्री या पुरुष) के साथ अप्राकृतिक यौन संबध बनानें पर या किसी जानवर के साथ यौन संबंध बनानें पर उम्र कैद या 10 साल की सजा व जुर्मानें का प्रावधान है। जिससे कि बहुतेरे समलैंगिक जोड़ो (विशेषकर पुरुषों) को प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। गैरकानूनी होनें की वजह से इन जोड़ों के साथ रह कर जीवन-यापन करनें को समाज और प्रशासन गलत मानता रहा है। हालांकि अब भी यह कहना मुश्किल होगा कि प्यार के इस रूप को समाज स्वीकार करता है या नहीं लेकिन कानून तो अब प्यार और विश्वास के इस अनूठे संगम में अवरोध नहीं बन सकता। क्योंकि कानून के मुताबिक इस धारा(377) के तहत ही समलैंगिकों की इस अभिव्यक्ति पर विराम लगा था। कुछ थे जो खुलकर अपनें समलैंगिक होनें की बात को स्वीकार करते लेकिन कानूनी दांव पेंच के आगे वे भी हाथ उठा लेते। समलैंगिकों के अधिकारों के लिए समय-समय पर कई गैर सरकारी संगठन आगे आए और काफी हद उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी गई। और आज ऐसे ही एक गैर सरकारी संगठन "नाज़ फाउंडेशन" की मुहिम रगं लाई औऱ कोर्ट को ये मानना पड़ा कि 1860 में बनीं धारा 377 को वास्तविक परिवेश में केवल नाबालिग के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनानें और जानवरों के साथ यौन संबध बनानें के लिए ही उचित समझा जाए, एक लिंग के दो व्यक्ति जो कि बालिग हो अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं। अब सवाल आता है विरोध औऱ मान्यता का? विरोध तो कल भी हुआ था औऱ आगे भी होगा, क्योकिं कानूनी मान्यता के आधार पर भी भारत में ऐसे संगठनों की कमी नहीं है जो खुद को भारतीय संस्कृति के पैरोकार मानते हैं औऱ खुद आज तक पता नहीं कितनी बार कानून की धज्जियां उड़ा चुके हैं। ऐसे संगठन है जो यह जानते हैं कि देश का संविधान हमें धर्म, लिगं, क्षेत्र, जाति के नाम पर अलग नहीं करता हैं, जो जनाते है कि देश धर्मनिरपेक्ष है लेकिन फिर भी किसी मस्जिद-गिरजाघर को तोड़ देते हैं, जो ट्रेन जला देते हैं, जो अपनें ही देश में रोटी कमानें-खानें के लिए आए मज़दूरों को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटते है, जो सदियों से सामंतवाद और जातिवाद की चोट से ग्रस्त लोगों के घरों में आग लगा कर उनसे जीनें के अधिकार को भी छीन लेना चाहते हैं, जो किसी महिला को मजबूर कर देते हैं कि वह अपनें हक़ के लिए बंदूक उठा ले और डाकू फूलन देवी बन जाए...ये तो बानगी भी नहीं है दोस्तों...ऐसा देस है मेरा!
अब देखते हैं कि समाज के इस नए पहलू को किन-किन प्रतिक्रियाओं से गुजराना होगा, क्या ऐसे समाज से आप आशा करते हैं कि वो इस सब पर खुलकर सामनें आएगा और इसे स्वीकार करेगा, कानून आपनी जगह सही हो सकता है। नैतिकता के माएनें लेकिन खुद ही सीखनें होते हैं। मैनें आपको बता दिया है कि किस प्रकार कानून का अमल किया गया है इस देश में। न्याय प्रक्रिया तक बात को पहुचानें के लिए भी तो आवाज चाहिए औऱ आवाज के माध्यम किसके पास है और वे किस सोच से इत्तीफ़ाक़ रखते हैं ये भी मायनें रखता है। आज देश में हमारे पत्रकारों की सोच सभी विषयों पर उदारवादी दिखती है कुछ संघी पत्रकारों को छोड़कर, लेकिन क्या इस विषय पर कोई पत्रकार सही और गलत परिभाषित करेगा? क्या कोई पत्रकार समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिलानें की मांग को सही ठहाराऐगा ? मैनें देखा कि ब्लॉग पर भी लोग इस विषय पर कुछ लिखनें से डर रहे है, और जो लिख रहे है वो केवल कोर्ट के फैसले की पुष्टि भर के लिए अपनी उदारवादी सोच की उपस्थिति भर दर्शा रहे हैं। शायद उन्हें भी डर है कि कहीं जब हम कोई धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो लोग समझ लेते हैं कि हम कम्यूनिस्ट या कांग्रेसी है उसी प्रकार यदि हम इस विषय पर लिखे तो शायद हमें भी लोग इसी श्रेणी में ले आएंगे। खैर ये तो सोच है अपनी-अपनी लेकिन सोच संवैधानिक हो ये संभव नहीं? एक सोच का वर्णन तो मैनें इस लेख में कर ही दिया है । अब देखना है कि यही समाज इस नए नियम को किस प्रकार लेता है, देखना दिलचस्प होगा, वैसे उम्मीद तो वही है (विरोध) जो कि पहले बताया गया है । लेकिन अब मामला ये देखना पड़ेगा की यहां पर कोई क्षेत्र, जाति, धर्म, बोली-भाषा, अमीरी-गरीबी का दंश जो भारतीय समाज में प्यार के आड़े आता रहा है, शायद वो केवल ये माननें भर से कम हो जाए कि लिंग तो समान नहीं है ना, बाकि सारी विषमताएं एक मान ली जाएंगी शायद...।

