Friday, April 3, 2009

'मंडलियों' का नया मंडल

लालू-मुलायम-पासवान का गठबंधन भारतीय राजनीति के लिए क्या संदेश देगा ये तो हमें बाद में पता चलेगा, लेकिन ऐसी क्या जरुरत पड़ी कि आपातकाल के समय के ये तीन समाजवादी, मंडल के बाद आज एक मंच पर साथ दिख रहे हैं? राजनीतिक जानकारों का मानना था कि ये कोई नई खिचड़ी पक रही है, कोई समाजवादी खिचड़ी? जेपी-लेहिया के चेलों का ये नया समाजवाद प्रतीत हो रहा था, जिसमें प्रणय सूत्र बनें थे अमर सिंह. पर हमारे राजनीतिक जानकार क्या जानें राजनीति! भैय्या सही भी है जिसका काम उसी को साझे, मतलब नेताओं कि माया नेता ही जानें... माया से याद आया कि कहीं ये माया फीयर-फैक्टर तो नहीं? पता नहीं लेकिन हमारे कुछ पत्रकार मित्र इसे चौथे मोर्चे का नाम देनें लगें, और कुछ मंडल के दौर का नया प्रारूप बतानें में लगे...लेकिन सच तो शुक्रवार लखनऊ में हुई प्रेस कॉन्फेंस में सामनें आया जब लालू-मुलायम-पासवान ने साझा तौर पर ये बताया कि हमारा ये गठबंधन कोई यूपीए से अलग नहीं हैं, हम तो स्वंय में यूपीए हैं, यूपीए को चलाने वाले लालू-पासवान और यूपीए को बचानें वाले मुलायम-अमर दोनों तो यहां मौजूद हैं तो यूपीए से अलग होनें की बात नहीं हैं।

भाई ये नए समाजवाद का उदय था, जब आप प्रेस कॉंफेंस को देखते तो आपको ऊपर लगे समाजवादी पार्टी के बोर्ड पर लोहिया और मुलायम की तस्वीर के नीचे अमर सिंह और संजय दत्त थे। खैर हमें क्या मुलायम की पार्टी वो चाहें तो अमर सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाएं और संजय को महासचिव, लेकिन पुरानें और नए समाजवादियों के बीच हुए इस समझौते के कारण केवल माया फियर-फैक्टर ही नजर आता दिखाई पड़ रहा हैं, जेपी आंदोलन औप लोहिया की समग्र क्रांति से अपनें राजनीतिक जीवन की शुरुआत करनेवाले लालू-मुलायम-पासवान नब्बे के दशक के आते-आते मंडल के समय में अपनें राजनीतिक यौवन पर रहे, जिसका लाभ उन्हें आज तक मिल रहा है, नब्बे के बाद तीनों ने खुद को अपने राज्य और निर्धारित वोट बैंक तक सीमित कर लिया. लालू बिहार में पिछड़ों और मुसलमानों के सबसे बड़े हितेषी बनें और बिहार में पंद्रह साल राज किया, पासवान बिहार में दलितों और मुसलमानों के डीएम फैक्टर के तले कई हर बार केंद्र में मंत्री रहे सरकार चाहे किसी कि भी हो लेकिन पासवान जी को मंत्री पद जरूर मिलता, और यूपी में मुलायम सिंह ने भी यादव-मुस्लिम समीकरण के चलते यूपी में हमेशा लाभ लिया, और यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में रक्षा मंत्री जैसे अहम पद पर भी रहे. सीधी सी बात ये है कि इन तीनों नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक आस्तित्व को अपने राज्य और वोट बैंक के आधार पर ही केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर ही बढ़ाया, किसी लोहिया-जेपी की विचारधारा के नाम पर नही, वहीं इनके साथ चले खाटी समाजवादी जार्ज फर्नांडिज, सुरेंद्र मोहन आज कहां है आप हम सभी जानते हैं। खैर ये तो हम सभी जानते हैं कि इस गठबंधन के पहले लालू-पासवान की बिहार विधानसभा चुनावों में कितनी दोस्ती थी जिसका लाभ एनडीए को मिला। और समाजवादी पार्टी जानती है कि जो स्थिति बिहार में उनकी है, वही स्थिति लालू-पासवान की यूपी में है और यूपी के दलित वोट बैंक को तोड़नें के लिए पासवान एक विकल्प हो सकते हैं...लालू के साथ आनें से समाजवादी पार्टी को यूपी में तो खासा लाभ नहीं मिलेगा पर बिहार में शायद उपस्थिति मिल जाए। लेकिन ये सारी कवायद किस लिए हैं इसका शायद इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुलायम को भी पता है कि इस बार के आम चुनावों में उनका वो जलवा नहीं दिख पाएगा जो कि पिछले लोकसभा चुनावों में दिखा था क्योंकि राज्य में सरकार का जो लाभ वो पिछले लोकसभा चुनावों में ले गए थे इस बार वो संभव नहीं है, न तो राज्य में सरकार उनकी है और न ही बाहुबलियों का साथ। यही स्थिति कुछ लालू-पासवान की भी है, हालांकि ये बात भी छिपी हुई नहीं है कि यूपी की मुख्यमंत्री मायावती का कद राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ा है औऱ इन तीनों नेताओं का कम हुआ है। आज इन सभी नेताओं को यूपी, बिहार, झारखंड की कुल सीटों का एक साथ अनुमान लागाना पड़ रहा है क्योंकि डर है कि कहीं मायावती की सोशल इंजीनियरिंग इनके वोट बैंक में सेंध लगाए उससे पहले हम सभी केवल धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर ही एक हो जाते है शायद थोड़ा लाभ मिल जाए, लालू-पासवान भली-भांति जानते हैं कि बिहार विधान सभा चुनावों वाली गलती दोहरानें से घाटा उन्हें ही उठाना पड़ेगा और लाभ इस बार एनडीए को नहीं तो मायावती को मिल सकता है, इसलिए राजनीति में कोई बैरी-बंधु नहीं के सिद्धातों के तले इस समझौते को परवान चढ़ाया। खैर पल-पल बदलते इस राजनीतिक घटनाक्रम में मैडम माया ने अपने पत्ते अभी खोले नहीं हैं देखना ये हैं कि आने वाले कल में हमें कौन से नए राजनीतिक समीकरण देखनें को मिलेंगे