Tuesday, June 16, 2009

ठगी... लक्ष्य एक पर नुस्खें अनेक !

अशोक जाडेजा, सुभाष अग्रवाल और नवीन शर्मा ये नाम आपनें पिछले कुछ दिनों में बहुत सुनें होंगे। हर टीवी चैनल हर अखबार में आपको ठगों की इस त्रिमूर्ति की करतूतों का पता चल रहा होगा। इस लेख के जरिए हम ठगों के अनेक रूपों से भी आपको अवगत करवाएंगे।कोई खुद को माता का अवतार बता कर लोगों से रु ठगता, कोई फर्जी व्यापार के नाम पर। लक्ष्य एक पर नुस्खें अनेक क्योंकि इन सभी का उद्देश्य तो ठगी ही है, और किस प्रकार ये बड़ी दिलचस्प बात है.... जिसकी जितनी पहुंच थी उसनें उस हिसाब से जनता को बेवकूफ बनाया। अशोक जाडेजा ने देशभर में फैले अपने समाज(सांसी समाज) के लोगों को बेवकूफ बनाया और 2000करोड़ रुपये की ठगी को अंजाम दिया।
सांसी समाज जो कि अनुसूचित जाति वर्ग में सबसे निचले पायदान पर आनें वाली जातियों में से एक है, या यूं कहें कि ये वो जाति है जो कि आज तक अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ पाई है। शिक्षा के कम स्तर के चलते औऱ गैरकानूनी कृत्य में ज्यादा लिप्त होनें के कारण सान्सीन्यों को सभ्य समाज में हमेशा घृणा की नजरों से देखा। आज के समय में भी सांसी समाज के लोगो का मुख्य काम गैरकानूनी शराब बेचना, स्मैक, गांजा बेचना इत्यादि रहा है। जो सांसी शिक्षित हो गए वो इस पेशे दूर हो गए और छोटे-मोटे कल-कारखानों या कहीं चपरासी का काम करके ईमानदारी से अपनी गुजर-बसर करते हैं। खैर इसमें कोई दो राय नहीं की सांसी समाज के लोग शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होते हुए भी, लेकिन आर्थिक रूप से अन्य दलित जातियों की अपेक्षा इनकी स्थिति थोड़ी बेहतर होती है। लेकिन अशिक्षा और अंधविश्वास की इस कमजोरी को ही इन्हीं के सामाज के पेशे से बीएएमएस डॉक्टर अशोक जाड़ेजा नें स्वार्थ सिद्धि का साधन बनाया। अशोक जाडे़जा ने खुद को सांसियों की आराध्य देवी सिकोत्तरी देवी का अवतार बताया और कहा कि समाज की गरीबी दूर करनें आया हूं। जाड़ेजा ने लोगों से 200रु लिए और दुगुनें करके दिखाए फिर खुद की सीडी़ बनवाई, माता का अवतार बताया। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कई राज्यों के अपनें समाज के लोगों को बेवकूफ बनाया और 2000करोड़ के फर्जीवाड़े को अंजाम दिया। पकड़े जानें पर नाम दिया "एमएलएम" का।
आगे बात बात करते है दिल्ली के ठग सुभाष अग्रवाल की, खैर इन्होनें किसी समाज विशेष को नहीं ठगा बल्कि सभ्य समाज के व्हाइट कॉलर लोगों को लगाया है करोड़ो का चूना। इन साहब ने तीन फर्जी चिट फंड की कंपनी खोली और लोगों को लाखों के बदल करोड़ों का ख्वाब दिखाया। पढ़े-लिखे समझदार लोगों को कैसे बेवकूफ बनाएं ये इन महाशय से सीखें। फर्जी स्कीमों में लोगों का रुपया लगवा कर उन्हें लगा गया चपत।औऱ फिर वो पैसा सट्टा बाजार और ऑनलाइन ट्रेडिंग में लगा दिया ऐसा कहना है अग्रवाल साहब का। पर अपनें पर लगे इस काम को वो भी एमएलएम का नाम देते हैं।
आगे बात करते हैं नवीन शर्मा की ये शख्स भी इनका ठग्गू भाई है , अशोक जा़डेजा ने अशिक्षितों को धर्म के नाम पर लोगों को ठगा, सुभाष अग्रवाल नें शहरी लोगों को चिट-फंड के नाम धोखाधड़ी की,