नवीन कुमार 'रणवीर'

सांप्रदायिक राजनीति का नया पिस्सू वरूण गांधी...

सांप्रदायिक राजनीति का नया पिस्सू वरूण गांधी, जी मैंने कुछ गलत तो नहीं कहा? कभी हमारे देश में दो बीमारी बड़े जोरों की फैली थी वो थी मलेरिया और डेंगू, खैर आजकल भी कभी कभी ये दोनों अपना प्रकोप देश के की हिस्सों में फैला देती है लेकिन अब लोग पहले से ही सजग हो जाते हैं. समझनें वाले तो इतने में ही समझ गए होंगे कि मेरा इशारा कहां है, जो नहीं समझे वो इस लेख में आगे समझ जाएंगे. खैर हम बात कर रहे थे वरुण गांधी की, भगवा ब्रिगेड का नया पिस्सू, इनकी पार्टी के बड़े नेता पहले ही देश में मलेरिया और डेंगू के मच्छरों की भांति सांप्रदायिकता का ऐसा डंक मारते थे कि लोगों को अस्पताल तक जाने की नौबत नहीं आती थी, वे बेचारे वहीं दम तोड़ देते थे. देश के कुछ हिस्से तो मानों इनका अड्डा बन गए थे, जब चाहा तब किसी को भी काट लिया करते , लेकिन एक बात में ये मलेरिया और डेंगू के मच्छर से पूरी तरह भिन्न थे .वो जो डेंगू या मलेरिया का मच्छर होता ...है वो तो बिना किसी धर्म-जाति जाने काटता था, परंतु ये जो भगवा ब्रिगे़ड के मच्छर हैं ये धर्म जानकर अपना शिकार बनाते. उत्तर प्रदेश शुरुआत में इनका सबसे बड़ा शिकार हुआ, इसके बाद मुंबई फिर गुजरात, फिर उड़ीसा, समय-समय पर मध्य प्रदेश भी इनका शिकार बनता रहा है.जिस तरह से सरकार डेंगू-मलेरिया के मच्छरों से बचने के लिए उपाय बताती है, उसी प्रकार हमारे कुछ धर्मनिरपेक्ष पत्रकार मित्र और सामाजिक कार्यकर्ता समय-समय पर जानता से एहतियात बरतनें को कहते है. लकिन जिनके पास धर्मनिर्पेक्षता की मच्छरदानी न हो उन्हें तो ये काट ही जाते थे. देश के कई राज्यों में इस मच्छरदानी का समय-समय पर टोटा पड़ ही जाता है, जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश. आजकल इस सांप्रदायिक मलेरिया-डेंगू गैंग यानि भाजपाइयों के पास पुराने मच्छरों के डंक प्रभावहीन हो गए थे. इनमें प्रमुख पीएम इन वेटिंग, अयोध्या के कल्याणक सिंह, सांप्रदायिक कटुता का औजार विनय कटियार, वैमनस्यवाद के गुरू आदित्यनाथ-नरेंद्र मोदी रहे हैं. परंतु जनता ने पहले से सुरक्षा बरताना शुरू कर दिया तो, बेचारे सिमट कर आपस में ही डंक मारने लगे और हश्र तो आप देख ही रहे हैं. भगवा ब्रिगेड के नेता खुद से ही पीएम और सीएम हो जाते हैं, शुक्र है कि आगे इन वेटिंग भी लगा लेते हैं वरना तो... आज कल एक नया पिस्सु इस सांप्रदायिक डेंगू-मलेरिया गैंग ने भेजा है जिससे कि जनता को पता भी न चले और डंक मार कर फिर से इस देश को जख्मी कर दे, और करा दे दंगों के अस्पताल में भर्ती...लेकिन वरुण बबुआ आपके गैंग के बड़े मच्छरों का हाल तो आपनें देखा ही है जो सपना आप आज देख रहें हैं वो सपना आपके गैंग के बड़े कीट कब से देखते हुए आज तक आस लगाए बैठे हुए हैं. लेकिन इस देश की जनता को आज फिर वही अयोध्या, फिर वही मुंबई, फिर वही गुजरात, और फिर वही कंधमाल दिखानें की जो आपकी कोशिश वो वही बेवकूफी है, आपकी पार्टी और आप बाद में चाहे जितनी भी सफाई दे दें, लेकिन लोग जानते हैं कि आपकी पार्टी हर बार की तरह इस बार भी सत्ता पानें के लिए अपनी ओंछी सोच और वैमनस्य की विचारधारा पर जो नफरत और सांप्रदायिकता का महल बनाना चाह रही है उसकी ना तो ईटों में दम हैं, न ही गारे में. क्यों कि वो ईंट और गारा दोनों ही खोखले हैं आपकी पार्टी की विचारधारा की तरह, जिसमें न तो राष्ट्रवाद जिसकी आप दुहाई देते है न ही समाजवाद, जिसमें केवल एक ही वाद है वो है वैमनस्यवाद...