नवीन शर्मा नें भी चिट फंड के नाम पर ही लोगों को ठगा और इनके शिकारों में प्रमुख नाम मुंबई हमलों में शहीद हुए मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घरवालें भी हैं। नवीन शर्मा नें मनीमंत्र नाम की चिट-फंड और एमएलएम की दो कंपनियां खोली और लगा दिया लोगों को करोड़ो का चूना। मेजर उन्नीकृष्णन के घरवालों ने भी नवीन शर्मा की फर्जी कंपनी में लगाए थे 25हजार रु। ये साहब भी पैसा डबल कर चूना लगानें का धंधा करते थे, इनके शिकार भी सुभाष अग्रवाल की तरह व्हाइट कॉलर औऱ समाज में उच्च वर्ग (सामाजिक रूप से) लोग अधिक हुए। पकड़े जानें पर धंधा एमएमएम का बताया इन साहब नें भी। दिल्ली के मशहूर बीके ज्वैलर्स ने भी लोगों को ठगनें का काम आपनी साख के चलते आसानी से किया। इन्होनें लोगों को साढ़े 13हजार रु, दो साल में 26लाख, 30लगानें पर 1करोड़ मिलनें की स्कीम का झांसा देकर लोगों के 500 करोड़ रु की चपत लगा गए। 1975 से दिल्ली के पंजाबी बाहुल पॉश इलाके तिलक नगर में इनका बड़ा शो-रूम है। शो-रूम के मालिक बीके मलिक और चेतन मलिक साहब फरार है। इन्होनें अपनें शिकार बनाया दिल्ली के ही पंजाबी और सिख समुदाय के लोगों को, अब वो लोग पढ़े-लिेखे न हो यह कहना तो मुश्किल सा लगता है।
इनके द्वारा की इस ठगी का एक नाम दिया गया एमएलएम (मल्टी लेवल मार्किटिंग) इस काम में जो लोग लिप्त होतें हैं वो या तो बीमा ऐजेंट होते हैं, या किसी सत्संग या डेरे के अनुयायी मुख्यत:, टीचर(टयूशन पढ़ानें वाला) छोटे मोटे डॉक्टर, मुह्ल्ले या कोई मशहूर आदमी। या साफ शब्दों में हम ये कहे कि वो व्यक्ति जिसका सरोकार रोज-मर्रा में लोगों के एक समूह से हो, जिसका काम पब्लिक डीलिंग का हो। सत्संग में भी लोगों को पब्लिक डीलिंग का खूब मौका मिलता है, और टीचरों, डॉक्टरों पर लोग जल्दी विश्वास कर लेते हैं। अब ये एमएलएम कैसे जनता को चूना लगाती है ये बताते हैं। जो लोग पहले
से इस व्यापार में होते हैं वो बेचारे अपनें फसें हुए पैसे निकालनें के लिए लोगों को इस काम में फसांते। दरअसल आपको सबसे पहले सिर्फ दो सौ रुपये या जो भी उस कंपनी द्वारा निर्धारित न्यूनतम राशि बताई जाती है उसे लगाया जाता हैं। उसके बाद आपको अपनें जैसे ही 5 या 10सदस्य बनानें होते हैं और उसके बाद उसे अपनें द्वारा लगाई गई राशि के बदले चैक मिलता है शुरूआत में तो सही में आपको आपकी रकम बड़ी हई मिलती है लेकिन इसके बाद आप की रकम का क्या हाल होता हैं ये इन सभी केसों में आपनें देख लिया होगा। औऱ एक बात आज कल कुछ एमएलएम की कंपनियां अपनें उत्पाद भी बेचती है और आपको 5हजार रू में सौंदर्य प्रसाधन के सामान भी दे देंगें, या जो भी शुरुआती रकम हो उसका आपको सामान दे देंगी और ये कहेगी की आप इसे बेचें या इस्तेमाल करें आपकी मर्जी, लेकिन अगर आप बेचकर आ मेंबर बनाते हैं तो आपका पैसा दुगना और ये सामान भी आपका जितनें मैम्बर बनेंगे उतना ज्यादा कमीशन। और लोग पागलों की तरह अपनें रिश्तेदारों, ऑफिसों मेल-जोल के दोस्तों