Friday, March 6, 2009

स्लमडॉगस् की सच्चाई...

ऑस्कर तक के सफर के बाद, जीवन की सच्चाई से रूबरू होते असल जिंदगी के किरदार. जी हां बात कुछ अटपटी सी लग रही होगी आपको, शायद समझ में नहीं आ रहा होगा कि मैं किस कि बात कर रहां हूं?
दोस्तों दुनिया भर में धूम मचानें वाली फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी से लेकर किरदार तक भारतीय थे, यहां तक की गीत-संगीत, रिकार्डिंग और तमाम वो काम जो कि भारत में संभव हो सकते थे वो यहीं किए गए. फिल्म में काम करने वालों में कुछ तो नए लोग थे जिन्होंने शायद कभी अंदाजा भी नहीं लगाया होगा कि वो कभी किसी फिल्म में काम करेंगे, और कुछ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कुछ ऐसे नाम थे जो कि किसी तारीफ के मोहताज नहीं है.
खैर फिल्म विदेशी निर्देशक द्वारा बनाई गई जिसकी कहानी भी एक भारतीय लेखक के नॉवेल पर आधारित थी. मोटी बात ये कहें कि इस विदेशी फिल्म को भारतीयों के योगदान के बिना पूरा कर पान शायद तो संभव नहीं होता.
जिसमें कि सबसे अहम भूमिका यदि किसी की थी तो इस फिल्म की कहानी को सच साबित करते फिल्म के पात्रों के चुनाव की. फिल्म मुंबई की झुग्गी-बस्ती धारावी पर केंद्रीत है, जहां के बच्चे किस प्रकार अपनें को जिंदगी की पाठशाला में पढ़ाते है और फिर जीवन की किसी भी परिस्थिति में अपनें विवेक से निर्णय लेते है, जिसमें कि किसी का कोई योगदान नहीं होता, और यदि किसी का उनके जीवन में योगदान होता है तो वो भी सिर्फ स्वंय जिंदगी का....वो जिंदगी ही होती है जो कि इन बच्चों को जिंदा रहना कमाना-खाना अपने को बचाना, चालाक-चतुर बनाती है. खैर फिल्म में इस किरदार को जीवांत उतारनें के लिए विदेशी निर्देशक शायद हमारे बॉलीवुड के निर्देशकों से बाजी मार जाते है. और विश्व ख्याति प्राप्त कर हमारे देश के उन कलाकारों को छोड़ जाते है उसी झुग्गी की जिंदगी जीनें के लिए जिसे शायद वो अब तो नहीं जीना चाहते होंगें. लेकिन विदेशी निर्देशको का इसमें कोई कसूर भी तो नहीं है, वो अपनी एक फिल्म बनानें के लिए आऐ थे जिसकी कहानी भारतीय थी तो कलाकार भी भारतीय चाहिए थे, वो भी ऑरिजनल दिखनें वाले तो झुग्गी के बच्चे ले लिए, रहा काम पूरी फिल्म की शूटिंग का, तो वो तो किसी भी संघर्षरत कलाकार से करवा लेंगे.
दोस्तों बात पते कि ये है कि फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में गरीब झुग्गी के बच्चे सलीम का किरदार निभानें वाले 10 साल के अजरुद्दीन ने जो चरित्र निभाया है फिल्म में उसकी तारीफ सबनें की, लकिन ऑस्कर के रेड कार्पेट से लोटनें के बाद अजरुद्दीन की जिंदगी फिर से उसी झुग्गी में रह गई जो कि फिल्म में काम करनें से पहले थी. शायद फिल्म की शूटिंग के दौरान उसनें अपनें को इन बड़े-बड़ें नामों में जोड़ने की बात तो नहीं सोची होगी पर अपने इस झुग्गी के जीवन से तो कुछ बेहतर ही सोचा होगा. बांद्रा के गरीब नगर झुग्गी-बस्ती में रहनेंवाले अजरुद्दीन के जह़न से ऑस्कर की चकाचौंध की रौनक अभी हटी भी नहीं थी, कि उसके पिता इस्माइल ने अजरुद्दीन की मीडिया के सामनें ही पिटाई कर दी. ये वो हकीकत थी जिसनें अजरुद्दीन को
ऑस्कर की दो पल की अमीरी से गरीब नगर की हकीकत से रु-ब-रु
करा दिया था. हमारे देश में हर साल न जाने कितनें अवार्ड दिए जाते है, हर साल एक नए नाम से अवार्ड दिया जाता है, एक ही फिल्म परिवार को न जाने कितनें अवार्ड मिल जाते है, और बेटी-बेटा फिल्मों में चल पड़ते है.
कैसे न कैसे करके हमारें निर्माता-निर्देशक चले जाते है उनकी दहलीज पर उन्हें साइन करने के लिए. और वे बन जाते है स्टार..
भारतीय फिल्म इतिहास में कितनें ही ऐसे स्टार होंगे जो कि बादशाह, किंग, शहंशाह, हीरो न.1 खिलाड़ी, सुपर स्टार औऱ न जाने कितने ही उपनामों से जानें जाते है. लोकिन ऑस्कर के उस स्टेज तक पहुंचनें में किसी को कामयाबी आज तक नहीं मिली. पर एक झुग्गी के एक लड़के में शायद ऑस्कर की नहीं बल्कि अपने लिए एक बेहतर जिंदगी की आस थी,
लेकिन आठ ऑस्कर जितनें वाली फिल्म का बेहतरीन हिस्सा होनें के बावजूद अजरुद्दीन की सुबह में वही बात थी जो कि फिल्म के बारे में जाननें से पहले थी. म्यूनिसिपल स्कूल में पढ़ने वाला अजरुद्दीन शायद सोच रही होगा कि अब उसके दिन फिर जाएंगें. पर ऐसा हुआ तो नहीं. ये कोई “भारतीय रिऐलिटी शो थोड़ी न है जिसमें की आपकी मुंबई का ही कोई नेता आप से खुश होकर आपको फ्लैट गिफ्ट कर दे” न ही आप कोई लड़की है जिस पर की कोई कृपा करें. और रही बात भारतीय फिल्म निर्माताओं की तो वे तो पहले ही उन कलाकारों को लेते है जिनसे कि उनकी फिल्म को पैसा मिल सके. निर्देशक तो पहले से ही सुपर स्टार से कम में बात ही नहीं करते, जो छोटे निर्देशक हैं भी वो बेचारे बिना स्टार पुत्र-पुत्री जो लोग फिल्मों में जो लोग काम कर रहें है वे उनके अन्नदाता है, हां कुछ लोग है जो कि अपनें को कॉमर्शियल सिनेमा से अलग मानते है ऐसे भी निर्देशक है, और भाई लोग बनाते भी नेशनल अवार्ड वाली फिल्में है. पर आपने कोई एफटीआईआई से या एनएसडी से एकटिंग में डिग्री भी तो नहीं की न...
तो थोड़ा मुशकिल है भाई अजरुद्दीन के दिन फिरना...अभी तो बांद्रा के गरीब नगर को ही अपनें जीवन की सच्चाई मानों.
हमारे देश में शायद जीवन की सच्चाई पर फिल्में नहीं बनती है, और अगर बनती भी है तो निर्देशक फिल्म के किरदारों के साथ पूर्ण न्याय नहीं कर पाते या फिर वो भारत की उस सच्चाई को बतानें से डर जाते है जो कि विदेशी फिल्मकार या भारतीय मूल के विदेशी फिल्मकार भारत में आकर बता जाते है, और ऐसा बता कर जाते है कि भारतीय फिल्मकारों के अच्छी फिल्म के विदेशी सपनें को वो स्वंय इस देश में यहां की कहानी, यहां के चरित्र, यहां के ही साथियों-सहयोगियों द्वारा सच साबित कर मुंह चिढ़ाकर चले जाते है. और शायद यही चिढ़ और खीज हमारे बॉलीवुड के फिल्मकारों को भारतीय कहानी पर आधारित विदेशी फिल्मों में काम करनेंवालों भारतीय कलाकारों को भारत में उपजनें नहीं देती. यदि कोई सक्षम इंसान भी कोई ऐसा काम करता है जिससे किस देश का क्या उसके राज्यभर में उसका नाम हो जाए तो न जाने कितनें ही लोग, कंपनियां, फिल्मवाले औऱ बहुतेरे ऐसे लोग जो कि अपने नाम को उस व्यक्ति के साथ जोड़ना चाहते है लंबी-लंबी कतारे लगाए खडे हो जाते है, लग जाते है उसकी सक्षम जिंदगी को वैभव और विलासिताओं से लैस करनें में. हमारे मीडियाकर्मी भी अपनी टीआरपी की गिनती बढ़ानें में शायद जिंदगी की उस हकीकत को भूल जाते है जिसे जिदंगी का संघर्ष कहते है. आपको शायद याद हो कि नहीं लेकिन सन् 1988 में एक भारतीय मूल की विदेशी फिल्मकार मीरा नायर ने एक फिल्म बनाई थी सलाम बाम्बे जोकि उस समय में लीक से हटकर बननें वाली फिल्मों में मील का पत्थर साबित हुई. फिल्म में चाय बेचनें वाले बच्चे कृष्णा के किरदार को जीवांत रूप दिया 11 वर्षीय शफीक ने, सलाम बाम्बे ने देश में ही नहीं विदेशों में भी खूब वाहवाही बटोरी. फिल्म की निर्देशक एनआरआई थी और कहानी भारतीय (स्लगडॉग की भांति). सलाम बाम्बे ऑस्कर के लिए भी नांमांकित हुई. लेकिन मिला नहीं, फिल्म में कृष्णा का किरदार निभाने वाले शफीक को बेहतरीन अभिनय के लिए बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. उस समय भी मी़डिया में शफीक के खूब चर्चे थे. पर उसके बाद न तो शफीक का पता चला की वो कहां है न ही वो किसी फिल्म में नजर आया. शायद हमारे देश में उसके बाद ऐसी फिल्में बनना बंद हो गई थी, आज जब किसी विदेशी फिल्मकार को भारत की कहानी पर फिल्म बनानें का मौका मिला तो शफीक की उम्र 32 साल हो गई. तो इसलिए बेचारा आजकल बंगलुरु की सड़को पर रिक्शा चलाकर अपना और अपनें परिवार का पेट पाल रहा है. क्या वो कोई स्टार पुत्र होता तो आज भी उसका ये हाल होता? ऐसा नहीं हे कि केवल स्टार पुत्र ही इस बॉलीवुड में काम पाने में सफल हुए है. परंतु ऐसा क्यों है कि हमारे यहां के निर्देशकों को हमारे देश में हुनर या तो गोरे चिकनें चेहरों में नजर आता है, या कुछ तथाकथित कला फिल्मकारों को केवल एफटीआईआई या एनएसड़ी में. जिस इंसान को जिंदगी ने एक्टिंग सिखा दी उसे कलाकार मानने को कोई राजी नही होता. जैसा कि इस फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में दिखाया गया है. कि बिना किसी डिग्री के कोई व्यक्ति कैसे इतने सारे सवालों के जवाब जानता है. जबकि उस जमाल से ज्यादा पड़े लिखे लोग उस प्रतियोगिता में जाने का सपना मात्र ही देख पाते है. मुझे हमारे फिल्मकारों की स्थिति इस फिल्म के पात्र अनिल कपूर की तरह लगती है, जो कि किसी भी कीमत पर ये माननें को तैयार नहीं होते की हुनर किसी कॉलेज या संस्थान मात्र से नहीं आ जाता, कुछ तो कुदरती भी होता है और कुछ जिंदगी की इस यूनिवर्सिटी में इंसान खुद सीख जाता है.
देखते है कि आने वाले दिनों में अजरुद्दीन का हाल भी शफीक जैसा होता है या उसके दिन शायद फिरेंगे. खैर अभी तो अजरुद्दीन की झुग्गी टूटनें के लिए ऑ़डर आया है. जो कि शायद उसकी दिनचर्या का ही हिस्सा है....