में घंटों लोगों को अपनी नई-नई स्कीमों से पकाते हैं। और झांसा देते हैं करोड़ों कमानें का, अगर आप अपनें किसी दोस्त को कहेंगे कि भाई ये काम (चेन सिस्टम वाला) बड़ा बेकार है। इसमें बहुत साले ठगी होते हैं। तो भाई आपका सगा मित्र अपसे किसी भी हद तक बहस में पड़ जाएगा और देनें लगेगा ऐसा ज्ञान देनें की आपकी तो सारी पढ़ाई लिखाई धरी रह जाएगी। ऐसे बिजनेस में फंसे लोग आपसे यदि पहली बार मिलेंगे तो आपसे सीधे ये सावाल करेंगे की आप क्या करते हैं? कितना कमाते हैं? और दस साल बाद आप खुद को कहां देखते हैं? कितना कमा लेंगे आप दस साल में? आप समझ नहीं पाएगें की आपके सामनें एक साल में इतना औऱ पांच साल में इतना और साल में इतना की आपको लगेगा की भाई आपसे बड़ा ज्ञानी तो कोई दुनिया में था ही नहीं। और यदि आपनें उनके प्लान के साथ अपनी असहमति जता दी तो आपको वो भाई साहब दिल्ली के शाह ऑडिटोरियम, फिक्की ऑडिटोरियम, और न जानें कौन-कौन सी जगहों पर सेमिनार के लिए ले जाते हैं। जहां पर आपको ऐसे-ऐसे उदाहरण पेश करके बताएंगे की आप कुछ नहीं कर पाएंगे। सन 1996की बात है मुझे मेरे किसी दोस्त नें एक हेल्थ स्पलिमेंट दिया और कहां कि तुम या तो इसे खुद पी लेना या किसी को बेच दो, लेकिन मैंबर बना कर। मैं उसके इस झांसे में नहीं पडा़, फिर 1998में मेरे मुह्ल्ले में लोगों को एमवे के सदस्य बनानें की मुहीम चली, लोग सदस्य बनें सोफा सेट बनानें वाला 5सौ रुपये के फेस वॉश(एमवे का अपना उत्पाद) से मुंह धो रहा था, क्या करे फंस गया था शुरुआत में मांगे थे 750रुपये और बदले में सामान दे दिया और बेचारा अपनें रिश्तेदारों को लेकर जाता हर रविवार को सेमिनार में, जहां आपको ख्वाब दिखाए जाते। हुआ क्या कुछ भी नहीं कंपनी आज टीवी में विज्ञापन देती है ताकि लोगों को फर्जी न लगे, सामान कोई नहीं खरीदता बनाओ सदस्य और बनाओ पैसा। ऐसी ही एक औऱ कंपनी जापान लाईफ जो गद्दा बेचती थी 1लाख 50हजार रुपये का ," आपकी कमर में दर्द नहीं होगा" आप ऐसे पांच गद्दे बेंचे या सदस्य बनवाएं अपनें पैसे दुगनें कर लें। आजकल युवाओं को लुभानें के लिए भी कई एमएलएम कंपनियां बाजार में है जिनमें से एक है ईबीज़ ये कंपनी युवाओं को कम्पयूटर शिक्षा देनें का झांसा देती हैं और अपना एमएलएम का बिजनेस बड़े धड़ल्ले से बाजार में कर रही है।छात्रों से पहले 7500रुपये लिए जाते हैं और फिर उन्हें काली पैंट और सफेद कमीज पहनकर एक डायरी हात में पकड़ाकर भेज दिया जाता है सपनों की उस काल्पनिक दुनिया में जहां वो खुद को आनेंवाला धीरूभाई अंबानी समझ बैठते हैं।
ऐसी कुछ कंपनियों के फर्जीवाडें का खुलासा होनें से सभी में एक बात सामनें आती है आदमी का शिक्षित होना ही काफी नहीं हैं, किसी आदमी का ऊंची जाति का या तथाकथित सभ्य समाज से होना ही उसके चारित्रिक गुणों का पैमाना नहीं हैं। आपको जितनें लोगों का उदाहरण देकर यह बतानें की कोशिश की गई है कि ऊंची जाति, पढ़ा-लिखा, अच्छा रहन-सहन, पॉश कॉलोनी का निवासी और अच्छी अंग्रेजी भाषी, साऊथ दिल्ली के कल्चर का होते हुए भी कोई कोई ठग सकता है ।
सावधान रहे!