नवीन कुमार‘ रणवीर’

Monday, March 2, 2009

लोकसभा चुनावों की घोषणा

लोकतंत्र के महासागर में,
लेकर चले सब अपनी नाव...
कोई जहाज तो, तो कोई बेड़ा,
कोई लगता कश्ती दांव
जाति-धर्म को चप्पू थामों,
पड़े फिर कैसे लहरी घाव
लोकतंत्र के महासागर में...
छोटे बड़े सारे घाघ
भिड़ेंगे ले के एक ही राग...
हम सच्चे है-हम सच्चे है
दोनों लेंगे वादे साज...
घोटालों के बड़े बवंडर,
जामै फसते नेता अंदर
जे ऐसों सागर है भैय्या,
जामै बनें नेता खिवय्या...
सभी जुतें है करने राज
हर कोई चाहे पहने ताज
ताज-राज की जे लड़ाई
जामै जन की शामत आई
नेताअन एक ही काम
भीड़े जो जनता सुबह-शाम
उन्है मिलैगो पांच साल को आराम...
ये लोकतंत्र को सागर ...
भर लो पांच साल की गागर
पग मैं पड़ैगों कैसे कांकर
ले लो वोट घर-घर जाकर,
अपनी-अपनी नैय्या संभाले
सगरै नेता लगे रिझाने
वोट दे दो, वोट दे दो
रोज लगैगो वोट को भाव
लोकतंत्र के महासागर में
लेकर चले सब अपनी नाव...

नवीन कुमार 'रणवीर'

Wednesday, February 25, 2009

प्यार क्या है...?

दोस्तों,
प्यार करना आज के इस बदलते परिवेश में खाना खानें जैसा प्रतीत होता है, जैसे किसी को भूख लगी तो उसने खाना खा लिया, बाद में और भूख लगेगी तो और खा लेंगे. प्यार एक सुखद अनुभूति से जीवन की दिनचर्या का हिस्सा कैसे बन गया? सवाल ज़रा टेढ़ा है...लेकिन जायज़ है... आज हमारे साथी प्यार तो करते है, लेकिन उसे निभाने में बेचारे पहली बाधा में ही हांफ कर हार मान जाते है..हो भी क्यों न ठीक है किसी से वादा ही तो किया था ना, कोई बात नहीं आगे और मिलेगें...दोस्तों सवाल ये है? कि जब हम प्यार में होते है तो हमें सब कुछ सही लगता है, पर अचानक हमारी आंखें खुल जाती है, हमारा दिमाग दिल से ज्यादा काम करने लगता है, हमें सही और गलत की नई-नई परिभाषाऐं आने लगती है. हम यह निर्णय ले लेते है कि, हमारे माता-पिता की खुशी भी कोई मायनें रखती है. हम अपने प्यार, अपने विश्वास पर खरे नहीं उतर पातें. पर मेरे दोस्तों हम अपनी मर्जी से आपने प्यार को मारते है. हमारे में वो क्षमता नहीं होती की हम अपने प्यार प्रति समर्पित रहें, हमारे पास कई विकल्प जो आ जाते है, और हमारा दिल भी भर जाता है अपनें प्यार से, अब कुछ नया हो जाए...फिर हम अपनें दिल को कुछ इस तरह तस्ल्ल्ली देते है कि यार किस-किस को नाराज करते, माता-पिता से बढ़कर तो नहीं है न प्यार...हां मेरे दोस्त माता-पिता से तो बढ़कर नहीं है प्य़ार, पर ये किस माता-पिता ने कहा था कि प्यार करो... जब तो लगा कि कोई नहीं साथ चलेंगे, साथ लड़ेंगें, पर दिल कि दहलीज पर ये अचानक दिमाग की दस्तक कैसे हो गई. इसका जवाब हर उस इंसान के पास है जो अपने प्यार की कसौटी पर खरे नहूीं उतर पाएं.. दोस्तों प्यार निभानें का नाम है... करते तो सभी है...निभानें में होता है त्याग...और जो त्याग न कर पाया हो उसे कभी जिंदगी में प्यार नहीं मिलता. जिसके दिल में अपनी भावनाओं की कोई इज्जत नहीं वो समाज में अपनें माता-पिता की इ्ज्जत की दुहाई देकर अपने प्यार को खत्म करना चाहे तो वो उसकी सबकी बड़ी गलती होती है, जो अपनें प्यार का सगा न हो सका, वो अपने माता-पिता या पति का क्या सगा हो पाएगा...प्यार भावनाओॆं का सागर है जिसमें कि एहसासों की शांत लहरें भी आती है,और समाजिक प्रतिबंधों सी तेज लहरें भी, लेकिन तेज लहरे क्षणिक होती है, अगर साहिल उन से डरकर पीछे हटता है तो उसका नतीजा तबाही है, लेकिन यदि वो उसे झेल जाए तो वह उसका उन शांत लहरों के लिए प्यार और समर्पण है...

Monday, February 9, 2009

गुंडई के विरुद्ध...

कर्नाटक के मंगलोर स्थित एक पब में युवाओं पर हुआ हमला हमारे लोकतंत्र के 60वर्षों की कोई नई कहानी नहीं बयां करता, बल्कि ये घटना हमारे सामने वो सच्चाई प्रस्तुत करती है जिससे या तो शायद हम परिचित नहीं थे या हम जानना नहीं चाहते. आज भी देश में ऐसी सोच के लोग मौजूद है एक बड़ी शक्ति के रूप में जो कि खुद को राष्ट्र, समुदाय, क्षेत्र, आदि का हितेषी बता कर कभी भी, कहीं भी कानून को हाथ में लेकर किसी की भी पिटाई कर चलता बनता है और पुलिस प्रशासन शायद इसे देश हित में समझकर कोई कार्यवाही नहीं करता. पहले ये लोग धर्म, समुदाय, भाषा, क्षेत्र, के नाम केवल गरीब, मजदूर, लोग ही इनके शिकार होते थे. पर अब समय बदलने के साथ-साथ इनके शिकार में भी परिवर्तन आया है. आजकल ये लोग पढ़े-लिखे नौजवानों और लड़कियों पर अपनी शौर्यता दिखाते हैं. खैर ऐसा नहीं है ये लोग पहली बार नौजवानों पर अपनी गुंडा गर्दी दिखाई है. बीते कुछ वर्षों की यदि हम बात करें तो हम पाते है कि नौजवान युवक- युवतियों को पहले ये लोग केवल वेलेंटाइन डे पर ही अपनी गुंडागर्दी दिखा कर बेइज्जत करते. औऱ हवाला देते खुद के भारतीय संस्कृति के रक्षक होनें का. और ऐसी ही सोच वाले उनके कुछ भाई क्षेत्रीयता के नाम पर किसी को भी पीटकर दौडा-दौडा कर मारते, और कुछ भाई गिरजाघरों पर हमलें कर इसे धर्म हितकारी कार्यवाही करार दे देते, ऐसी ही सोच हमारे उत्तर-पूर्वी मित्र भी रखते है वो भाषा के नाम पर मार काट मचाए हुऐ है. लेकिन आज इस सोच ने और भीषण रूप ले लिया है. आज देश के सामने कई चुनौतियां है लेकिन हम आज भी केवल एक सोच को खोज रहे हैं. सोच संवैधानिक हो? हमारे देश में अपने द्वार की गी गुंडागर्दी को सही साबित करने वालों को शायद ये नहीं पता की इस देश में हर किसी को अपनी मर्जी से जीनें का अधिकार है. चाहे वह महिला हो या पुरूष, दलित हो या सवर्ण, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक. पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ सभी को अपनी मर्जी से अपना जीवन निर्वाह करने का अधिकार है. फिर क्यों हम ऐसा काम करते है जिसे करने के लिए हमारा संविधान हमें इजाजत नही देता. क्यों हमारी सोच समय बदलने के साथ-साथ और भी ज्यादा छोटी होती जा रही है. क्यों ये हिंदू सेना, राम सेना, शिव सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, बजरंग दल, अभिनव भारत, उल्फा और न जाने कितने ही इनके जैसी सोच रखनेवाले संगठन अपने देश में नफरत और वैमनस्य का घिनौना प्रचार कर रहे है. सारा मामला सहयोग, सहायता और सौहार्द से परे हो स्वार्थ, सामंतवाद औऱ स्वामित्व की कोठरी में आ कर बंद हो जाता है. कोई महिला पर अपनी रंगदारी दिखाता है, तो कोई दलित-आदिवासी पर, कोई किसी दूसरे राज्य में रोटी कमाने गए मजदूर को पीटकर भगा देता है तो कोई किसी को बहुसंख्यक होने दबंगई दिखाकर काट देता है. अगर कोई लड़की पब में नाचती है तो किसी को क्यों ऐतराज हो ? अगर कोई अपने धर्म को मान रहा है, अपने धार्मिक क्रियाकलाप करता है तो किसी को क्यों बुरा लगे ? कोई महिला केवल घर में ही क्यों रहे और अपनी मर्जी से क्यों न जीए ?
क्यों किसी गरीब मजदूर रोजी-रोटी कमाने के अधिकार से ही वंचित रखा जाए? क्यों भाषा के नाम किसी को सरे आम गोला मारी जाए? क्यों जाति के नाम पर किसी को सर पर जूते रखकर जाना पड़े?
दोस्तों ये वो सवाल है जो हमारे 60 वर्षों के लोकतंत्र के सामने मुंह चिढ़ाए खड़े है...जवाब हमारे पास पास होते हुए भी नहीं है...।