Sunday, June 14, 2009

"जाति भंवर में फंसा लोकतंत्र" मोहल्ला पर बहस

अविनाश भाई के मोहल्ले में आए दिन बहस चलती रहती है, अभी कल ही धर्म संबंधित पर्दा प्रथा पर बहस हुई थी, और आज "जाति के भंवर में फंसा लोकतंत्र" पर। खैर ये मेरे मित्र प्रमोद का मानना है तो मैनें भी कुछ कहा...आप भी जानें जरा क्या कह रहे थे भाईजी और क्या कहना चा रहे हैं हम ....

प्रमोद भाई, आपकी पोस्ट पढ़ी मुझे लगा कि आपके विचारों में विरोंधाभास है, आप एक तरफ कह रहे हैं कि जाति के आधार पर वोट पढ़ता है,नेता अपनी जाति तक सीमित रहते हैं और दूसरी तरफ ये कि देश में दबंग जातियों नें नीची जातियों को वोट डालनें नहीं दिया जाता था। आपको ये नहीं लगता कि ये जो नीची जाति को वोट न डालनें की बात नें ही नीची जातियों में प्रतिनिधत्व की भावना को जागृत किया,क्या ये प्रतिक्रिया नहीं है समाज के वंचित समुदाय की कि वो अपनें प्रतिनिधत्व को पूरा समर्थन देते हैं। मैं जानता हूं की वास्तविक परिदृश्य में कई जगह ये बात पूर्ण रूप से साबित नहीं होती की सभी प्रतिनिधि अपनी जाति के लोगों के भले के लिए अपनें भले को दांव पर लगा देते हैं, परंतु ये बात आपकी बात से ही निकल कर आती है कि नेता लोग आपनी जाति तक ही सीमित रहते हैं? मरे भाई आपनें राजस्थान के जिस क्षेत्र की बात कि मेरे पूर्वज कभी उसी क्षेत्र से दिल्ली मजदूरी करनें के लिए दिल्ली आए थे, मैं आज भी अपनें गांव जाता हूं और जातिवाद का जितना गहरा दंश आज भी राजस्थान के पढ़े-लिखे और अनपढ़ में विद्यमान है उससे आप भली-भांति वाकिफ होंगे, वरना क्या कारण रहा होगा कि यू.पी के राजेश पायलेट को राजस्थान के गुर्जर बाहुल इलाके से टिकट दिया गया और जब तक वो सीट रिजर्व नहीं हुई थी वो उनकी खानदानी बपौती बनीं हुई थी और क्या भला किया उन्होनें अपनें समाज का ये आपनं गुर्जर आंदोलन में देख ही लिया होगा।एक कर्नल साहब आए पढ़े-लिेखे थे गुर्जर समाज में औऱ मूल रूप से राजस्थान के भी थे, पर समाजिक आंदोलन को राजनीतिक रूप दे कर अपनें लिए भी एक सीट लेनें की पूरी कोशिश की थी लेकिन समाज ने उनका साथ नहीं दिया और हार गए आप जिस 21वीं सदी की बात कर रहे हो वहां आज भी जातिय शोषण कितना होता है इसे आप भली-भांति परिचत होंगे। आज लोगों को जातिय दलों और नेताओं से चिड़ होनें लगी है हमारे तथाकिथित उदारवादी पत्रकार इसे बुरा समझते हैं, पर क्या आप उस समाज को या उस राजनीतिक सोच को सही ठहराएंगे जिसमें कि आप केवल कांग्रेस की हां में हां मिला कर उसके राजनीतिक पिछलग्गू बनकर अपनें वोट की एफ.डी करवाते रहें?ये कांशीराम-लालू-मुलायम-पासवान-मायावती सभी लोग उस टीस और उस शोषण की उपज हैं जिसे की आप एक पार्टी के नीचें खड़े हो कर हां में हां मिलाना और सामजिक समरसता का नाम देंगे।क्योंकि आरक्षण न होता तो शायद कोई दलित या आदिवासी चुनाव लड़ना तो दूर मेरे मित्र वोट होता क्या है ये नहीं जानते थे। आज जब लोगों में अपनें प्रितिनिधित्व की सोच जागी हैं तो राजनीतिक दलों नें भी माना कि इधर इनकी आवाज को दबा कर नहीं रखा जा सकता। आप कल्पना करें कि जब ये छोटे राजनीतिक दल नहीं थे जिनका मैनें जिक्र किया तो समाज में समरसता थी? कोई किसी पर शोषण नहीं करता था ? सभी लोग बराबर थे? आज लोग जानते हैं कि कोई उनकी बात सुननें वाला है औऱ यदि नहीं सुनेगा तो बता भी सकते हैं उस नेता को। ये जो जातीय महत्ता की बात आपनें कहीं ना वो जब नहीं होती जब जगजीवन राम जैसे दलित नेता अपना मंत्रालय भर तक सीमित रहते है..ये जब होती है जब एक बड़ी आवाज डीएस फोर से उठकर मंडल तक जा कर उ.प्र और बिहार जैसे राज्यों में अपनी ताकत को दर्शाती है... आगे फिर कभी...