नवीन कुमार ‘रणवीर’
2007-08
भारतीय संचार संस्थान दिल्ली

Sunday, February 8, 2009

भारतीय जनसंचार संस्थान का पूर्व छात्र मिलन समारोह

भारतीय जनसंचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता के छात्रों ने पूर्व छात्र मिलन समारोह आयोजित किया. जिसमें की संस्थान से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करनेवाले कई छात्रों ने आकर अपने पूराने दिनों को ताजा किया और संस्थान के छात्रों के साथ अपने पुराने अनुभवों को बांटा...हर कोई अपने पुराने दोस्तों से मिलने के लिए उत्सुक नजर आ रहा था. किसी की निगाहों में पुरानी दिनों की यादें ताजा दिखी, तो कोई अपने लिए नई राह की तलाश में व्यस्त दिखाई दिया.... तो कोई संस्थान में बिताए अपने पुराने दिनों की कहानी सुनाने को बोताब था.... किसी ने अपने प्यार के पाने के लिए संस्थान का धन्यवाद दिया... तो कोई अपने गुरुजनों के साथ के अनुभवों को बता रहा था जिसे की शायद वो कभी न भूला पाया. हर कोई खुश था... मैं भी.. समय कम होने की वजह से मुझे वहां अपनी क्लास के अनुभवों को बांटनें का मौका न मिला इस लिए आपसे वो पल बांचना चाहता हूं...
मेरा बैच तो इससे पिछला ही था (२००७-०८) तो मेरे साथियों की संख्या सबसे ज्यादा थी, पर फिर भी सभी ४० नहीं थे... हो सकता है कि अगले साल वाला बैच भी शायद ऐसा ही कोई आयोजन करें, तब हमारे बैच के सदस्यों की संख्या शायद और भी कम हो जाएगी... एक सवाल हमारे बैच के छात्रों के दिलों में था ओर कुच की जुबां पर भी आ गया कि, हमारे साल में हमनें ऐसा कोई आयोजन क्यों नहीं किया था? जवाब भी हमारे सब के पास था, जो क्लास पूरे साल सिर्फ सी.आर के चुनाव को लेकर राजनीति का शिकार रही, उसमें एक सफल आयोजन होना चुनौती पूर्ण था. हमारी क्लास (2007-08) में राजनीतिक विचारधाराओं का इतना बड़ा द्वंद होता था की कुछ लोगों के लिए वह प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता और यही कारण था की पूरे कोर्स के दौरान हमारा कोई एक नेता ही नहीं बन पाया था, जो किसी आयोजन को करने की जिम्मेदारी ले और क्लास के सभी लोग उसका समर्थन करते.
हर बात का निर्णय हमारे टीचर्स के सामने होते थे। हर बात एक विवाद का विषय बनती थी, पहले दिन से ही लोगों ने बिहारवाद, भूमिहारवाद फैलाना शुरु कर दिया। जिसके मन में ऐसे विचार नहीं थे वो भी बोए गए, कहीं कोई बिहारी नहीं है तो भूमिहार तो है, बस किसी न किसी तरह उसे अपने साथ लिया जाए... कई बार कोशिश ये हुई की कैसे सत्ता हमारे हाथ आए, मतलब कुछ लोगों के लिेए वो क्लास एक राजनीतिक अखाड़ा बन गई थी, जिसमें की गुटबाजी के बिना शायद नींद न आना संभव न हो पाता आप सोच रहें होगे की मैं अपनी क्लास की बुराई क्यों कर रहा हूं॥ पर दोस्तों ये वो सच है जो मैनें महसूस किया, मैं मूल रूप से राजस्थानी हूं मेरे पूर्वज ७० साल से दिल्ली में रह रहें है। मुझु लोग दिल्ली वाला कहते और बताते की दिल्ली के लोगों के बारे में उनके विचार कैसे है, फिरल मेरे बारे में कहने के लिए उनका तर्क था होता की ' तुम तो राज्सथान से हो ना इसलिए तुम ठीक बंदे हो वरना तो साले दिल्ली वाले सभी मतलबी होते है'।