Saturday, June 13, 2009

मोहल्ला पर बहस

मोहल्ला पर बहस में हम भी कूद पड़े, सवाल था कि भाई, छोटे वस्त्र: दुर्व्यवहार करने का न्यौता ! और गंभीर बात ये कि इस पोस्ट के लिखक मुस्लिम थे, और उन्होनें इस्लाम में परदा प्रथा के बारे में बताई गई बातों को कुरान के उदाहरणों से स्पष्ट किया। हालांकि मैं भी परदा प्रथा के खिलाफ हूं, पर न जानें क्यों जो प्रतिक्रिया मिली न वो बेहद बुरी थी, टिप्पणियों के कॉलम में मानों सारे लोग सोचे बैठे थे कि आज अपना सारा गुस्सा उतार देंगे इस मुस्लिम समाज पर। हर कोई नफरत की बंदूक भरे बैठा था, और सीधा ब्लॉग का ही बहिष्कार करनें को आमादा है....

अविनाश भाई, मुझे नहीं पता कि जिन लोगों ने प्रतिक्रिया दी है वो पत्रकार हैं या लेखक, वो संघी है या कम्यूनिस्ट य़ा फिर चौराहे की रौनक, जिन्हें कि चौक पर खड़े हो कर ज्ञान बघारनें में मजा आता है और किसी अन्य की बात सुननें पर बवाल करनें में।
हो सकता है कि आप लेखक के लेख से सहमत न हो पर, उसका तार्किक विररण किया जा सकता है, पर जिस प्रकार के कमेंट मिल रहे हैं, वो सही नहीं लग रहा, आप सीधा ये कह रहे हैं कि 'इन सालों के साथ जो गुजरात में हुआ वो ठीक है"। भाईयों लेखक अपनी बात को रख रहा हैं, वो बात किसी धर्म विशेष से जुड़ी है, जिसका जिक्र भी किया उन्होनें उस धार्मिक ग्रंथ को कोड करके...। मेरे मित्रों हम यहां केवल बोलनें या ज्ञान बघारनें के लिए नहीं आते हैं, हमें सुनना भी होगा,समझना भी होगा। मैं फेवर नहीं करता बुर्खा प्रथा का, पर हिंदु धर्म में भी तो परदा प्रथा आज तक चली आ रही है। आप और हम केवल एक धर्म विशेष को घृणा की नजरों से आंकना जब जक नहीं छोड़ेगे तब तक कोई अपनी पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर हमारे साथ मिलकर चलनें को नहीं तैयार होता। अगर कोई हिंदू लेखक इसी विषय को उठाता तो शायद इतनी तो कड़ी प्रतिक्रिया नहीं मिलती की ब्लॉग का ही बहिष्कार करें। अरे आप भी कहें हम भी कहें औरों को भी कहनें दे, फिर एक स्वस्थ बहस छिड़े कुछ आप सीखें कुछ हम सीखे...माहौल खराब न हो, वरना आपमें और चौक पर हलवाई की दुकान पर खड़े ज्ञान बघारते लोगों में फर्क कर पाना मुशकिल हो जाएगा, वो ज्यादा खतारनाक होगा।