मुझे लगा कि आगे देखेंगे की कोई कितना मतलबी होता है...१० दिनों के अंदर जोड़तोड़ की राजनीति पनपने लगी, कहीं क्षेत्रवाद की गंध ने सारी क्लास को सड़ा कर रख दिया था, तो किसी को जाति के नाम पर अपने साथ मिलाने की कोशिश हो रही थी, जिसके साथ इन दोनों में से कोई संबंध नहीं बन पा रहा था तो वैचारिक रूप से अपने साथ मिलाया जाए मतलब आप भी संघी हम भी संघी, ये भी नहीं बन पा रहा तो आरक्षण के विरोधी हो या समर्थन में इस मामले में भी बड़ी साख बनी हुई थी। ये भी नहीं तो सवर्ण और दलित पिछड़ा अलग, अल्पसंख्यक तो कोई था ही नहीं।
क्लास के पहले ही दिन कुछ राजनीतिक मठाधीशों ने लोगों के उपनाम जांचना शुरू कर दिए थे कौन-कौन किस-किस जाति का है, कौन राज्य का है।
यहां तक की क्लास का काम जो एसाइंमेंट या जो प्रैक्टिकल काम मिलता था उसे पूरा करने के लिए भी लोगों को अपने जातिबंधुओं का ही ग्रुप चाहिए होता था। क्या भाई ऐसा तो शायद उस दिल्ली में भी नहीं होता जिसे आप गाली देते हुए आप अपने राज्य से आए और आज भी गाली ही देते हुए यहां कमा खा रहें हैं। ऐसा नहीं है कि सभी ऐसे लोग थे, पर जो नहीं भी थे उन्हें भी उनके जैसा होना पड़ा।
खैर बात सीआर के चुनावों की हो रही थी हम आगे निकल आए... तो क्या हुआ की चुनाव बड़े ही गजब हुए थे भाई, मेरा तो उस दिन जन्मजिन था तो मैं तो आया नहीं था, अचानक चुनाव करवा दिए गए, संख्या के अनुपात में बिहार, उ।प्र के छात्र सबसे ज्यादा थे, उसके बाद कुछ झारखंड़ थे, तो कुछ
हिमाचल से, दिल्ली से दो तीन थे, दो राजस्थान से। चुनाव में जीत उसी ग्रुप के प्रत्याशी की हुई जिसके लिए ये सारी जोड़-तोड़ शुरू हुई पर मामला बिगड़ गया। जिसे मनमोहन सिंह बना कर बिठाया, उसके लिए सबके हित की बात करना मठाधीशों को भारी लिए भारी पडने लगा था, एक महीनें के बाद दुबारा चुनाव के लिए अध्यादेश जारी कर दिया गया था... पर बात को किसी तरह संभाला गया...
परंतु पूरे कोर्स के दौरान बेचारी सीआर को हटाने का जुगाड़ करते नेताजी ने क्या नहीं किया...
मुझे समझ नही आया की अब अचानक ये क्या हो गया कि जिस लड़की को सीआर बनवाने के लिए बिहार को लामबंद किया गया, भूमिहार को लामबंद किया गया, और जो लड़की प्रत्याशी थी वो ब्राह्मण थी हिमाचल पीठ तक के मठाधीशों ने समर्थन किया था, पर आज केवल वहीं दो पांच लोग उसे हटाना चाहते है, जबकि उसके विरोधी दौबारा चुनाव नहीं चाहते थे... क्या यार पूरा साल ये सब करते रहे कुछ लोग....अब समझ नहीं आता की दिल्ली वाला कितना बुरा हो सकता है या किसी और राज्य का नागरिक, मेरे दोस्त आज भी तू कहीं भी हो ये दिल्ली वाला तेरे लिए अच्छा ही सोचेगा क्यों की कभी साथ बैठ एक थाली में खाया था, इससे तो बड़ा कोई क्षेत्र या राज्य या देश नहीं ,कोई राज्य, बोली, भाषा, जाति, धर्म, बुरा नहीं होता बुरी होती है सोच, बुरे् होते हैं आपके कुछ अनुभव, जिसे की आप अपनी जिंदगी का नियम बना लेते हैं... मैं आप से मिला तो क्या मैं आपके पूरे राज्य या जाति के बारे में एक विचार रखूं...
पर मैनें अपनी जिंदगी के सबसे हसीन पल बिताए आईआईएमसी में....